पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७१२

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७०६ अहिरवार-महो चढ़ाई के समय इस प्रदेशको लूट कर बिलकुल जनहीन | गुरु थे। रामाश्रम शिष्य बत्स्यराज ( १६४१ ई०में ) कर डाला था। अगरेजी अधिकारमें आनेके बादसे यहां और नोलकण्ठने आचारमयूख में इसका उल्लेख किया • पञ्जाव और राजपूतानेके बहुतसे लोग आ कर बस गये। है। अतकौस्तुभ, आचारप्रदोप, अशौचविंशच्छोका, उस समय घघरा नदो बहबलपुरके निकट शतद्र के साथ अशौचनिर्णय, आहिककारिका, कालनिर्णयसंग्रह, गोत्रप्रवर मिलती थी। अभी वह बीकानेरकी' मरुभूमि पर बह | निर्णय, चतुर्विंशतिमुनिमतध्याख्या, चन्दनधारणविधि, कर सूख गई है। १८वीं शताब्दीमें यह स्थान भाटिः | तत्त्वकौस्तुभ, तत्त्वविवेकदीपन व्याख्या, तन्त्रसिद्धान्त दस्युदलके आवासरूपमें गिना जाता था। इस समय | दीपिका, तन्त्राधिकारनिर्णय, तर्कामृत, तिथिनिर्णय, । उन लोगोंने विपदसे अपनेको बचानेके लिये कई एक | तिथिनिर्णयसंक्षेप, तिथि-प्रदोपक, तीर्थयात्राविधि, विस्थ- प्राम दुगादिसे सुद्दढ़ कर लिये थे। १७६५ ईव्में उन्होंने लीसेतु और विस्थलीसेतुसारसंग्रह, दशश्लोकीटीका, यद्यपि जाज टामसकी वश्यता स्वीकार कर ली थी, तो धातुपाठ, प्रायश्चित्तविनिर्णय, प्रौढमनोरमा, बालमनो- भी वे कभी भी अगरेजोंके पदानत नहीं हुए । १८०३ ईमें रमा, मासनिर्णय, लिङ्गानुशासनसूत्रवृत्ति, शब्दकौस्तुभ, लार्ड लेककी विजयके बाद दिल्लोप्रदेशके साथ साथ श्राद्धकाण्ड, सन्ध्यामन्त्रव्याख्यान, सर्वसारसंग्रह, समूचा भटियानराज्य अगरेजोंके दखलमें आ गया। सिद्धान्तकौमुदी (पाणिनि व्याकरणकी वृत्ति ), दान- किन्तु १८१० ई० तक अगरेजराज उक्त प्रदेशका पूर्णा- प्रयोग, भट्टोजिदीक्षितीय प्रभृति प्रन्थ इनके बनाये हुए धिकार प्राप्त न कर सके थे । भट्टिसरदार बहादुर खां मिलते हैं। सिद्धान्तकौमुदी व्याकरण लिख कर इन्होंने और जाबता खाका दमन करनेके लिये उसी साल अष्टाध्यायो पाणिनिसूत्रको प्राञ्जल और सहजबोध कर अगरेजी सेना भेजी गई । बहादुर वा राज्यसे भगा दिया। दिया है। गया और जाबता खाने अवनत मस्तकसे अगरेजोंकी अधी- भट्टोत्पल-एक ज्योतिर्विद् । इन्होंने ७८८ शकमें वृहज्जा- नता स्वीकार कर ली । ७८१८ ईमें जाबता खाने चुपकेसे तककी जगश्चन्द्रिका नामक एक विवृति लिखी है। जब अङ्करेजाधिकृत फतेहाबाद पर चढाई की तव अलावा इसके योगयावाविवरण, लघुजातकटीका, वृहत्- वृरिशसरकारने उसे राज्यच्युत करके उसके राज्य पर संहिताविवृति और बादरायण प्रश्नटीका नामक कई एक अपना दखल जमा लिया। १८३७ ई०में भट्टियाना ग्रन्थ भी इनके रचित मिलते हैं। किसी प्रन्थमें इनका .एक स्वतन्त्र जिलारूपमें गिना जाने लगा। पीछे वह उत्पल आचार्य नाम भी लिखा हुआ देखनेमें आता है। .१८५८ इ० में पावके अन्तर्भुत हो कर शीर्षा नामसे भट्टोद्भट्ट-एक प्रसिद्ध कश्मोरी पण्डित । राजतरङ्गिणी में बजने लगा! लिखा है, कि ये राजा जयापोड़के सभापण्डित थे और भहिरबार--श्रीरइस्तबके प्रणेता । ये वेडटाचार्यके प्रतिदिन १ लाख दीनार पाते थे। इनका बनाया हुआ शिष्य थे। कुमार सम्भव तथा एक अलङ्कार शास्त्र मिलता है। भट्टी (हि स्त्री० ) भट्ठी देखो। (राजतरंगिणी ४४६४) भट्टीय (सं० त्रि०) भट्टसम्बन्धीय, आर्यभट्ट सम्बन्धीय। भट्ठोपम सं० पु. ) एक बौद्धाचार्य । भट्ट वाण-एक राजा था उनका वंश । जैन हरिवंशमें लिखा भट्ठा (हि. पु० ) १ बड़ो भट्ठी। २६ट या स्वपड़े आदि है, कि इस राजवंशने गुप्तराजाओं के पूर्व प्रायः २४० भट्ठी (हिं० स्त्री० ) १ विशेष आकार और प्रकारका ईटों वर्ष तक भारतका शासन किया था। ( जैनहरि ६०८६८) आदिका बना हुमा बड़ा चूल्हा । इस पर हलवाई पक- वान बनाते, लोहार लोहा गलाते, वैद्य लोग रस आदि भट्टोजिदीक्षित--एक विख्यात पण्डित, लक्ष्मीधर सूरिके फूकते अथवा इसी प्रकारके और काम करते हैं। २ देशी पुत्र। ये भानुजी (पीरेश्वर) दोक्षितके पिता और हरिः । मध टपकानेका कारखाना, वह स्थान जहां देशी शराब हरके पितामह तथा कुरुक्षेत्रप्रदीपके प्रणेता कृष्णदत्तके | बनती हो। पकानेका पजाबा।