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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१११

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अगूढ़गन्धा—अग्नि

हिङ्ग, हींग। हिङ्गु देखो। (त्रि) अगुह्य सौरभ। जिसकी महक न छिपे।

अगूढ़गन्धा (हिं॰ स्त्री॰) हींग।

अगृभीत (सं॰ त्रि॰) न गृहीतं, छान्दसत्वात् हस्य भः। अग्रहीत।

अगृह्या (सं॰ स्त्री॰) न ग्रह-क्यप् कर्म्मणि। पदास्वै रिवाह्यापक्ष्येषुच। पा॰ ३।१।११९। अस्वत्रन्त्रा। अस्वैरिणी।

अगेंथ (हिं॰ पु॰) अरनी। गनियारी।

अगेला (हिं॰ पु॰) १ हाथमें सबसे आगे पहननेका आभूषण। २ भूसेके साथ उड़ जानेवाला अन्न।

अगेह (सं॰ त्रि॰) जिसके मकान न हो। लामकां। बिना भवनका।

अगैरा (हिं॰ पु॰) फ़सलका पहला अन्न।

अगोई (हिं॰ वि॰) ज़ाहिर। प्रकट। छिपी नहीं।

अगोचर (सं॰ त्रि॰) न गावः इन्द्रियाणि चरन्ति अस्मिन्, गो-चर-घ। गोचरसंचरवहब्रजव्यजापणनिगमाश्च। पा॰ ३।३।११९। इन्द्रियसे अप्रत्यक्ष विषय, अज्ञात। जो इन्द्रियसे जाना न जा सके, नामालूम।

गोचर-शब्द जिस इन्द्रियके साथ प्रयुक्त होता, उससे उसी इन्द्रियका बोध्य समझ पड़ता है। जैसे दृष्टिगोचर, अर्थात् दर्शनेन्द्रियका बोध्य या आंखसे देखा। कर्णगोचर, अर्थात् श्रवणेन्द्रियका बोध्य या कानसे सुना, और ज्ञानगोचर, अर्थात् ज्ञानेन्द्रियका बोध्य या अक्ल़ से समझा हुआ। अगोचर—अज्ञात।

अगोट (हिं॰ स्त्री॰) १ रोक। २ शरण। ३ भित्ति। ४ नीव।

अगोटना (हिं॰ क्रि॰) १ रोकना। २ अटकाना। ३ पकड़ लेना। ४ रख छोड़ना।

अगोता (हिं॰ क्रि॰ वि॰) आगे, सम्मुख, सामने। (पु॰) स्वागत।

अगोरदार (हिं॰ पु॰) १ चौकीदार। २ पहरुआ। ३रक्षक।

अगोरना (हिं॰ क्रि॰) १ मार्ग देखना। २ किसीके वास्ते बैठे रहना। ३ रक्षा करना। ४ ख़बर लेना। ५ पहरा देना। ६ अटकाना।

अगोरिया (हिं॰ पु॰) खेत रखानेवाला। रखवाला।

अगोही (हिं॰ पु॰) जिस बैलके सींग आगेको निकले हो। नुकीले सींगवाला बैल।

अगौंडी (हिं॰ स्त्री॰) गन्ने या ऊखके ऊपरका हिस्सा।

अगौकस् (सं॰ पु॰) अगः पर्वतः ओकः स्थानं यस्य। १ शरभ। २ सिंह। ३ श्रेष्ठमृग। ४ पक्षी। (त्रि॰) पर्व्वतवासी, पहाड़ी।

अगौढ़ (हिं॰ पु॰) अग्रिम। पेशगी। अगाऊ। आगे दिया जानवाला रुपया।

अगौनी (हिं॰ क्रि॰ वि॰) आग। पहिले। (स्त्री॰) १ अभ्यर्थना। पेशवाई। २ विवाहमें बरातकी अगवानीके समय दरवाज़ेपर छूटनेवाली आतिशबाज़ी।

अगौरा (हिं॰ पु॰) ऊख या गन्नेके ऊपरका भाग।

अगौली (हिं॰ स्त्री॰) एक प्रकारकी छोटी ऊख।

अगौहैं (हिं॰ क्रि॰ वि॰) १ आगे। २ पहिले। ३ सामने।

अग्नामरुत् (सं॰ पु॰ वै॰) अग्निश्च मरुच्च। मृ-उति मरुत्। मृगोरुति। उण् १।९४। द्विवचनान्त द्वन्द्व। अग्नि और मरुत् देवता, जो एक हविःको पान करते हैं।

अग्नाविष्णु (सं॰ पु॰) द्विं द्वि आनङ् अग्निश्च विष्णुश्च। विषे किञ्च। उण् २।३९। एक आहुतिभोक्ता देवद्वय; अग्नि और विष्णु।

अग्नायी (सं॰ स्त्री॰) अग्नि-ऐङ्-ङोष्। अग्नि शब्द देखो। १ अग्निकी भार्या, स्वाहा। २ त्रेतायुग।

अग्नि (सं॰ पु॰) अङ्ग-नि। अङ्गति ऊर्ड्ध गच्छतीति। अङ्गोर्न्नलोपश्च। उण् ४।५०। १ अनल, वह्नि, पावक, हुताशन, आग, आतिश। २ अग्निदेवता। परम पुरुषके मुखसे इनका जन्म हुआ है। (ऋक् १०।९०।१) मतान्तरसे धर्म्मके औरससे वसु-भार्याक गर्भमें अग्नि उत्पन्न हुए थे। किसी स्थलमें लिखा है, कि यह कश्यप और अदितिके पुत्र हैं। अग्नि स्थूलकाय, लम्बोदर और रक्तवर्ण हैं। इनके केश, श्मश्रु, भ्रू और चक्षु पिङ्गलवर्ण हैं, और यह हाथमें शक्ति और अक्षसूत्र लिये बकरेपर सवार रहते हैं। पुराणमें इनकी और भी अन्यान्य प्रकार मूर्तियों की वर्णना लिखी है। कहीं पर इनके तीन पैर, सात हाथ और दो मुंह बताये गये हैं, और इनका बालार्क जैसा रङ्ग निर्ड्धारित हुआ है। यह दक्षिण-पूर्वकोणके अधिष्ठात्री देवता हैं। ऋग्वेदके एक-चतुर्थीं शसे भी

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