पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७११

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भट्टारकवार-भट्टियाना ७०५ भट्टारकवार ( स० पु० ). भट्टारकः सूर्यः तस्य बारः। यह काव्य केबल व्याकरणकी काठिन्यपूर्ण गोरसपद- रविवार। परम्परा द्वारा हो रचा गया है, सो नहीं। इसमें का भट्टारिका (सं० स्त्री०) १ नदीभेद । (कालिकापुराण २३२।८० जगह उस रसकदम्बकल्लोलमय कवित्वपूण कोमलकान्त ११) २ अनहिलवाड़ पत्तनके अन्तर्गत एक प्राचीन पदावलीकी भी अति सुन्दर अवतारणा देखी जाती है स्थान। तथा इसमें सहदयवेद्य शब्द र अर्थालङ्कारादिका भी भट्टि-पक्षाववासी राजपूतजातिकी एक शास्त्रा। अभाव नहीं है। भाटि देखो। यह ग्रन्थ पढ़नेसे व्याकरणके अलावा छन्द और भट्टि-भट्टिकास्यके प्रणेता भत्त, हरिका नामान्तर ! ये अलङ्कारशास्त्रमैं भी विशेष व्युत्पत्ति लाभ को जाती है। भत्तु स्वामिन, भट्टस्वामी वा स्वामिभट्ट नामसे भी जन संस्कृत काव्यके मध्य भट्टि भिन्न ऐसा कोई काव्य हो साधारणमें परिचित थे। वलभीराज भट्टारकपुत्र नहीं है जिसमें ऐसे सुन्दर भावमें और सुश्खलाके साथ श्रीधरसेनको सभामें ३८० सम्बत्को ये विद्यमान थे। व्याकरण, छन्द तथा अलङ्कारसमुच्चयका एकत्र समावेश भत्त हरि देखो। हो। इसके द्वितीय स्वर्गका शरवर्णन और दशमका भट्टिक (सपु०) चित्रगुप्तके एक पुत्रका नाम । काव्यालङ्कार बड़ा ही रमणीय है। भट्टिकदेवराज--एक हिंदूराज। ये प्रतिहारराज सिलुकसे ____ ग्रन्थके शेषमें प्रन्थकर्त्ताने अपना जो परिचय दिया परास्त हुए थे। है वह इस प्रकार है- भट्टिकाव्य-भत्त हरि-प्रणीत एक महाकाव्य। यह काध्य "काव्यमिद विहितं मया वलभ्यां रसभावमय रामायणकी प्रसिद्ध घटनाके आधार पर श्रीधरसेननरेन्द्रपालितायाम् । लिखित होने पर भी कविने इसे व्याकरणकी विविध कीर्तिरतो भवतान्नृपस्य तस्य प्रक्रिया द्वारा सुन्दरभावसे सजित किया है। रचना- मकरः क्षितिपो यतः प्रजानाम् ॥" कालमें व्याकरणके प्रति ही कविको सुतीक्ष्ण दृष्टि थी। वलभीराज श्रीधरसेनके आश्रयमें रह कर उन्होंने व्याकरणमें स्थिर-व्युत्पत्ति लाभ करनेके पक्षमें भट्टिकाध्य इस काव्यकी रचना को। विशेष उपयोगी है। प्रथके शेषमें कविने स्वयं एक जगह भट्टिनी ( स० स्त्री०) १ नाटककी भाषामें राजाकी वह लिखा है- पत्नी जिसका अभिषेक न हुआ हो। २ ब्राह्मणभार्या । दीपतुल्यः प्रबन्धोऽयं शब्दलक्षणाचक्ष पाम् । भट्टिप्रोल-दाक्षिणात्यकी कृष्णा नदी तीरवत्तीं एक प्राचीन हस्तामर्ष इवान्धानां भवेद्व्याकरणाहते ॥" नगर। यह बेलतुर नगरसे १ कोस पश्चिममें अवस्थित (भट्टि २२।२३) है। यहाँका लआदिब्य नामक सुदृहत् इष्टकस्तूप इसके प्रवाद है, कि कवि भत्तहरि एक राजाके यहां रह कर प्राचीनत्वका निदर्शन है। वह स्तूप प्रायः १७०० वर्ग- उन्हें प्रति दिन व्याकरण पढ़ाते थे। एक दिन राजा गज स्थान तक फैला हुआ है। व्याकरण पढ़ रहे थे, कि उसी समय एक हाथी गुरु भट्टियाना--पञ्जाबप्रदेशके शीर्षा जिलान्तर्गत एक भूभाग। और शिष्यके मध्य हो कर चला गया जिससे उनके पाठ- भट्टि (भाटी) नामक दुद्धर्ष राजपूतजातिके बाससे में बाधा पहुंची। प्रचलित नियमके अनुसार उस घटनासे इस स्थानका भट्टियामा नाम पड़ा है। एक समय हरि- ठीक एक बर्ष तक व्याकरणका पढ़ना बंद रखा गया । उस याना बीकानेर और बहबलपुर आदि स्थान इसी भट्टि समय राजाके व्याकरणकी व्युत्पत्ति स्थिर रखनेके लिये राज्यके अन्तर्गत थे। आज भी घाघरकी उपत्यका कवि भत्तृहरि काव्यच्छलसे ध्याकरणकी रचना कर राजा के उभय पार्श्ववत्ती स्थानोंके ध्वंसावशिष्ट अट्टालिका को वही व्याकरण पढ़ाने लगे। भट्टिकाव्य अध्ययन कर और जनशून्य प्रामादि उस प्राचीनसमृद्ध जातिके गौरव राजाको फिर अन्य व्याकरण पढ़नेका प्रयोजन नहीं पड़ा। का परिचय देते हैं मुगलराज तैमूर शाहने भारतकी. Vol. xv, 177