पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७१८

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भदौरिया-मदगाव नदोके दक्षिणतीरमें आगरानगरके दक्षिण-पूर्वस्थ भदावर राजा हुए थे। सम्राट शाहजहाँके राजत्वकालमें भदौ- जिलेमें रहने के कारण ये भदौरिया' कहलाये। जो रिया-सरदार राजा किसनसिंहको मुगलोंके पक्षसे भदौरिया पूर्वमें रहते हैं, घे अपनेको मिड-वंशीय कहते झाफरसिंह, खान जहान लोदी, निजाम-उल-मुल्क और हैं। परन्तु अन्यान्य भदौरियाओंके अपनेको चौहान- साहू भोसले आदिके विरुद्ध युद्ध करना पड़ा था। यशी ही बताने पर भी चौहान लोग उनके ज्ञातित्त्व : दौलताबादके अवरोधके समय उनकी वीरता चारों ओर स्वीकार नहीं करते। कुछ भी हो, वत्त मानमें उन्होंने व्याप्त हो गई थी। हिजरी सन् २०५३में उनको मृत्यु परस्परमें विवाह-सम्बन्ध द्वारा कुटुम्बिता स्थापन कर होनेसे उनके चचेरे भाई बदन (बुध) सिंहको राज्य ली है। मिला। सम्राट शाहजहां (२१वें वर्षमें ) एक दिन इनमें ६ श्रेणियां पाई जाती हैं, जैसे --अठभइया, राज-दरवारमें बैठे हुए थे, कि इतनेमें वहां एक मत्त हस्ती कुलहिया, मैनू, तसेली, चन्द्रसेनिया और रावत। दला आय और उसने दरबारके एक व्यक्तिको दाँतोंसे इस जातिकी सामाजिक उन्नति और प्रतिष्ठाके घायल कर दिया। यह देख बदनसिंहने शस्त्रसे उस सम्बन्धमें अनेक तरहको किम्बदन्तियां सुननेमें आती हैं। हाथीको मार डाला। सम्राट्ने उनके वीरत्वसे संतुष्ट गोपालसिंह नामक सरदार मुसलमान बादशाह महम्मद हो कर उन्हें एक खिलअत दी और भदायर-राज्यका ५० शाहके बड़े प्रिय थे, इसलिए उन्हें कई जागीरें मिली हजार रु०का कर मोकूफ कर दिया। उसके बाद इन्हें थीं। तभीसे यह सरदारवंश पार्श्व'वत्तीं राजन्यवर्गका डेढ़ हजारी सेनानायकका पद मिला था । शाहजहांके विशेष सम्माना हो गया है। २५वे वर्ष में ये औरङ्गजेव और दाराशिकोहकी तरफसे चंद्रसेनिया, कुलहिया. अठभइया और रावतगण कान्दाहार-युद्धमें गये थे। इसके दूसरे ही वर्ष इनको चौहान, कछवाह, राठौर, चन्देल, शिरनेत, पानवार, मृत्यु हो गई। उनके पुत्र मानसिंह १ हजार पदाति गौतम, रघुवंशी, गहरवाड़, तोमर और गहलोत-वंशीय और ८ सौ अश्वारोही सेनाके नायक हुए। औरङ्गजेबके राजपूतोंकी कन्या ग्रहण करते हैं : तथा चौहान, कछवाह | राज्यमें बुन्दला-विद्रोह और युसुफजैको दमन कर ये और राठौर श्रेणोके उच्च राजपूतव शमें अपनी कन्या देते बादशाहके बडे प्रियपात्र बन गये थे। इनके पुत्र ओदत है। तसेली राजपूत निम्नश्रेणीके राजपूतव शमें विवाह ! ( रुद्र )-सिंह चित्तोरके सेनापति हुए थे। करते हैं। 'आईन-इ-अकबरी'के पढ़नेसे मालूम होता है, 'तवारीख-इ-हिन्द' नामक मुसलमान इतिहासमें लिखा कि उक्त जिलेकी हरकांटा नगरमें इनको राजधानी थी। है कि, सम्राट महम्मदशाहके समयमें महाराष्ट्र सेनाके ये दिल्लीके निकट रह कर दस्युवृत्ति द्वारा मुगलशक्तिकी भदावरमें घुस पड़ने पर सरदार अमरू (अमरत) भी उपेक्षा करते हुए स्वाधीनभावसे अपने राज्यमें विच सिंहने स-सैन्य अग्रसर हो कर उससे युद्ध किया था। रण किया करते थे। सम्राट अकबरशाहने इनके अत्या- युद्ध में जयो होने पर भी महाराष्ट्रोंने लूट कर उनके चारोंसे उकता कर भदौरिया सरदारको हाथोके पैरों तले राज्यको तहस नहस कर दिया था। दवा कर मरवा दिया था। फिर इन्होंने दिल्लीको भदौरिया (हिं० वि० ) भदावर प्रान्तका, भदावर-संबंधी। पश्यता स्वीकार कर ली। भदगांव-बम्बई प्रदेशके खान्देश जिलेका एक नगर । यह परवती भदौरिया सरदार राजा मुकतमनने मुगल- अक्षा० २०४० उ० तथा देशो०७५१४ पू० गिराना सम्राटके अधीन कार्य किया था और वे १ हजारी मन | नदीके बाए किनारे अवस्थित है। जनसंख्या ७६५६ है। सबदार पदके अधिकारी हुए थे। वे हिजरी सन् ९में १८६६ ३०॥ १८६६ ई में यहां म्युनिस्पलिटी स्थापित हुई है । र, नील और तीसोका वाणिज्य जोरों चलता है । १८७२ ई०- युद्धार्थ गुजरात भेजे गये थे। बादशाह जहांगोरके को इस नगरका अर्द्धाश बह गया था। अधिवासियोंकी समयमें राजा विक्रमजित्ने मुगल-सेनाके सहकारी रूपमें महती क्षति हुई थी। शहरमें सब-जजको अदालत, पुद्ध किया था। उनकी मृत्युके बाद उनके पुत्र भोज ' अस्पताल और चार स्कूल हैं।