पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७४२

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गवरतन सिंह सूयमल्लके पुत्र । मरतपुर, बलवन्त सिंहासनके प्रकृत उत्तराधिकारी हुए। किन्तु | जानसे मार डाला। इस पर वृटिश सरकारने इन्हें सिंहा- रणजित्के पौत्र दुर्जनशालने १८२६ ई०में भरतपुर-दुर्गको सन परसे हटा दिया और उनके लड़के किशनसिंहको अधिकार कर बलवन्त को कैद रखा। इस अत्याचारको राजगद्दी पर बिठाया। इनका जन्म १८६६ ई में हुभा। रोकने के लिये लार्ड कम्बरमियर (Loral comhermere) ये हो वर्तमान महाराजा है। इनका पूरा नाम है-एच, २५ हजार सेनाके साथ भरतपुरको ओर दौड़ पड़े। एच महाराजा श्रीवृजेन्द्र सगाई किशन सिंह साहब दहा- अवरोधके समय जब उन्होंने देखा, कि दुर्गका प्राकार | दुर जङ्ग। चूडामन जाट कत्र्तक भरतपुर राज्यकी प्रतिष्ठा दुर्भध है, तब नीचे सुरंग खोदनेका विचार किया। होनेके बाद यहां निम्नलिखित राजाओंने शासनदण्ड २३वी दिसम्बरसे । ७वों जनवरी तक एक सुरंग खोदी धारण किया था- गई । १८वों जनवराको उसी सुरंगसे जा कर अंगरेजों भरतपुरके राजवंश । को सेनाने दुर्गको फतह किया और दुर्जनशाल अंगरेजों चड़ामनजाट के हाथ वन्दी हुए। राजा बदनसिंह चूड़ामनके पुत्र । ____ अंगरेजोंके अनुग्रहसे वालक बलवन्तसिंहने " सूर्यमल्ल - वदनके पुत्र पितृपद और मर्यादाको प्राप्त किया और उनको माता राजकार्यको परिदर्शक हुई । १८३५ ईमें बालिग हो कर जवाहिर सिंह " । उन्होंने शासनभार अपने हाथ लिया। १८ वर्ष राज्य ' करनेके बाद ही थे इहलोकसे चल बसे । बादमें उनके पुत्र " खड्गसिंह-रतनसिंहके पुत्र। महाराज यशोवन्त सिंह पितृसिंहासन पर अधिरूढ़ हुए। " नवाल सिंह--सूर्यमलके तृतीय पुत्र और रतन. इस समय उनकी उमर सिर्फ एक वर्षकी थी। इस कारण के भाई। अंगरेजोंके राजकीय कर्मचारी और ७ सामन्तराज-गठित रणजित् सिंह-नवालके भतीजे । एक सभा द्वारा राजकार्यकी पर्यालोचना होने लगी। रणधीर-रणजित्के पुत्र । १८६६ ई०में बालिग हो कर उन्होंने कुल शासनभार अपने __, बलदेव-रणधीरके भाई । हाथ लिया। १८७७ ई में उन्हें जी. सी. एस. आई-को , बलवन्त-बलदेवके पुत्र । उपाधि मिली और सलामी तो १७ से बढ़ा कर १६ कर महाराज यशोवन्त-बलवन्तके पुत्र । दी गई । इनके राजत्वकालमें जो सब घटना घटों वह राजा रामसिंह यशोवन्तके ज्येष्ठ पुत्र । यों हैं-१८७३-४ ई०में रेलवे लाईन खोलो गई, १८७७ महाराज किशेन सिह-रामसिहके पुत्र । ई०में दुर्भिक्ष पड़ा, नमकका कारबार बंद कर दिया गया, ( वर्तमान शापनकर्ता ) शराब, अफीम तथा अन्य मादक वस्तुको छोड़ कर शेष यह जाटराज्य चूड़ामनके पहले व्रज नामक किसी जाट पण्यद्रष्य परसे महसूल उठा दिया, अश्वारोही और सरदार द्वारा दीगके अन्तर्गत सिनसिनी प्राममें बसाया पदाति सेनाको संख्या बढ़ा दी गई । १८९३ ईमें यशोवन्त गया था। चूडामनिने अपने वीरोचित साहससे लूट सिंह इस धराधामको छोड़ सुरधामको सिधारे। पोछे पाट द्वारा काफी रकम इकट्ठी कर ली थी। उसी रकमसे उनके बड़े लड़के रामसिंह राजतख्त पर बैठे। कर। उन्होंने एक दुर्ग बनवाया और जाटजाति तथा भरतपर- मिजाजके थे, प्रजा इनसे तंग तंग रहती थी, राज-कार्यको राज्यको रक्षा की थी। ओर ध्यान भी कम था। इन सब कारणोंसे १८६५ ईमें यहांके कमान नगरमें श्रीकृष्णको जो मूर्ति है वह इनका अधिकार छीन लिया गया। पोछे दीवान और हिन्दुओंके निकट पवित्र तीर्थ में गिनी जाती है। कुम्भार पालिटिकल एजेण्ट द्वारा राजकार्य चलने लगा। १६०० नगरके पास भी बलदेव, रोहिणी, युधिष्ठिर, आदि का ई० में रामसिंहने गुस्से में मा कर अपने एक नौकरको | महापुरुषोंको मूर्ति विद्यमान है। धयाना तहसीलसे