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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/११४

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अग्निकुल—अग्निगर्भ
अग्निकुल—राजवंश विशेष। राजपूतानेके आबू पहाड़पर ऋषिमुनियोंका आश्रम था। कहते हैं, कि दैत्य उनके साथ उत्पात करते रहे। उनके अग्निकुण्डमें अस्थि, रक्त, मांस डाल देते, जिससे यज्ञमें बड़ा विघ्न पड़ता था। यह उपद्रव दूर करनेके लिये ऋषियोंने अग्निकुण्ड जलाकर शिवकी आराधना की। सुतरां वैदिक कार्यकी रक्षा करनेके लिये यज्ञकुण्डसे क्रमान्वयमें परिहार, चुल्क, परमार और चाहमान इन चार महावीरोंने जन्म ले दैत्योंको विनष्ट किया।

परमार, परिहार प्रभृति देखो।

अग्निकेतु (सं॰ पु॰) अग्नेः केतुरिव। चाय-तु केतुः चायः किः। उण् १।७३। १ ऊर्द्धगामी अग्निकी शिखा, ऊपर जानेवाली आगकी लपट। २ ऊर्द्धगामी धूम, ऊपर चढ़नेवाला धुआं।
अग्निकोण (सं॰ पु॰) अग्नेः अग्निदेवाधिष्ठितः कोणः। पूर्व्व-दक्षिण कोण। इस कोणके दिक्पाल अग्नि हैं।
अग्निक्रिया (सं॰ स्त्री॰) अग्नौ क्रिया क-श। कृञः श च। पा॰ ३।३।१००। अन्त्येष्टिक्रिया। विधिपूर्व्व क अग्निमें मृतदेह दग्ध करना। मुरदे का जलाना।
अग्निक्रीड़ा (सं॰ स्त्री॰) आगका खेल। रङ्ग-रङ्गकी आग जलाना, आतिशबाज़ी।

आगका खेल—चैत्रमें एक मासके महाव्रतके समय संन्यासी अन्तिम दिन और रातको नाना स्थानोंसे काठको आहरण कर प्रज्वलित करते हैं। पीछे ज्वलन्त अङ्गारोंपर चलते-फिरते और उन्हें चारो ओर फेंकते हैं। इस आगके खेलका नाम फूल-खेल है। एक मासके महाव्रतके समय बङ्गालमें प्रायः सभी जगह यह उत्सव होता है। किन्तु गवर्नमेण्ट द्वारा चड़क-पूजा बन्दकर दी जानसे, कितने ही गांवोंमें अब फूल खेलकी धूमधाम नहीं देख पड़ती।

आतिशवाज़ी—अन्नप्राशन (पसनी), यज्ञोपवीत, विवाह, दोल, रासयात्रा प्रभृति उत्सवोंमें अनेक कालसे भारतके बीच आतिशबाज़ी छोड़नेकी प्रथा चली आती है। इनमेंसे विवाह, दोल और रासयात्रामें इसकी धूम कुछ ख़ास तरहकी होती है। नीचे लिखी आतिशबाज़ियां अधिक प्रचलित हैं—

फुलझड़ी—गन्धक सौमें २२ भाग, शोरा ७०, हर-ताल ५॥, अरहरका कोयला २॥ ; यह कई चीजें पहिले अलग-अलग ले अच्छी तरह चूर करे, इसके बाद होशियारीसे एकमें मिला काग़ज़के लम्बे चोंगेमें भरे। रातको इसकी एक ओर आग लगानेसे बढ़िया सफ़ेद रोशनी होती है।

अनार—शोरा सौमें ५४॥, गंधक ६॥, पारा ३, मुद्राशङ्ख १, हरताल १६, और कोयला ३ भाग ले; पहिले पार और गन्धकको एक हीमें मिला दे। इसके बाद हरताल और मुद्राशङ्ख दोनो एकमें पोस ले ; अन्तमें सब चीज़ें एक ही साथ पीसे। पिस जानेपर चूर्णमें १६ भाग लौहचूर्ण या लोहेका बुरादा डाल दे। मट्टीके अनारमें यह चूर्ण भर अँधेरी रातके समय आग लगानसे अच्छे फूल छूटा करते हैं। अनारकी बारूद ज्य़ादा पीसना या उसके भीतर ज्यादा ठूंसना न चाहिये।

पीली रोशनी—शोरा सौमें २७, गन्धक २७, नमक १९ और बारूद २७ भाग एक साथ मिलाये। पीछे इस चूर्ण में आग लगानेसे बहुत अच्छी पीली रोशनी निकलती है।

नीली रोशनी—क्लोरेट् अव् पोटास् सौमें ७५, गन्धक ८, जाङ्गाल १७ भाग लेकर क्लोरेट अव् पोटास और गन्धक अलग पीसे, फिर सब चीज़ोंको एकमें मिला ले। मिलानेके बाद फिर पीसना न चाहिये। इस चूर्णमें रातको आग लगानेसे बहुत ही अच्छी नीली रोशनी होती है।

अग्निगड़ (हिं॰ पु॰) चारो ओर आग जलाकर भूतप्रेत झाड़ना।
अग्निगर्भ (सं॰ पु॰) अग्निः इव जारकः गर्भः यस्य। १ अग्निजारक वृक्ष, वह पेड़ जिसका भीतरी भाग अग्नि जैसा लाल हो, अग्निगर्भे यस्य। २ सूर्यकान्त-मणि। ३ आतिशी शीशा। धूपमें आतिशी शीशा रखनेसे थोड़ी ही देरमें उसके नीचे रखी हुई कोई भी हलकी चीज जल उठती है। (स्त्री॰) अग्निः गर्भे अस्याः। अग्निगर्भा, शमौलता। बवूलका पेड़।

शमीगर्भ और शमीलता देखो।