पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७६४

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छोड़ कर साधु पथका अवलस्टन करे। निर्वाणमोक्षा- काररूपी कर्म संस्काररूप पात्र वा महीमें मनुष्य के अन्तः भिलाषी मानवको उचित है कि वह सत्कर्ममें निरत हो शरीररूप धरका निर्माण कर रहा है। ३य घरमें वानर- कर विरोपासना कालप्रतिपात करे, कभी भी भ्रमसे मूर्ति अपूर्ण मनुष्यके विज्ञानका अस्तित्व समझा हो. 'अहं' भाव न धारण करे । एकमात्र कर्मफलसे ही मनुष्य है। ४र्थ घरमें वैद्य है, रोगोको नाड़ी देख रहा है, अर्थात् की सुगति और दुर्गति हुआ करती है। साधुचेता और स्पन्दनशील मनुष्यत्व वा 'नामरूप' मानो वाह्यजगत्के दानधर्म में निरत व्यक्ति सन्मार्गावलम्बनके कारण श्रेष्ठ- साथ स्पर्शलाभके लिए व्याकुल हो रहा है। ५वे घरमें लोकको प्राप्त होते हैं और दुष्क्रियाशील अधार्मिक व्यक्ति- मुखकोषके भीतरसे दो चक्षु उझक रहे हैं अर्थात् 'घडा. मालको नीच लोकमें नीच गति प्राप्त होती है। यतन' रूप इन्द्रियों में से मनुष्यत्व वाह्यजगतको देख रहा है ___ उक्त भवचक्रके चित्रमें जीवात्माके कर्मजन्य विविध या चाहता है । योनि परिभ्रमणका फल जिस प्रकार निणींत हुआ है, इस अवस्थामें भ्रूणावस्थासे मुक्त मनुष्यके साथ उसका यथासम्भव विवरण नीचे दिया जाता है : बाह्य जगतको क्रिया यथारोति विकसित होती है। ठे यह चित्र एक चतुष्कोण दृश्यपट है। उसके ऊपरके घरमें आलिङ्गनवद्ध दम्पती मनुष्यके साथ जगतका- 'क' 'स्व' कोण एक व्याघ्रचर्मधारो पुरुषके दक्षिण और अन्तर्जगतके साथ वाह्यजगतका स्पर्श सूचित करती है । वाम हस्तमें तथा नीचेके 'ग' 'घ' कोण उसके दोनों पैरों इस स्पर्शके फलसे वेदना वा दुःखादिको अनुभूति प्रारम्भ के गुल्फास्थि पर संरक्षित हैं। उस व्यक्तिको शिरस्थित होती है। ७म चित्रमें एकके द्वारा निक्षिप्त तीर दूसरेके जटामें नृकरोटि विलम्बित है, जैसे वह बीभत्स मृत्युका . चक्षु में प्रविष्ट हो कर अनुभूतिका परिचय दे रहा है। हो परिचायक हो । उसके द्वारा परिधृत व्याघ्रचर्म संन्यास, ८म चित्रमें सुरापानमें रत मनुष्यमूर्ति तृष्णा या वासना- दान, धर्म और ध्यान योगका आश्रय प्रकट कर रहा है। का विकास कर रही है। मनुष्य अब संसारमें लीन हो चित्रपटके मध्यमें छह लोक हैं और वहिर्भागमें मानव- गया; संसारके वृक्षसे आग्रह और आसक्तिके साथ फल. जन्मके द्वादश निदान प्रकल्पित हुए हैं। इसके '१'म संग्रह करनेमें मस्त है। हम चित्रमें फलाकर्षी मनुष्य चित्रमें मनुष्य जन्मका सुख-शान्ति प्रकटित हुई है, और उपादान वा संसारशक्तिको प्रतिमूर्ति है। १० खानमें ६'ठे चित्रमें प्रमलोकका वीभत्स चित्र अङ्कित है । '२'य नबोढ़ा वधूकी मूर्ति भव' है, अर्थात् संसारमें वह गृहस्थ चित्रमें ब्रह्मादि परलोक, '३'य चित्रमें अशान्तिकर असुर-, रूपमें मनुष्यका अस्तित्वका परिचायक है, मनुष्य अब लोक, '४' चित्रमें पशुपक्षो आदि तिर्यक्लोक भौर '५'म गृहस्थीमें पूरी तरह फंस चुका समझिए । उसके बाद चित्र में प्रेतलोक विद्यमान है। ११वें चित्रमें नवप्रसूत शिशु सहित जननी मूर्ति है। ___ अजन्तामें खुदे हुए भवचककी व्याख्या स्वतन्त्र है। सन्तानका जन्म 'जाति' अर्थका बोधक है, जन्मके बाद उसको प्रतिकृति चषकेकी भांति है। चक्रके केन्द्रस्थल वा मनुष्यके और कोई कार्य नहीं है। उपसंहारमें जरामरण नाभिदेशमें कपोत सर्प और शूकरको मूर्ति- राग, द्वेष है । १२वें घर में बांसकी डोलीमें शयान शिवमूर्ति है। और मोहकी प्रतिकृति स्वरूप अङ्कित है। इन तीनोंको। भवचक्र-अङ्कित चित्रमें बारह निदानोंका परस्पर केन्द्र बना कर संसारचक घूम रहा है। उसके नीचे १२ । सम्बन्ध दिखाया गया है। हिन्दू शास्त्रों में मनुष्यको १० घरों में बारह मूर्तियां हैं, जो मानव-जीवनके इतिहासको अवस्थाओंका उल्लेख है। बौद्धगण मनुष्यको द्वादश . प्रकट करती हैं। १म घरमें एक अन्धा उष्ट्र चल रहा है। दशा स्वीकार करते हैं। प्रतीत्यसमुत्पाद उन बादश उष्ट्र अविद्याका प्रतिस्प है, चालक स्वयं कर्म है । जन्मके दशाओंका धारावाहिक चित्र है। तिब्बतमें प्रसिद्ध है प्रारम्भमें मनुष्य पूर्वजन्मके कर्मों द्वारा चालित हो कर ! कि, माध्यमिक सम्प्रदायके प्रतिष्ठाता नागार्जुनने इस अन्धे ऊंटको तरह अविद्याके नशेमें घूमा करता है और चिसका उद्रावन किया था। नृतन जन्मको मोर धावित होता है । श्य घरमें कुम्भ- मनुष्य यदि बोधिसत्त्व द्वारा प्रवर्तित पंचका अनु..