पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/७९

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फलराज-फला ७३ फलराज (स.पु.) १ तरबूज। २ खरबूजा । फलश्रवण । अमुक कम करनेसे स्वर्ग, अमुक करनेसे फललक्षणा (सं० स्त्री० ) फलहेतुका लक्षणा। एक पुण्य होता है, इत्यादि फलश्रुति देख कर कार्यमें प्रवृत्त प्रकारकी लक्षणा । सक्षणा देखो। होवें। इसे प्रवर्तक वाक्य भी कहा जा सकता है। फलवत् ( स० वि० ) फलमस्यास्तीति फल मतुप मस्य फलश्रुति अच्छे और बुरे दोनों ही स्थलमें होगी। व। फलयुक्त वृक्ष, फलदार पेड़। सत्कार्य होनेसे गुणफलश्रुति और असत्कार्य होनेसे फलपति ( सं स्त्रो०) आयुर्वेदोक्त बतिभेद, मोटी बत्ती । दोषफलश्रुति होती है। असत्कार्यको फलश्रुति देख कर जो धावमें रखी जाती है। लोग उस ओर पांव नहीं बढ़ाते । सत्कार्यमें शुभफलश्रुति फलवर्तुल (स क्ली०) फल वसूल यस्य । १ कालिङ्ग, रहने पर भी फलकी आकांक्षा करके उसमें प्रवृत्त होना कुम्हड़ा। २ तरम्बुजवृक्ष, तरबूज । उचित नहीं। कारण, शास्त्रमें निष्काम कर्म को ही श्रेष्ठ फलवस्ति (सं० स्त्रो०) एक प्रकारका वस्तिकर्म। इसमें बतलाया है। अंगूठेके बराबर मोटी और बारह अंगुल लंबी पिच- फलश्रेष्ठ ( स० पु० ) फलाना फलवृक्षाणां श्रेष्ठः । आन- कारो गुदामें दी जाती है। वृक्ष, आमका दरख्त । फलवान (स० वि०) फलित, जिसमें फल लगा हो। फलसंवद्ध (सं० पु०) उदुम्बरवृक्ष, गूलर । फलविक्रयी (स० वि०) फलविक्रयोऽस्या अस्तीति इनि । फलसंस्कार (सं० पु०) आकाशके किसी प्रहके केन्द्रका फलविक्रयकारी, फल बेचनेवाला। समीकरण या मद-फल-निरुपण ( Equation of the फलविरेचन (सं० क्ली० ) हरीतको आदि। Centre) फलविष स० क्ली० ) फले विषं यस्य । यह वृक्ष जिसके फलस ( स० पु.) पणसवृक्ष, कटहलका पेड़। फल विषैले होते हैं। सुश्रुतमें कुमुद्वती, रेलुका करम्भ, फलसम्भीरा ( स० खी० ) कृष्णोदुम्बरिका, कसूमर । महाकरम्भ, कर्कोटक, रेणुक, खद्योतक, चर्मरी, इभगन्धा, फलस्थान (स० क्लो० ) फल उपभोग करनेका समय । सर्पघाती, नन्दन और सरपाकके फलविष कहे गये हैं। फलस्थापन ( सं० क्ली० ) फलयोबौड़म्बरफलयोः स्थापन __(सुश्रु त कल्पस्था० २ अ०) मन । सीमन्तोन्नयन संस्कार, दश प्रकारके संस्कारों में फलवृक्ष (सं० पु०) फलका पेड़। से तीसरा संस्कार। फलवृक्षक ( स०पु०) फलप्रधानो वृक्षः, संज्ञायां कन्। फलस्नेह (स० पु०) फले स्नेहो यस्य । आखोटवृक्ष, अख- पनस, कटहल। रोट। फलश (सं० वि० ) फल तृणादित्वात् श। १ फलयुक्त, फलहरी ( हिं० स्त्री०) १ बनके वृक्षोंके फल, मेवा। २ जिसमें फल लगे हों। (पु०) २ पनस, कटहल। । फल, मेवा। (नि.) ३ फलहारी देखो। फलशाक (सक्लो० ) फलमेव शाकम् । षविध शाकके | फलहार ( हि० पु० ) फलाहार देखो। अन्तर्गत फलरूप शाक, वह फल जिसकी तरकारी बना फलहारिन् ( स० वि०) फलं हरति ह-णिनि । फलहारक, कर खाई जाती है। फल खुरानेवाला। फलशाइव (स.पु०) दाडिम, अनार । फलहारी (स स्त्री० फलानां हारो हरणं यस्मै गौरा- फलशाली (स.नि.) फलेन शालते श्लाघते इति शाल- दित्वात् जी । कालिकादेवी । ज्येष्ठमासको अमा- णिनि । फलयुक, जिसमें फल लगे हों। वल्या तिथिको नाना प्रकारके फलोपहार द्वारा इनकी फलशैशिर (स.पु०) शिशिरं प्राप्तमस्य मण, शैशिरं पूजा करनी होती है। फलं यस्य। बदरवृक्ष, बेरका पेड़। फलहारी (हिं० वि०) जिसमें अन्न न पड़ा हो अथवा फलश्रुति (सं० स्त्री० ) फलस्य कर्मफलस्य श्रुतिः श्रव- जो अबसे न बना हो। णम् । कर्मफलश्रवण, वैदिक कर्मके फलप्रतिपादनार्य शास्त्र फलां (फा० वि० ) अमुक, कोई अनिश्चित । Vol. xv. 19