पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/९

विकिस्रोत से
Jump to navigation Jump to search
यह पृष्ठ शोधित नही है


प्रतहार-ताशाच 'चतुर्थे पञ्चमे चैव नवमैकादशे तथा। अविवाहिता कन्याके तीन पुरुष पर्यन्त सापिण्ड्य तदन दीयते जन्तीस्तन्नव गुच्यते ॥” रहता है । अविवाहिता कन्याके वैपुरुषिक ज्ञातिके मा श्राद्धविवेक-यम) जनन वा मरणमें पूर्णाशीच होता है । उसके बाद साकुल्य पहले जिन सो कथा लिखी गई हैं, वह पर्यन्त तीन दिन अशौच रहता है। ब्राह्मणादि चतुर्मार्ण साग्निक और निरग्निक दोनों के ही कर्तव्य है। प्रेतके। यदि अपने अपने जात्युक्ताशौचकालके मध्य वह अशौच उद्देशसे अम्बुघट श्राद्धको भी प्रेतश्राद्ध कहते हैं। सुने, तो पूर्वोक्त दशाहादि अशौच होता है। किन्तु वह सम्वत्सर पर्यन्त प्रेतके उद्देशसे प्रतिदिन अन्न जलदान- अशौचकाल बीत जाने पर यदि एक वर्ष के भीतर सुननेमें रूप श्राद्धका नाम अम्बुघटश्राद्ध है। (श्राद्धविवेक) आवे, तो सपिण्डशातिके तीन दिन अशौच होता है। प्रेतहार (सं० पु० ) मृत शरीरको उठा कर श्मशान आदि एक वर्णके बाद सुननेसे स्नानमानसे ही शुद्धि होती है। तक ले जानेवाला, मुरदा उठानेवाला। किन्तु महागुरुनिपातमें अर्थात् पुत्र यदि पितृमातृमरण प्रेता ( स० स्त्री० ) १ स्त्री-प्रेत, पिशाची। २ भगवती और स्त्री स्वामिमरण एक वर्षके बाद सुने, तो एक दिन कात्यायिनीका एक नाम। अशौच और यदि उसके बाद सुने, तो स्नानमात्रमे ही प्रेताधिप ( स० पु० ) प्रेतानां अधिपः । प्रेताधिपति, शुद्धि होती है। खण्डाशौचके बहुत समय वाद सुननेसे यमराज। भी अशौच नहीं होता। प्रेतान्न (सं० क्लो०) प्रताय देयं अन्नं । प्रतोद्देश्यक देय . गर्भश्रावाशौच । -६ मासके भीतर गर्भस्राव होनेसे अन्न, वह अन्न जो प्रेतके उद्देशसे दिया जाय। उस स्त्रीके माससमसंख्यक दिन अशौच होता है, अर्थात् प्रेताशिनी (सं० स्त्री० ) १ भगवतीका एक नाम। २ एक मासका गर्भस्राव होनेसे एक दिन, दो मासका होनेसे मृतकोंको खानेवाली। दो दिन इसी प्रकार छः मास तक जानना चाहिये। प्रेताशौच ( सं० क्ली० ) प्रते सति अशौचं। प्रेतनिमित्त किन्तु दैवकार्यमें द्वितीयमामावधि ब्राह्मणीक पक्षमें एक अशौच । मृत्युके बाद जो अशौच होता है, उसका नाम एक दिन अधिक होता है। अर्थात् द्वितीय मासमें तीन प्रेताशौच वा मरणाशौच है। शुद्धितत्त्वमें लिखा है,... दिन, तृतीय मासमें चार दिन, चतुर्थ मासमें पांच दिन, सपिण्डकी मृत्यु होने पर मृत्यु दिनसे ले कर पश्चममासमें ६ दिन और ६ष्ठ मासमें ७ दिन अशौच ब्राह्मणके १० दिन, क्षत्रियके १२ दिन, वैश्यके १५ दिन होता है। क्षत्रियाके द्वितीय मासावधि पूर्वोक्तरूपसे दो और शूद्रके ३० दिन अशौच होता है, यही पूर्णाशौच है। दो दिन करके और वैश्याके तीन दिन करके और शूदा- इससे न्यूनकालव्यापक अशौचको खण्डाशौच कहते हैं।' के ६ दिन करके उस अशौचकी वृद्धि होगी। उस जननाशोत्रमें ही खण्डाशौच होता है। दूरस्थ ज्ञातिके वर्द्धित शौचमें केवल दैव वा पैत्रकार्य करना निषिद्ध है, मरण पर तीन दिन और मानदिक ज्ञातिक मरण पर पर लौकिक सभी कार्य कर सकते हैं। किन्तु मास- पक्षिणी अशौच होता है। वह पक्षिणी अशोव दिनको संख्यक दिनमें: लौकिक वा दैविक किसी भी कार्यमें हो चाहे रातको, उस समयसे ले कर सूर्यास्तकाल पर्यन्त अधिकार नहीं है। सप्तम वा अष्टम मासमें गर्भस्राव रहता है। पूर्वोक्त चतुर्वर्ण के पूर्वपुरुषको जन्म नाम स्मरण होनेसे खजात्युक्त पूर्णाशौच तथा निर्गुण सपिण्डके एक पर्यन्त एक दिन अशौच होता है। उसके बाद सगोत्रके दिन अशौच होता है। वह वालक जीवित प्रसूत हो कर जनन वा मरणमें स्नानमालसे ही शुद्धि होती है। यदि उसी दिन मर जाय, तो भी उसी प्रकारका अशौच पहले जिस समानोदकादिका उल्लेख किया गया है, होता है। द्वितीय दिनमें मरनेसे पितामाताके सिवा और उसका अर्थ यों है--सप्तमपुरुष पर्यन्त ज्ञाति सपिण्ड, किसीको अशौच नहीं होता है । दशमपुरुष पर्यन्त साकुल्य, पोछे चतुर्दशपुरुष समानो- बालाघशौचव्यवस्था।- नवम और दशममासजात दक कहलाता है। बालककी अशौचकालके मध्य मृत्यु होनेसे वह जनना-