पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७५९

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भन्सुक तुषारावृत्त हिमालय पर शीतल प्रधान रूस-साम्राज्यमें रामायणमें श्रीरामचन्द्र के साहाय्यकारियोंमें वानरोंके तथा सुमेरुके निकटवत्ती महासागर उपकूल में स्वच्छ- सिवा जाम्यवान् नामक एक भल्लुकराजका भी उल्लेख न्दतापूर्वक विचरण करता है, जिससे वे स्थान अपेक्षा- है। भागवतके १०वें स्कन्ध, ५६वें अध्यायके ख्यमन्तको- कत भयावह हो गये हैं। दिनके समय निविड़ वनमें छिपे पाख्यानमें श्रीकृष्ण द्वारा ऋक्षराज जोम्बवानके परा रह कर रात्रिके समय ये निर्भय हो घूमा करते हैं। उस भवका प्रकरणं आया है। अरिष्टटल-कृत जीयतस्व- समय श्रान्त क्लान्त पथिक वा कोई छोटा मोटा जानवर ( Put, Hist, Vill. 5)-में लिखा है कि, भालू करीब सामने पड़ने पर यह आततायीकी भांति उन पर आक्र. करीब सभी चीज खाते हैं। मांससे उनकी विशेष रुचि मण करता है और पैरोंके तीक्ष्ण नखोंसे उसे चोर फाड़ नहीं हैं। शरीरकी कमनीयताके कारण ये सहज ही डालता है । इस प्रकार हिंस्र स्वभाव होने पर भी यह पाला वृक्षों पर चढ़ सकते हैं। वृक्षाके फल, उड़द, मधुचक जा सकता है। पर्वतवासी निम्नश्रेणीके लोग भालुओं आदि इनके उपाइय खाद्य हैं। ककटक, पिपीलिका के छोटे छोटे बच्चोंको पकड़ कर उन्हें नाना प्रकारका ! आदि देखते ही वे उसे चट कर जाते हैं। इसके खेल सिखाते हैं और अभ्यस्त हो जाने पर शहरों में ले , सिवा कभी कभी हरिण, शूकर, गाय आदि मार कर ये जा कर उनका खेल दिखला कर पैसा पैदा करते हैं। । अपना पेट भरते हैं। इन्हें यदि मीठे फल या सकरकन्द ____ इनका वाह्य-सौंदर्य विशेष मनोहारी नहीं है। देह | जैसे कन्द मिल जाय तो ये मांसको छोड़ कर उन्हें खर्वाकार और स्थल है। पञ्च-नव-विशिष्ट चार पैगेंसे हो पहले खाते हैं। अत्यन्त अभाव वा क्षुधाक्लिष्ट हुए ये अपने शरीरको वहन करनेमें समर्थ होते हैं। पीछेकी बिना ये उदरपूर्ति के लिये जोव-हत्या नहीं करते। तरफ बहुत हो छोटो पूछ होती है। मुह शरीरके देखे । इनको घ्राण-शक्ति इतनी तीक्ष्ण है कि गन्ध मिलते छोटा और आगेकी तरफ क्रमशः पतला होता है। मुख- हो ये उस पेड़की खोज करके उस परके मधुचकको- विवरमें ऊपरकी दाढ़में ६ कर्तक, २ शौवन और १२ चर्वण उतार कर खा जाते हैं। इनके नख पेड़ों पर चढ़ने दन्त हैं। नीचेको दाढ़में भी इसी प्रकार दांत होते हैं। और गह खोदनेके लिए जैसे उपयोगी हैं वैसे जीवदेह- विशेषता सिर्फ इतनी हो है कि चर्वण-दन्त दो अधिक हैं विदारणमें नहीं। एकमात्र सुदीर्घ नबयुक्त पंजा ही इनका प्रधान अस्त्र है। विभिन्न देशों में भल्लुकजाति विभिन्न नामोंसे परि- उसीसे ये अपनो रक्षा करते हैं । यह नखों द्वारा एक बार चित है। यथा--इङ्गलैण्डमें-Bear, चीनमें-हिउङ्ग, भी किसीको पकड़ ले तो फिर उसका बचना मुश्किल ही इथिओपिया -दोब, अरब-दुव.फ्रान्स--Ours, जर्मनो- है। वनमें आग दिखा कर इससे अपनो रक्षा की जा .lrk Los. Bar, इटली-Orso, लैटिन--Ursu", सुइडेन- सकती है। भमणकारियोंके भ्रमण-वृत्तान्त पढ़नेसे मालूम Bjorn. संस्कृत-ऋक्ष, काश्मोर-हरपूत, लादक .. होता है, कि इस प्रकार आक्रान्त होने पर अपने पहरनेके दिनमोर, बंगला-भाल्लूक, भूटान-थोम, लेपचा--सोन कपड़े जला कर कितनों हीने अपनी रक्षा की है। इसके महाराष्ट्र-असबैल, तेलगू-इलेगू, गुडलगू, कनाड़ी- सिवा बलवान् व्यक्ति के लिए और भी एक उपाय है; वह कडी, करड़ी, गोंड़-खेरिद, कोल–भन्न, पारस्य- यह कि, दो लकडियां पासमें रहनी चाहिए और जब दोण, स्पेन-0s0. तामिल-कड़ड़ी। भालू अपने ऊपर आक्रमण करे तब वायें हाथकी लकड़ो धूसरवर्णका भालू, Brown lear या Ursus Arct s को बीचमें पकड़ कर उसके आगे कर दे, भालू उस पृथिवो पर सर्वत्र देखने में आता है। पामस्काटकाके लोग लकड़ीके दोनों किनारे पकड़ लेगा और ऐसा पकड़ेगा भालूको एक उपभोग पदार्थ समझते हैं। सांसारिक सुख- कि उसको गग्दन काट देने पर भी वह उसे नहीं को आवश्यकीय अधिकांश सामिप्रियां उन्हें भालूसे ही छोड़ेगा। मौतके नजदीक पहुंचने पर भो यह जानवर प्राप्त होती है। वे ओढ़नेके कपड़े, कोट, दस्ताना, टोपी, अपनी जिदको नहीं छोड़ता। .. गुलबन्द, पाजामा आदि समस्त पोशाक भालूके लोम- Vol. xv. 189