पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७५०

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


भरोच भरुकच्छ है । पाश्चात्य भौगोलिक टलेमी तथा पेरोप्लस- भरोचपतिके विरुद्ध युद्धयात्रा कर दी । इस युद्ध में भरोच ने 'बरुगज' ( Rarugazia ) शब्दमें इस स्थानका नामो- नगर और १६२ गांव अगर जोंके हाथ लगे तथा ल्लेख किया है। हिन्दुओं के प्राचीनपुराणमें इन लोगों-- अङ्रेज सेनापति ओडारवरण मारा गया। १७८३ ई०में का तथा उस देशके वासियोंका उल्लेख रहने पर भी इन- अंकलेश्वर, हसोंत, देहेजवाड़ और आमोद आदि प्रदेश का उस प्राचीनतम समयका इतिहास नहीं पाया अङ्गर जाधीन रहे: सालवाईकी सन्धिमें अगरेजोंने पूर्व- जाता। शिलालिपि पढ़नेसे जाना जाता है, कि ४थी : जित राज्य महादजी सिन्दियाको और परवत्ती अधिकृत वा ५वीं शताब्दीमें गुजरवंशीय दहवंशधोंने भरुकन्छमें स्थान पेशवाक हाथ सौंपा। १६ वर्ष तक यह स्थान अपना राजत्व फैलाया था *। बलभीराज ४र्थ ध्रुव- महाराष्ट्रोंके अन्तर्भुत था । १८०३ ई०में अगरेजी सेनाने सेनने ३३० शकमें भरुकच्छको विजय कर शामन सिन्दराजके अधिकृत गुजरात प्रदेश पर चढ़ाई की और विस्तार किया था। भरोच नगर. अधिकार कर लिया। १८१८ ई० में पूना- गुर्जरराज जयभट्ट और दद्द १म पहले सामन्तराज कह की सन्धिके बाद तीन और उपविभाग इसके अधीन कर परिचित हुये थे । ४००-४१७ शकमें उत्कीर्ण २य हुए। १८२३ ई०का कोलिविद्रोह और १८५७ ई०का दह (प्रशान्तराग) की शिलालिपिमें एकमात्र महाराजा- मुसलमान तथा पारमीगणोंका परस्पर विवाद यहांकी धिराज नाम मिलता है। बाद इसके यहां राष्ट्रकूट राज- उल्लेखयोग्य घटना है। वंशका श्रभ्युदय हुआ। कावी नगरसे प्राप्त राजा ३य विचार विभागकी सुविधाके लिये यह जिला आमोद, गोविन्दकी ७४६ शकमें उत्कीर्ण शिलालिपिसे जाना जाता भरोच अंकलेश्वर, जम्बूसर और बना नामक पांच प्रधान है, कि भरोचनगरमें उन लोगोंकी राजधानी थी (३)। नगरों के नाम पर हो उक्त पांच तहसील संगठित की १६१६ ई में वाणिज्य विस्तार हेतु अगरेजोंने यहां गई। यहां १५ प्रधान तीर्थ है जिनमें ११ हिन्दूके और एक कोठी खोलो । इससे पहले यह स्थान देशीय शेष मसलमानके हैं। शक-तीर्थ.भारभत और करोड सामन्तों और मुसलमान नवाबोंके अधिकारमें था, किंतु : नामके स्थानमें बड़ा मेला लगता है। इसमें कभी कभी उस समय यहां कोई उले खयोग्य घटना न घटी । १७५६ : लाखसे भी ऊपर मनुष्य समागम होते हैं। ईमें सुराष्ट्र दुर्ग पर चढ़ाई के बाद, अङ्गरेजोंने पहले : १८२० ई०में यहां देगम, टंकारी, गन्धार, देहेज भरोच स्थानीय शासनकर्ताओंके साथ राजकीय सम्बन्ध जोडा : नामक पांच बन्दरगाह थे। उनमेंसे भरोच और टंकारी था किंतु सुराष्ट्र में राजकीय शासनदण्ड धारण करनेके बन्दरमें आज भी वाणिज्य चलता है । कुछ दिन बाद राजस्खसंक्रान्त प्रश्नोत्तरमें अगरेजों और २ उक्त जिलेका एक उपविभाग। भू-परिमाण ३०२ भरोचपतिके बीच विरोध खड़ा हुआ। तदनुसार १७७१, वर्गमील है । यहांका नम दानदी तीरवत्ती स्थान ई०में सूरतके नवाबके विरुद्ध अङ्गरेजी सेना भेजी गई। उर्वरा है। अगरेजी सेना इस युद्ध में पराजित हो वापस आई, किंतु ३ गुजरात प्रदेशके भरोच जिलेका प्रधान नगर। दूसरे वर्ष भरोच नवाबके अगरेजोंको स्वीकृत चार लाख यह नर्मदा नदीके दक्षिण किनारे मुहानेसे १५ कोसकी रुपये देने में अक्षम होने पर १७७२ ई०में अगरेजोंने पुनः दूरी पर अवस्थित है । यह अक्षा० २१ ४३ उ. तथा देशा० ७३ २ पू० के मध्य अवस्थित है ।

  • Indian Antihary, tol. I'. P, 110-1155 , नर्मदा नदोके उस पारसे देखनेसे नगरकी शोभा अति

पा कारण, शिलालिपिमें उनकी ठाकुर, समधिगत पञ्चमहाशब्द, मनोरम जान पड़ती है। स्थानीय प्रवाद है, कि अनहिल और महासामन्ताधिपति आदि उपाधि देखी जाती है। 11td, : बाउपति सिद्धराज जयसिंहने १२वीं शताब्दीमैं नदीके Ant, vol lll, p. 633 vol vil p, 199 किनार प्रस्तर-प्राचीर तथा अपर तीन दिशाओं में (१) Indian Antinnary vol, v, P, 151 प्राकार और परिखादि निर्माण किये थे । मिरट-इ सिके