पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/९०

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फाल्गनषिय-फास्फरस विभाग द्वारा विहित कार्य का केवल एकाएक समय | फाल्गुनीभव ( स० पु० ) वृहस्पति नक्षत्रका नामभेद । निर्धारित हुआ है अर्थात् कोई कार्य गौणचान्द्रमें करना | फावड़ा (हिं पु०) एक प्रकारका लोहेका औजार जो मट्टी होता है। ( मलमासतत्व ) कृत्यतत्त्वमें फाल्गुनकृत्यका खोदने और टालनेके काममें आता है । इसमें डंडेको तरह- विषय इस प्रकार लिखा है-फाल्गुनमासकी कृष्णाष्टमी- का लम्या वेट लगा रहता है। इसे फरसा भी कहते हैं। में कालशाक और वास्तूकशाक द्वारा पितरोंके उद्देश्यसे | फावड़ी ( हि स्त्री०) १ छोटा फावड़ा। २ फावड़े के श्राद्ध करना होता है । गौणचान्द्र फाल्गुन मासकी आकारकी काठकी एक वस्तु। इससे घोड़ों के वीचेकी कृष्णा चतुर्दशीमें शिवरात्रि व्रत करना हर एकका | घास, लीद तथा मेला आदि हटाया जाता है। अवश्य कर्त्तव्य है । इसकी व्यवस्थादिका विषय शिवरानि | फाश ( फा० वि० ) प्रकट, ज्ञात। प्राब्द देवो। मख्यचान्द्र फाल्गुनमासकी शक्लाद्वादशीके | फास्फरस ( Phosphorus ).-दीपकपदार्थविशेष, एक दिन गोविन्दद्वादशी होती है । इस द्वादशीके दिन महा अत्यन्त ज्वलनशोल मूलद्रव्य। इसमें धातुका कोई गुण पातक नाशकी कामना करके गङ्गास्नान करना होता है। नहीं होता और यह अपने विशुद्धरूपमें कहीं नहीं मिलता- इस दिन गङ्गास्नान करके निम्न लिखित मन्त्र पढ़ना आक्सिजन, कलसियम और मगनेशियाके साथ मिला होता है। मन्त्र यथा-- हुआ पाया जाता है। यह मिश्रित पदार्थ Apatite, "महापातक संज्ञानि यानि पापानि सन्ति मे। phosphorite, coprolites आदि विभिन्न अवस्थाओं- गोविन्दद्वादशीं प्राप्य तानि मे हर जाहवी॥" में विभक्त है। प्रत्येक उद्भिद्की वीजशक्ति ही फास्फ- पीछे फाल्गुनमासकी पौर्णमासीको यथाविधान रस है । इसके नहीं रहनेसे वृक्षादि सतेज हो कर जीवन- दोलयात्राका अनुष्ठान आवश्यक है। इस दिन भगवान् रक्षा नहीं कर सकता है। वीज वा फलमें फास्फरस विष्णुको दोलागत देखनेसे अन्तकालमें विष्णुपुरको गति रहनेके कारण ही भिषकगण दुर्बल मस्तिष्क और दौवल्य- होती है । ( कृत्यतत्व ) फाल्गुनमासमें जन्म होनेसे प्रस्त व्यक्तिमात्रको हो सुपक्क फल खानेकी व्यवस्था देते प्रियम्बद, साधुजनका वल्लभ, परोपकारी, निर्मलाशय, हैं। फास्फरस जो मस्तिष्ककी चञ्चलताको दुर कर उसे दाता और प्रमोदाभिलाषी होता हैं। (कोष्ठीप्रदीप) स्वाभाविक अवस्थामें लाता है, वह किसीसे छिपा ६ दुर्वाभेद, दुर्वा नामक सोमलता । शतपथ ब्राह्मण- नहीं है। में इसे दो प्रकारका लिखा है । ६ लोहितपुष्प । ७ जीवदहमें इसकी व्याप्ति देखी जाती है। रक्तमें, मूत्र- एक तीर्थका नाम । ८ वृहस्पतिका एक वर्ष जिसमें में, रोमादिमें, अस्थिमें तथा स्नायविक विधानोंमें ( Ner- उसका उदय फाल्गुनी नक्षत्रमें होता है। vous tissues) फास्फेट आव लाइम अधिक परिमाणमें फाल्गुनप्रिय ( स० पु०) शङ्ख। मिश्रित है। १६६६ ई०में जर्मन पण्डित ब्राण्ड (Brault) ने फाल्गुनानुज (सं० पु.) फाल्गुना दनु पश्चात् जायते मूत्रसे प्रस्फूरक निकाला। किन्तु अमी अस्थिसे भी इति अनु-जन-दु । १ वसन्तकाल, चैत्रमास । २ प्रचुर प्रस्फुरक निकलने लगा है। प्रस्तुत प्रणाली-- अजुनके कनिष्ठ भ्राता। फालगुनि (स० पु० ) अर्जुन । अस्थिकी राख ३भाग, २भाग घन गन्धकाम्ल (Concen- फाल्गुनिक ( स० गु.) फाल्गुनी पौर्णमास्यस्मिन् मासे trated suiphuri. acid ) इन्हें २० भाग जलमें २ या इति ( विभाषा फाल्गुनी श्रवणेति । पा४।२।२३ ) फाल्गुन- ३ दिन तक रखे। पीछे उससे तरल अम्मांश छान कर मास। बाहर निकाल ले। जितना अम्लदायक पाया जायगा, फाल्गुनी ( स० स्त्री० ) फल्गुनीभिर्युका पौर्ण मासी उसमें एसिड फास्फेट आव लाइम अवश्य है। बादमें ( नक्षत्रण युक्तः कालः। पा॥२॥३) इति अण डोप । उसमें कोयमा ( Charcoal ) मिला कर शरबतकी तरह १ फाल्गुनमासको पूर्णिमा। २ पूर्वफाल्गुनी नक्षत्र ।३ गाढ़ा करे । पीछे लोहेके बरतनमें उसे डाल कर आंच पर उत्तरफाल्गुनी नक्षत। चढ़ाये, जव खोल कर खूब लाल हो जाय, तब उसे ताए