पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष पंचदश भाग.djvu/९२

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फासला-कारियान उत्पत्ति होती है। फस्फुरेटेड हाईड्रोजन ( Phosphu-! समय यौद्धप्रभाव प्रायः सारे उत्तर देशोंमें फैला हुना rettel IIslrogen ) नामक एक पदार्थ प्रचलित है। था। राहमें उन्हें अनेकों वौद्धमठ मिलते जाते थे। दूढ़ (Solidl ), तरल और वाष्पीयके भेदसे उसकी तीन उन्हीं मठोंमें वर्षा बिता कर वे खोटानमें उपस्थित हुए। अवस्थाएं हैं। राजाके आदेशसे उन्हें यहांके गोमती-सलाराम रहना कुछ पदार्थ ऐसे हैं जिनमें आलोक-विकिरणकी पड़ा। यहां महायान मतावलम्बी बौद्ध सम्प्रदायका बास शक्ति है। दो खण्ड कोयार्टज पत्थरको आपसमें घिसने- है। यहां रख कर ही उन्होंने बुद्धदेवकी रथयात्रा देखी से आलोक उत्पन्न होता है। उस पत्थरमें फास्फरस थी। इसके बाद वे लोग छलभङ्ग हो गये। फाहियान की अवस्थिति हो इसका कारण है । जुगनू और मछली थोड़े से साथी ले कर इयारकन्दकी ओर चल दिये । वहां के छिलके में इसी प्रकार कभी कभी प्रस्फुरकालोक देखने भी उन्होंने महायान बौद्धमत फैला हुआ देखा था। अब में बाता है। वे यहांसे लौट कर कि-श ( कासगर ) राज्यमें पहुँचे । फासला (अ० पु०) अनन्तर, दूरी। यहांके राजाके 'पञ्चवर्षपरिषद्" था और सभी बौद्ध फाट ( वि.) १ तेज। २ शीघ्र चलनेवाला, वेग- हीनयानमतावलम्बी थे। इसके बाद वे तुषाराक्त तसुङ्ग-लिङ्ग पर्वतमाला पार कर दरदराज्यके दारिल पाहा (हिं पु०) १ फाया, साया । २ मरहमसे तर पट्ठी उपत्यकामें पहुंचे। यहांसे क्रमागत दक्षिणपश्चिमको जो घाव, फोड़े आदि पर रखो जाती है। ओर पैदल चल कर वे सबके सब खात्नदी पार हुए। फाहियान- एक चीन-परिव्राजक। चीनों में वे ही सबसे यहां उद्यान-राज्यमें प्रवेश कर उन्होंने बौद्धधर्म का पूर्ण पहले बौद्धधर्मतत्स्वकी खोज में भारतवर्ष आये थे। प्रभा देखा। इसके बाद वे भारतके उत्तर सोमावती सान-सि प्रदेशके बु-यङ्ग नगरमें इनका जन्म हुआ था। गन्धार, तक्षशिला, नगरहार, पुरुषपुर आदि जनपदोंमें बचपन में ये कुछ नामसे परिचित थे। चीनोंका बौद्ध- भी बौद्धधर्म और कीर्तिसमूहका विस्तार देख कर प्रसन्न धर्मों अनुराग रहनेके कारण वे थोड़ी ही उमरमें संसारा- हुए थे। श्रम छोड़ देनेको वाध्य हुए। तीन ही वर्षकी उमरमें ये ___भारतगमनकाल में उन्होंने जो जो जनपद देखे उन्हें भ्रमण हो गये थे। स्वदेशीय प्रथानुसार उन्होंने पूर्व- स्वरचित 'फो-को-को' नामक ग्रन्थमें लिपिवद्ध कर मये नामका परित्याग कर धर्मनाम 'फा-हियान' और 'सिंह' : हैं। उक्त प्राचीन ग्रन्थ और परवत्ती चीनपरिव्राजक (शाक्यपुत)-की उपाधि प्राप्त की। यतिधर्मका ग्रहण यूएनचुवङ्गके लिखित भ्रमणवृत्तान्तका सामञ्जस्य करके कर जब वे सि-गन्-फु प्रदेशको राजधानी चाङ्ग अन् नगर में धर्मानुशीलनमें व्यापृत थे, उस समय 'विनयपिटक' *उनके लिखित वानुसार कोई कोई इस जनपदको पक्तिया अन्यको अधूरा देख कर उन्हें भारी दुःख हुआ। इस राज्य अनुमान करते हैं। फाहियानने इस मगरसे कोस कारण उन्होंने विनयशास्त्रके नियमादिका उद्धार करनेके भर पश्चिम जि नये संघारामका उल्लेख किया है, यूएम- लिये कुछ साथियों के साथ भारतवर्ष आनेका संकल्प चुवंग उसीको वाइलीक राज्य के अन्तभुत पतला गये हैं। किया। जनसाधारणके निकट ये सुङ्गवशके शाक्य यूएनचुमने इस किश नामसे कासगर जनपदका उल्लेख मामसे प्रसिद्ध थे। किया है। बहुसेरे इसे मनु लिखित खश वा विष्णुपुराणके बौद्धधर्म में विशेष अनुराग रहने के कारण बौद्ध ग्रन्थ शाकोका देश बतलाते हैं। सम्भवतः टोमी लिक्षित पढ़नेकी उनकी बड़ी इच्छा हुई। इस उद्देश्यको सिद्ध , कोसाइयो ( Kossaioi ) और धर्मशास्त्रलिखित अशाट- करने के लिये घे ३६६ ई०में दलचलके साथ चाङ्ग अन! गण दोनों इसी जनपद के अधिवासी बतलाये गये है। मगरसे निकल पड़े। चीन राज्यका विख्यात प्राचीरा सिन्धुनदीके पश्चिम फूलवर्ती उपत्यका भूमि । यहाँ पार कर वे क्रमागत पश्चिमको ओर अग्रसर हुए। उस । पारित नी बहती है।