पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७६१

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भन्लुक ७५५ U, Ornatils वा the Supectacleel Berar ओके शरीरके को तह होती. है। ये निरीह और आलस्य-प्रिय होते हैं। लोम अपेक्षाकृत कम हैं और आंखोंके चारों ओर एक फलमूल और पिपीलिका कर्कटादि इनका प्रधान खाद्य ऐसी रेखा है जो देखने में चश्मा जैसी मालूम होती है। है। बोर्णिओ द्वीपक भलु क (i. fois vilite ) देखने. • पहले ही कहा जा चुका है कि स्थानभेदसे भालुओंके ' में प्रायः गरिला जैसे होते हैं। इनकी छाती पर सन्त- आकार प्रकार में भी पार्थक्य पाया जाता है । जलवायुके' रहकी तरह पीले रंगकी छाप होती है । सुमेरु वा गुणसे अथवा स्थानके माहात्म्यसे कहीं तो ये शूकर-सदृश पृथिवीके उत्तर केन्द्रमें जो श्वेतवर्ण भालू देखने में आते हैं, कहीं गोदड़ जैसे, कहीं गैंडा जैसे और कहीं गरिलाके उनकी भीषण मूर्ति सम्पूर्ण भन्लुक जातियोंकी अपेक्षा सदश देखे जाते हैं। यहां सदृशका मतलब इतना हो भयावह है। इनका मुंह गौदुमा जैसा पर सारी देह है, कि उनके शरीरको गठनप्रणाली वैसी है, न कि वे स्थूल होता है। जनमानवहोन हिमप्रधान प्रदेशमें वास हूबह वैसे ही हैं। परन्तु सभी प्रकारके भालुओंके लोम- होनेसे प्रकृतिको गम्भोरमयो मूर्ति सरचररूपमें उनको जरूर हैं। हां, किसीके कम और किसीके ज्यादा अवश्य आकृति भी भीषणतर हो गई है। उस तुहिनराशि समा- होते हैं। नीचे कुछ विभिन्न श्रेणीके भल्लुकोंके नाम च्छन्न प्रदेशमें वृक्षलतादिके अभावके कारण ये स्थलज दिये जाते हैं। और जलज जीव तथा पक्षी और उनके अण्डे खानेके अमेरिकादेशका I'. Perox वा friels: zeur' नामका लिए वाध्य हुए हैं। वफंसे ढके हुग म्थानमें जैसे ये भालू चूहे-जैसी आकृतिवाला होता है। इसके सामने अपने शिकारके पीछे दौड़ सकते हैं, वैसे ही क्षिप्रताके के पैर पीछेके पैरोंसे ३ इंच बड़े होते हैं। साइबेरिया साथ ये समुद्रमें डूब कर सिन्धुघोटक आदिका शिकार के भालू ( (. Collittis) और भूटानके भाल (1'. करते हैं। समुद्र में मत्स्यादि देख कर ये धीरे धीरे पानी- 'Thilictit nus) अनेकांशमें गण्डाराकृति-विशिष्ट हैं । इन में उतरते हैं और अपने स्वभावजात मातरण-कौशलसे के शरीर पर अर्द्धचन्द्राकृति श्वेतवर्ण रोमावली होती डूब डूब कर लक्ष्य जीवके पास जा कर उसे पकड़ लेते है। कश्नोरी हरपुत ( It. Isabellinus ) और मलयः हैं। पीछे उसे बर्फके स्तूपके ऊपर रख देते हैं। भूखे देशीय सूर्याक्षि भल्लक (I. Mainamus ) मध और होने पर वे उसो समय उसे चट कर जाते हैं, परन्तु पेट शाकमूलादिके विशेष प्रेमी होते हैं। सिरिया देशके भरा रहने पर उसे फिरके लिए रग्ब छोडते हैं। गलित भल्लुकों (E. Suriacins)का वर्ण श्वेत या धूसर-मिश्रित मांस भी इन्हें बुरा नहीं लगता। समुद्र में बहती हुई श्वेताकार होता है। इनके मुख और पीठको आकृति तिमि आदि मछलियोंकी मड़ी हुई देह इनका प्रधान कुछ कुछ शूकर जैसी होती है। भारतीय कृष्णवर्णके खाद्य है। भल्ल क ( U, Labitatus )के लोम बहुत होते हैं। इनके जाड़े के दिनोमें इनके बच्चे होते हैं। शीतके प्रारम्भ- गले में और छाती पर अंग्रेजी | अक्षर जैसी सफेद लोम- में हो गर्भिणो भल्लुकी अपने लिए कोई नीचा स्थान .. - ढूढ़ लेती हैं। पीछे जब घोरतर तुषार गिरने लगता है... उस वृद्धाने उस मरे हुए भालूके लिये उसका मस्तक पकड़ कर तब वे वहीं जा कर पड़ी रहती हैं । धीरे धीरे तुपारसे बहुत शोक और दुःख प्रकाश किया था और वह बारम्बार : जब वह स्थान ढक जाता है, तब वह अपने तीस्बे नाखूनों-

  • Grand NMother" कह कर रोयी थी। अन्तमें उसने उस से उसे खोद कर गुफा-सी बना लेती है और उसीमें

मरे हुए भालूको घर ले जा कर उसके मस्तकको मञ्च पर सोती रहती है। वसन्तकी सूर्य-किरणका सञ्चार बिना" स्थापन करके उसकी पूजा की और दूसरे दिन साधारण हुए वह उसमेंसे निकलती ही नहीं उस समय उसके कुटुम्बियोंको उस भल्लुकके प्रेतकी मङ्गलकामनार्थ भोजन : दो बच्चे पैदा होते हैं। जो भल्लुकियां गर्भवती नहीं कराया। होती, घे नर भल्लुकोंकी तरह इधर उधर घूमा फिरा Eng, Cyclo, Vat, Hist, vol 1, 405 करती हैं।