पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७४८

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७४२ भराड़ी-भरु ये मराठी भाषामें बात करते हैं और साधारणतः! की प्रथा है। उस समय अशौचका प्रधान अधिकारी इनको पोशाक महाराष्ट्रीयोंकी तरह होती है। स्त्री और मिट्टोके बरतनमें आग रख कर आगे आगे और भन्यान्य पुरुष दोनों हो गहने पहनते हैं। पुरुष सिर घुटा कर लोग शिङ्गा बजाते हुए पोछे पीछे चलते हैं। समाधि चोटो रखते हैं। 'गोन्धल' नाचके समय ये लोग नाना अलङ्कारोंसे सुसज्जित हो कर गाजे बाजेके साथ तुलजा- में गाड़ देते हैं। गाड़नेसे पहले मृतदेह पर फूल, बिल्वपत्र भवानी और भैरवनाथके गीत गाते हैं। नवरात्रउत्सवके और पानी भी देते हैं। अशौचाधिकारी धूप ले कर तथा समय इस नृत्यगीतके लिए प्रत्येक कृषकसे इन्हें धान्यादि- और सब उसके पीछे पीछे कनकी प्रदक्षिणा देते हैं। को कुछ न कुछ वार्षिक सहायता प्राप्त होती है। यह शवबाहिंगण मृतके घर आ कर नीमके पत्ते चबानेके बाद नृत्य और देवदेवीका सगोत सूर्यास्तसे ले कर प्रातःकाल अपने अपने घर चले जाते । तीसरे दिन अशौचाधि- तक होता है। इस तरह नाच गा कर ये जो कुछ भी कारी फिर समाधिस्थानमें जाते और पूर्ववत् कमें अर्थ उपार्जन करते हैं, उसीसे इनकी गुजर हो जाती है। फूल आदि चढ़ा आते हैं। उसके बाद उसे शव वाहियों- भविष्यके लिए ये कभी भी अन्न इकट्ठा करके नहीं रखते। का कंधा मलना पड़ता है। इनमें प्रकृत अशौच वा ये लोग साफ सुथरे होते हुए भी आलसी बहुत हैं। पिण्डदानादिकी व्यवस्था नहीं है। तीन दिनके बाद दरिद्र होने पर भी इनकी धर्ममें मति पूर्णतः है। ये किसी भी दिन भोज देने मात्रसे ये सब कार्यसे निवृत्त सभी हिन्दू-देवदेवियोंकी भक्ति करते हैं। प्रत्येक पूजा हो जाते हैं। और पर्वादिके समय उपवास करते हैं। जेजुरि, माहुर, भरापूरा ( हिं० पु० ) १ सम्पन्न, जिसे किसी चीजका पण्ढरपुर, सोनारी, तुलजापुर आदि तीर्थस्थ देव दर्शनके अभाव न हो । २ जिसमें किसी बातकी न्यूनता न हो। लिए इनमें बड़ी उत्सुकता पाई जाती है। सर्वसाधारण भराव (हिं० पु०)१ भरनेका भाव , भरत । २ भरनेका इन्हें नाथ सम्प्रदायी समझते हैं। प्रामके जोशी लोग काम । ३ कसीदा काढ़नेमें पत्तियों के बीचके स्थानको इनके यहां पौरोहित्य करते हैं, फिर भी कनफटा' गुसाई- तागोंसे भरना। से मन्त्र प्रहण करते है। गुरुके प्रति इनकी अचला भरिणी (सं० स्त्री०) मनो विभर्ति हरतीति भृ-णिनि भक्ति है। गौरादित्वात् डोष, पृषोदरादित्वात् पूर्वादोधैं साधुः । डाइन, प्रेतयोनि आदि पर इनका विश्वास है। जन्म. हरिद्वर्ण, पीला कर्णवेध, विवाह और मृत्यु-विषयक चार संस्कार इनमें भरित ( हिं० वि०) भरोऽस्य जातः इतच, पृषोदरादित्वात् यथारीति पाये जाते हैं। ५से ८ वर्ष तक बच्चेके कान साधुः । १ हरिपूर्ण, पीला। २ पुष्ट, भरा हुआ । ३ जिस छेद दिये जाते हैं। उस समय गुरुके सामने बालक का भरण या पालन-पोषण किया गया हो। या बालिकाको कान छिदा कर पीतल या सींगकी बाली भरिमन् (सं० पु०) भृ ( ह भ धृ स स्तृशभ्य इमनिच् । उण पहनायी जाती है। ४११५७ ) इति भावे इमनिच् । १ भरण। २ कुटुम्ब । इनमें दालविवाह, बहुविवाह और विधवा-विवाह भरिया (हिं० वि०) १ पूर्ण करनेवाला, भरनेवाला ।२ प्रचलित है। विवाह-संस्कार लगभग अन्यान्य निकृष्ट ऋण भरनेवाला, कर्ज चुकानेवाला (पु.) ३ वह जो जातियोंके समान है। सामाजिक झगड़ा उपस्थित होने बरतन आदि दालनेका काम करता हो, ढलाई करने- पर इन लोगोंको पंचायत-सभाका आदेश मानना पड़ता वाला। है। चौगुला, पाटील और खारभरी लोग इनके नेता भरिष (सं० स्त्री० ) भरणकुशल । हैं। अन्यान्य सभी लोग उक्त नेताओंका विशेष सम्मान भरी ( हिं० स्त्री० ) एक तौल जो दश माशे या एक रुपये- करते हैं। के बराबर होती है। इनमें शवदेहको थैलेमें भर कर समाधिक्षेत्रमें ले जाने- भरु (सं० पु०) भरति विभर्ति जगदिति भृष-भरणे