पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७३०

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भदिलपुर-भद्रेश्वरसूरि "मगला पिंगला धन्या भ्रमरी भद्रिका तथा। । वत्ती एक कुण्डके सामने माता माशापुरीका मन्दिर उल्का सिद्धा शङ्कटा च योगिन्यष्टौ प्रकीर्तिताः ॥" , विद्यमान है। बहुत पहले बौद्ध और जैनधर्मने यहां पर (वृहज्जातक ) प्रतिष्ठालाभ किया था। यहांका जैनमन्दिर जनसाधारण- भरणो, मघा, ज्येष्ठा और उत्तरभाद्रपद नक्षत्रमें जन्म के विशेष आदरकी सामिप्रो है । जो सब प्राचीन निदर्शन होनेसे भद्रिकाकी दशा होती है। इस दशाका भोगकाल आज भी मन्दिरादिके गात्रमें प्रथित देखे जाते हैं वे ५ वर्ष है। इस दशाकालमें मनुष्य सुख, लाभ, यश, | ११२५ ई०के परवत्तींकालमें जगदेव शाह नामक किसी संतोष, धर्म, भोग, स्त्री और पुत्रसम्पन्न होता है। इन बनियेसे रक्षित हुए थे। उक्त महाजन ने भरे श्वर नगरको सब दशाओंकी भो फिर अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर्दशा है। दानमें पा कर उसके मन्दिरादिका जोर्णसंस्कार किया तदनुसार फल स्थिर करना होगा। (फ० ज्योति०) था। उसी समय प्राचीन निदर्शन यहांसे हटा लिये ३ वृत्तरत्नाकरोक्त नवाक्षर-पादक छन्दोभेद । इस गये थे। का लक्षण-- "भद्रिका भवति रो नरौ” (वृत्तरत्ना.)४ | १२वी और १३वीं शताब्दीमें यह स्थान तीर्थक्षेत्ररूप गुञ्जा। में गिना जाने लगा। इसी समयसे यहां तीर्थ यात्रियोंको भद्रिलपुर - एक प्राचीन नगर । (जैनहरि १८।११) भारी भीड़ होने लगी, शिलालिपिसे इसका प्रमाण भद्रेश ( सं० पु०) शिवलिङ्गभेद । मिलता है। ११वीं शताब्दीके शेषभागमें मुसलमानोंमे भद्रेश्वर ( सं० पु० ) भदः शुभदश्चासावीश्वरश्चेति : इस मन्दिरको लूटा। इस समय जैन-तीर्थङ्करोंकी अनेक भद्रात्मकः मङ्गलमय ईश्वरो वेति । १ कल्पग्रामस्थित शिव- मूर्तियां नष्ट कर डाली गई। मुसलमानोंके इस उपबके मूर्ति। इस भद श्वर शिवके दर्शन करनेसे चक्रतीर्थ- । बादसे यह स्थान विलकुल जनशून्य हो गया है । अभी गमनका फल प्राप्त होता है। २ महादेवको पाने के लिये इसके मन्दिर और दुर्गादिका ध्वंसावशेष वर्तमान मुन्द्रा- पार्वती द्वारा आराधित हिमायस्थित पार्थिव शिवलिङ्ग। वन्दरका घर बनानेमें व्यवहृत होता है। स्थानीय पीर (वामनपु० ४६ अ०) लालशोवकी दरगाहमें अरबो भाषामें लिखित एक शिला- ३ गङ्गाके पश्चिमी किनारे गरिटाख्य प्रामके उत्तरमें : फलक देखा जाता है। प्रावोन भद्रावतीका कुछ अंश अवस्थित पाषाणमय शिवलिङ्ग और ग्राम । ४ तीर्थ- वर्तमान नगरवक्षमें अवस्थित है। विशेष। भटू श्वर--बङ्गालके हुगली जिलान्तर्गत एक नगर । यह "श्रीशैले माधवी नाम भद्रा भद्रेश्वरे तथा ।" (मत्स्यपु०)। अक्ष० २४.१६ उ० तथा देशा० ८७° ५७ पू० इष्ट- यहां पर भदा नामक शक्तिमूर्ति विद्यमान है। इण्डियन रेलवेके नवादा टेशनसे ४ मील दक्षिणमें भष- भद श्वर-महार्थमञ्जरी टोकाके प्रणेता। स्थित है । जनसंख्या चार सौके करीब है। यहां रेशमका भद श्वर-राजतरङ्गिणी-वर्णित एक राज-कर्मचारी। ये कारबार होता है। कायस्थ कुलोद्भव थे। राजकर्ममें नियुक्त हो कर इन्होंने भद्रेश्वर आचार्य-एक ग्रन्थकार । गणरत्नमहोदधिमें इनका जनसाधारणके ऊपर अत्याचार आरम्भ कर दिया था। नामोल्लेख है। (राजतर० ७१३८-४४ ) : भद्रेश्वरसूरि-१ एक वैयाकरण, दीपक नाम व्याकरण भद, श्वर--बम्बर प्रदेशके कच्छ प्रदेशके अन्तर्गत एक ग्रन्थके प्रणेता। २ चन्द्रगच्छके अन्तर्गत सूरिभेद । ये प्राचीन नगर। यह भदावती नामसे प्रसिद्ध है। यहांकी । अभयदेव और देवभद्रके गुरु थे। सिद्धसेनकृत प्रवचन- सुप्राचीन ध्वंसावशिष्ट अट्टालिकाओं के प्रस्तरादि ले कर सारोद्धार और बालचन्द्रकी विवेक मजिरीटीका पढनेसे दूसरी जगह गृहादि बनाये गये हैं। दो ध्वस्तप्राय मालूम होता है, कि ये १२ सम्बत्के शेषभागमें विधमान मसजिद और एक शिवमन्दिरका स्तम्भ तथा गुम्बज थे। ३ एक जैनसूरी। राजा जयसिंहके समसामयिक आज भी इसकी प्राचीन स्मृतिका परिचय देते हैं । निकट- जैनाचार्य देवतरिके शिष्य थे। उनकी सतीर्थ रत्नप्रमा