पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७५२

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७४ भरोष्टी-भत्त गुड़, चावल आदि यहांका प्रधान वाणिज्य द्रव्य है। जो आश्रयमें रहता हो । ३ विश्वसनीय, जिसका भरोसा यहाँका 'वास्ता' नामक सूक्ष्म वस्त्र और अन्यान्य प्रकार किया जाय। के केलिको वस्त्रके हेतु ओलन्दाज और अङ्गरेज-वणिक भरौंट ( हिं० पु० ) राजपूतानेमें अधिकतासे मिलनेवाली यहां कोठी खोलनेको बाध्य हुये हैं। बम्बई, सुराष्ट्र, अह- एक प्रकारको जङ्गली घास। पशु इसे बड़े बावसे खाते मदावाद आदि स्थानों में कपड़े बुननेको कल आदि हैं। इसमें छोटे छोटे दाने या फल भी लगते हैं जिनके स्थापित होने पर भी यहांका हाथका तांत ( देशीय वस्त्र-। चारों ओर कौटे होते हैं। पयनयन्त्र) आज भी अप्रतिहत है। केवलमात्र कुछ जुलाहे भरोतो (हिं० स्त्रो०) वह रसीद जिसमें भरपाई की गई उन्नतिको आशासे बम्बई गये हैं। इस प्राचीन नगरमें हो, भरपाईका कागज। बहुत-सी प्राचीन हिन्दू और मुसलमान कीर्तियां रक्षित भरौना (हिवि.) बोझल, वजनी। हैं। मुसलमानोंके आधिपत्यकालमें बहुत-से प्राचीन भर्ग ( स० पु०) भृज्यते कामादिरनेनेति भृज-हलश्वेति'. हिन्दू, जैन या बौद्ध मन्दिर विध्वस्त हुए तथा उसी : घञ् । १ शिव । २ वोतिहोत्रके पुत्र । ३ आदित्यान्तर्गत जगह उसके प्रस्तरादि द्वारा मुसलमानकी मजजिद तेज। ४ भर्जन भाड़में भूना हुआ अन्न। ५ धृष्टकेतु बनाई गई हैं। . वंशीय नृपभेद । ६ देशभेद ।। १ जमा मसजिद, २ बाबा रहन साहबकी दरगाह, ३ भर्गतीर्थ ( स० क्ली० ) तीर्थभेद । इस मसजिद, ४ छत्रपीरका समाधि मन्दिर, ५ माद्रासा भर्गभूमि ( स० पु. ) नृपपुत्रभेद । मसजिद, ६ शेठको हबेलो, ७ भृगुस्थान वा आश्रम, ८ भर्गस् (सं० क्ली०) भर्जते इति भृज-भर्जने (अभ्यजियुजीभृजि- कवीरस्थान, ६ गङ्गानाथ महादेव, १० अम्बाजीमाता, ११ भ्यः कुश्च । उण ४॥२१५) इति असुन , कवर्गश्चान्तदेशः । पिङ्गलेश्वर ( दशाश्वमेध तीर्थ ), १२ लालुभाईका वाब, ज्योति, दीप्ति, चमक। १३ खेरुद्दीनका वाब, १४ ओलन्दोंका कब्रिस्तान, १५ : भर्गस्वत् ( स० त्रि०) दीप्तिमत्, मधुर । आदीश्वर भगवान्, १६ बहुचाराजी माता, १७ नारायण- भादि (सं० पु०) पाणिन्युक्त शब्द गण । यथा--भर्ग, स्वामी, १८ साटू थोवनकी धर्मशाला. १६ सोमनाथ, २० करूष, केकय, कश्मीर, साल्व, उरस, कौरव्य । भृगुभास्करेश्वर, २१ भूतनाथ, २२ काशीविश्वम्भर, २३ भर्गायन ( स० पु०) एक गोत्र-प्रवर्तक ऋषिका नाम । मनसुव्रतस्वामी, २४ देवासर ( जैनमन्दिर ), २५ चोवि. भये ( म० पु.) भृज ( महलोपर्यत् । पा ३।१।१२४ ) इति वट्टो मन्दिर, २६ पार्श्वनाथमन्दिर, २७ सागरगच्छका ण्यत्, चजोरिति कुत्वं । भर्ग। आदीश्वर, २८ अोलन्दाजोंकी कोठी, २६ भोडभञ्जन भर्छ. एक कवि। शाङ्ग धरपद्धातमें इनका उल्लेख हैं। कूप, ३० नीलकण्ठ महादेव और ३१ सिन्दबाई माताका भर्जन (सं० क्ली० ) भृज ल्य ट् । भृष्टि, भुना हुआ मन्दिर आदि देखनेकी चीज हैं। पारसियोंकी श्मशान अन्न । पुरी ( Tower of silence ) देखनेसे अनुमान होता है, भर्णस् ( स० त्रि०) भृ-असुन् , नुगागमः । भरणकारक । कि पारसियोंने यहां ११वीं शताब्दीके प्रारम्भमें आ भर्तव्य ( स० वि०) भृ-तव्य। भरणीय, भरण-पोसन कर वास किया है। । करने योग्य। भरोटी--माड़वमातोय रागविशेष । यह पूरिया, गौरी भर्ता (हिं० पु०) भत्त, देखो। मौर श्यामयोगसे उत्पन्न है। भार ( हिं० पु०) स्वामी, खाविन्द । भरोसा (हिं० पु०) २ आश्रय, आसरा । २ अवलम्ब, भर्तृ (सं० पु. ) विभर्ति, पुष्णाति, पालयति धारयतीति सहारा। ३ आशा, उम्मेद । ४ दृढविश्वास, यकीन । वा भृा धारणपोषणयोः ( गवुल तृचौ। पा ३।१।१३३ ) भरोसी (हिं० वि० ) १ भरोसा या आसरा रखनेवाला, इति तृच । १ अधिपति, मालिक । पर्याय-अधिप, ईश, जो किसी बातकी आशा रखता हो। २ आश्रित, | नेता, परिवृद्ध, अधिभू, पति, इन्द्र, स्वामी, नाथ, मार्य,