|
दलाली, मुनीबी, सुनारके व्यवसाय या कोई दूसरे भद्रोचित व्यवसायको अवलम्बन किया करते हैं। किन्तु कोई किसी क्रमसे कृषिकार्य्य नहीं करता। पश्चिमीय अगरवालोंमें सभी और पूर्व्वीय अगरवालोंमें अधिकांश यज्ञोपवीत धारण करते हैं। समाजमें ब्राह्मणों और कायस्थोंके पीछे ही इनका स्थान है। यह सभी निरा-मिष भोजी होते हैं। जैन अगरवाल इसीसे सन्ध्याके पहिले भोजन कर लेते हैं, जिसमें कोई क्षुद्र कीट-पतङ्ग खाद्यके साथ मुखमें चला न जाय, यह कभी रातको भोजन नहीं करते। अगरसार (हिं॰ पु॰) अगरका बुरादा या सत।
अगरी (सं॰ स्त्री॰) न-गर-ङीष्। नास्ति गरः विषं यस्मात्। देवदारु वृक्ष। (त्रि॰) मूषिक-विषहारी। चूहेका ज़हर उतारनेवाली।
अगरीया—ठगोंका एक वंश। यह दाक्षिणात्यसे निकाले जानेपर कुछ दिन आगरेके पास रहा था। बङ्गालमें सब लोग इसे 'हा-घरे' कहते हैं। इस जातिकी स्त्रियोंके गलेमें कांच या पोतकी माला पड़ी रहती है। हिन्दुस्थानियोंकी तरह यह लहँगा पहनतीं और सब जगह भीख मांगते घूमा करती हैं।
अगरु (सं॰ क्ली॰) न-गृ-उ, नञ्-तत्। (Aquilaria Agallocha, Aloe or Eagle -wood) अगरु चन्दन। यह देखनेमें तो काला, किन्तु पत्थरपर घिसनेसे सुन्दर पीतवर्ण हो जाता है। अगर लकड़ी एक तरहकी नहीं होती। सिलहट, दाक्षिणात्य, आसाम प्रभृति कितने ही स्थानोंमें इसके कई तरहके वृक्ष हैं, इन सब वृक्षोंकी लकड़ी सुगन्धित और देखनेमें अगरु जैसी होती है। बाज़ारमें असली अगरु पहचानना कठिन है। इसका पेड़ बृहदाकार होता है। उत्कृष्ट अगरु सिलहटके पार्व्वत्य प्रदेशमें उपजता है। पुराने वृक्षसे गुग्गुल जैसा एक प्रकारका निर्यास निकलता है। चमकीले वृक्षमें वैसा नियास नहीं मिलता। गुग्गुल जलानेसे जैसा सुगन्ध फैलता, अगरुके नियासमें भी ठीक वैसाही सौरभ होता है। धूपदानमें इसे जलानेसे अन्त:-करण प्रफुल्ल हो जाता है। पूर्व्व कालमें अरब, ईरान और यूनान आदि देशोंके लोग भारतवर्षके अगरु और
|
अगरु-निर्यासको बड़े आदरकी सामग्री समझते थे। भारतवर्षमें देवार्चनाके समय चन्दनके साथ अगरु काष्ठ और अगरु-रसको कितने ही लोग व्यवहार करते हैं। सिवा इसके, पूर्व्व कालके लोग इत्र, गुलाब, लेवेण्डर आदि न पहचानते थे। उस समय मातायें बालक बालिकाओंको ललाटमें अगरुकी अलकावली लगाकर सजाती थीं। अभिसारिका कामिनियां भी अगरुसे वेशविन्यास करती थीं। कोचीन देशमें अगरुके बकलेसे एक तरहका मोटा काग़ज़ तय्यारं होता और लकड़ीसे चन्दनके तेल जैसा ख़ुशबूदार तेल निकाला जाता है। मेहरोग और उदराध्मानमें यह तेल महोपकारी है। लकड़ीका काढ़ा ज्वर रोगमें प्रयोग करनेसे प्यास और हिचकी बन्द हो जाती है। शिरके घूमने और पक्षाघातकी पीड़ामें इस काढ़ेको सेवन करनेसे थोड़े परिणाममें उपकार दिखाई देता है। वैद्यक-ग्रन्थमें अगरुके कई एक गुण लिखे हैं—खानेमें तीता, गर्म और कड़ुआ, लगाने में रूखा ; और इसके द्वारा कफ, वायु, वान्ति, मुखरोग, व्रणरोग और कान और आंखकी पीड़ा मिट जाती है। अगरुके निर्यासका गुण लकड़ी ही जैसा है। इस निर्याससे एक तरहकी दवा बनती है। उसके द्वारा दुष्टव्रण, ग्रन्थि-वात, दुष्टरक्त प्रभृति रोग प्रशमित होते हैं। ब्रह्मचारी कहते हैं, कि सत्पथ्याशी होकर इस दवाको एक वर्ष सेवन करनेसे शरीरमें किसी प्रकारका क्षत उत्पन्न नहीं होता। गुग्गु ल शब्दमें इसका विवरण देखो। अगरू—अगर देखो।
अगरो (हिं॰ वि॰) १ अगला, पहला। २ अच्छा, उत्तम, श्रेष्ठ, बढ़िया। ३ अधिक, ज़ियादा, बहुत।
अगर्व (सं॰ त्रि॰) १ जिसे गर्व न हो, अभिमान-रहित। २ सीधा, भोला-भाला।
अगर्हित (सं॰ त्रि॰) न गर्हितः, गर्ह कुत्सायां-क्त गर्हितः नञ्-तत्। १ आनन्दित। २ प्रशंसित।
अग़ल-बग़ल (फ़ा॰ वि॰) पास-पास। इधर-उधर। साथ-साथ। दोनो ओर। हिन्दुस्थानी बालक सन्ध्याको अपने एक खेलमें कहते हैं—
"अगल बगलमें पड़ी जंजीर। कोई ले तुक्कल कोई ले तीर।"
|
पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१०५
दिखावट
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
९९
अगरसार—अग़ल-बग़ल