पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७३६

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


भरका-भरत पाला एक प्रकारका पक्षी। यह अकसर दलदलोंमें ही इस नक्षनमें जन्म लेनेसे मेषराशि और शुक्रकी दशा रहता है और अकेला । कभी कभी दो तोन भी एक साथ होती है। वह व्यक्ति सर्वदा. धान्यादि वस्तुके क्रय- दिखाई देते हैं। मांसके लिये इसका शिकार किया जाता विक्रयमें नियुक्त, कर-स्वभाव, दीर्घशरीर-सम्पन्न, उत्तम है। (स्त्री०)२ भड़क देखो। वीर्यवान्, विदेशवासी और वैरपक्ष-विजयी हुआ भरका (हिं० पु०) १ वह जमीन जिसकी मट्टी काली करता है। (कोष्ठीकलाप) और चिकनी हो। सूखने पर वह सफेद और भुरभुरी भरणीभू ( स० पु० भरणी भूरुत्पत्तिस्थानं यस्य । हो जाती है । यह प्रायः जोती नहीं जातो । २ भरक देखो। राहुग्रह । भरकी (हिं० स्त्री० ) भरका देखो। भरणीय ( स० वि० ) भृ-कर्मणि अनीचर्। भरणयोग्य, भरकूट (हि० पु०) मस्तक, माथा। पालने पोसनेके लायक। भरके (हिं० अध्य० ) एक संकेत जो पालकी ढोनेवाले : भरण्ड ( स० पु०) विभत्तीति भृ ( अगुण कृस भृ वृश्ः । कहार नाली आदिसे बच कर चलनेके लिये करते हैं। उण २११२८) १ स्वामी, मालिक। २ भूपाल, राजा।३ भरचिंटो ( हिं० स्त्री० ) एक प्रकारको घास जो हिसार : वृष, बैल । ४ भू, पृरः ।। ५ मि, कीड़ा। प्रान्तमें होती है। वर्षाऋतुमें यह अधिकतासे उगतो है। . भरण्य (सं० क्लो०) भरणे साधुः (तत्र साधुः। पा ४।४।६८) पशु इसे बड़े चावसे खाते हैं और यह पुष्टिकारक भी है।' इति यत् । १ मूल्य, दाम। २ वेतन, तनख्वाह । भरट (स० पु०) विभोंति भृ. ( जनिदाच्युमृवृमदिशमिनमि- : भरण्यभुज् ( स० त्रि०) भरण्यं वेतनं भुनक्ति इति-भुज- भञ्भ्य इत्वन्निति । उण ४।१०४ ) इति अटच । १ कुम्भ- विप्। कर्मकर, वह जो मजदूरो ले कर काम करता कार, कुम्हार । २ सेवक, नौकर। हो। भरटक (सपु० ) संन्यासि-सम्प्रदायविशेष । भरण्या ( स० स्त्री० ) भरण्य अजादित्वात् टाप् । चेतन, भरटिक ( स० वि० ) भरटेन हरति भस्त्रादित्वात् ठन् तनख्वाह । (पा ४।४।१६) १ भरट द्वारा हरणकारी। स्त्रियां ङीष । ' भरण्याह्वा ( स० स्त्री० ) भरण्या आह्वा यस्याः। पर्व- २भरटिकी। पुष्पी, रामदूती। भरण ( स० क्लो० ) म्रियतेऽनेनेति भृ-करणे ल्युट् । १ भरण्यु ( स० पु० ) कण्ड्डादि गणीय भरण्य धातु वेतन, तनख्वाह । भृ-भावे-ल्युट । २ पोषण, पालन। ३ बाहुलकात् उण । १ शरन्यु, मेघ । २ मित्र । ३ भरणी नक्षत्र । ४ किसीके बदले में जो कुछ दिया जाय, अग्नि । ४ इन्द्र। ५ ईश्वर । ६ पृष, बैल । भरती। | भरत ( स० पु०) विभर्ति स्याङ्गमिति विभर्ति लोका. भरणी (सं० स्त्री० ) भरण-गौरादित्वात् ङीप् । १ घोषक निति वा ( भृ-मृदृशिवजीति । उण ३।११० ) इति अतच । लता। २ अश्विनी आदि सत्ताईस नक्षत्रोंमेसे १ नाट्यशास्त्र। २ मुनिविशेष । ये अलङ्कारादि शास्त्रोंके द्वितीय नक्षत्र । पर्याय---यमदैवत । ( हेम ) इस नक्षत्र- सृष्टिकर्ता थे। भरतस्य शिष्यः तस्येदमित्यण, अणोलुक् । का अधिष्ठात्री देवता यम है। इसकी आकृति त्रिकोण ३ नट । ४ रामचन्द्रजीके छोटे भाई। ५दुष्मन्तके पुत्र । है, और तीन कोणोंमें तीन दीप्यमान तारका है। ६ शवर । ७ तन्तुवायु, जुलाहा । ८ क्षेत्र, स्खेत । "तारकाप्रयागते त्रिकोणके मध्यगे दिविषदध्वनो यमे । ६ भरतात्मज । दुष्मन्तराजपुत्र भरत के पर्याय - शाकुन्त- पकजाक्षि गणिताः कुलीरतः सांयकाक्षि भुजसत्यकाः कलाः ॥" लेय, दौमन्ति, सर्वदमन । १० वह्निपुत्रभेद । ११ भौत्य- (कालिदास-कृत रात्रिलग्नमान ) मनुके एक पुत्रका नाम । १२ आयुध-जीविसङ्घभेद । यह नक्षत्र उग्रगण और अधोमुखगणों के अन्तर्गत है। १३ । ऋत्विज्। शतपदचक्रानुसार नामकरेणके स्थानमें इस नक्षत्रमें भरत ( स० पु. ) कैकयीके गर्भसे उत्पन्न राजा प्रथमादि चार पदोंमें लि, लु, ले, लो इत्यादि अक्षर होंगे। दशरथ के पुत्र । रामायणके पढ़नेसे मालूम होता है कि