पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७४५

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७३६ थी, दूसरे गर्भ के लिए वहां स्थान न था; अतः गर्भ-। स्खलन हो गया। उस रेतःको द्रोणमें रखा गया, स्थित बालकने वृहस्पतिको वीर्यसेक करनेके लिए निषेध बादमें उसीसे द्रोणाचार्यका जन्म हुआ था। किया। वृहस्पति कामान्ध हो रहे थे, गर्भस्थ बालकके . .. द्रोणाचार्य देखो । निषेध करने पर उन्होंने क्रुद्ध हो कर “अन्ध हो" कह रैभ्यके साथ इनको मातिशय बधुता थो । भरद्वाज- कर उसे शाप दिया और बलपूर्वक वीर्यसेक किया। के पुत्र यवक्रोतके द्वारा रैभ्यको पुत्रवधूका सतोत्व नष्ट . वृहस्पतिके शापसे वह पुत्र अन्धा हो गया ! बादमें होने पर रैभ्यने उसे मार डाला। भरद्वाजने इस भीतरों गर्भ स्थित बालकने पाणि प्रहार द्वारा वृहस्पतिके वोय. वृत्तान्तोंको बिभा जाने ही रैभ्यको शाप दे दिया कि वह को योनिसे बाहर कर दिया। उसे शुक्रके बाहर गिरने विना अपराधके ज्येष्ठ पुत्र द्वारा मारे जावे । बादमें सब ही उससे उसी क्षणमें एक पुत्र उत्पन्न हुआ। । हाल मालूम होने पर वे दुःखित हृदयले अनलमें जल पति व्यभिचारिणी जान कही परित्याग न कर दें। कर मर गये, किन्तु रैभ्यके पुत्र अर्वा वसुके तपःप्रभावसे इस भयसे उतथ्य-वनिता ममताने उस पुत्रको त्यागना पुनर्जीवित हुए प्रयागमें इनका आश्रम था। द्वादश द्वापर- चाहा, किन्तु वृहस्पतिके निषेध करने पर उनके साथ में भरद्वाज ध्यास थे। ( देवीभा० १।३।२६) ममताका विरोध उपस्थित हुआ। तव वृहस्पतिने भावप्रकाश, भरद्वाजका ऐसा प्रसङ्ग पाया जाता ममतासे कहा कि, 'यह बालक एकके क्षेत्रमें दूसरे के ! । है -- दैवयोगस एक दिन बहुसंख्यक महर्षि हिमालय वोर्यसे उत्पन्न हुआ है, सुतरां यह तुम्हारे स्वामीका भो

पर्वत पर किसी एकान्त स्थानमें मिल कर प्राणियोंके

पुत्र हुआ। भर्त्तासे तुम डरो मत, तुम इसका भरण- . ध्याधिप्रशमनको उपाय-चितामें निरत थे। परंतु कोई पोषण करो' इस पर ममताने कहा, 'तुम भी इसका पोषण " भी इसके लिए सद्युक्ति स्थिर न कर सके। तब सबने करो। हम दोनोंसे अन्यायरूपमें इस बालकका जन्म मिल कर भरद्वाज मनिसे कहा-'भगवान् ! आप हो इस हुआ है, अतः मैं अकेली क्यों पोषण करू?' विपत्तिसे उद्धार करनेमें एकमात्र समर्थ हैं। मतपव पिता और माता अर्थात् बृहस्पति और ममता एक . आप सुरपुरमें जा कर सहस्त्रलोचन इन्द्रके निकट आयु- प्रकारसे विवाद करते करते उस वालकको छोड़। वेद शास्त्र अध्ययन कर हमलोगों को शिक्षा दीजिए, कर चले गये। इस कारण वालकका नाम भरद्वाज तभी हम सब आयुर्वेदका मम समझ सकते हैं और हुआ। वृहस्पति और ममताके छोड़ कर चले जाने जगत्का कल्याण-साधन करने में समर्थवान हो सकते पर मरुद्गण उस बालकको उठा ले गये और उन्होंने उसका प्रतिपालन किया। भरतके पुत्र सम्भावना वितथ होने पर अर्थात् पुत्र होने भरद्वाज ऋषियोंके प्रस्ताव पर सम्मत हो कर सुरपुर को सम्भावना न रहने पर उन्होंने मरुत्स्तोम यज्ञका अनु गये। वहां कुछ समय रह कर इन्द्रसे निस्कंध हेतु, छान किया। मरुद्गण इस यज्ञसे बहुत संतुष्ट हुए लिङ्गीषध और ज्ञानात्मक अर्थात् रोगका निदान, रोगका और उन्हें पुत्रदान दिया। इसलिए भरद्वाजका नाम लक्षण और औषधक्षापक समस्त आयुर्वेदका यथाविधि अध्ययन कर मरधाममे आये और उन ऋषियों को शिक्षा वितथ हुआ। इनके पुत्र मनु थे। (भाग० ६।२०, २१ अ०, विष्णुपु ० ४।१६ अ०) दी । उनको उस शिक्षासे हो क्रमशः आयुर्वेदका महाभारतमें लिखा है-किसी समय ये हिमालय पर प्रचलन हुआ। (भावप्रकाश ) तपस्या करने गये। इसके कुछ दिन बाद एक दिन वे २ पक्षीविशेष, एक चिड़िया। पर्याय--व्याघ्रराट गडामें स्नान करने गये, उस समय घृताची अप्सरा भरद्वाजक। ३ गोत्रभेद, एक गोत्रका नाम । (मनु) वहांसे जा रही थी, देवसे हवाके मकोरेसे उसके वसन (लि०) ४ संभ्रियमाण हविर्लिक्षणान्नयुक्त यजमानादि । खुल गये । घृताचीको नग्नावस्थामें देख कर मुनिका रेत:- (सारण)