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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/११६

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अग्नितेजस्—अग्निदग्धव्रण

अग्निमान्य विनष्ट होता और भूख ख़ूब लगती है।

अग्नितजस् (सं॰ त्रि॰) अग्नेस्तेज इव तेजो यस्य, बहुव्री॰। अग्नि-सदृश तेजस्वान्, अग्निकी तरह तेज-विशिष्ट। आग जैसा चमकीला। (क्ली॰) अग्नेः तेजः, ६-तत्। आगकी चमक, अग्निका तेज।
अग्नित्रय (सं॰ क्ली॰) अग्नस्त्रावयवम्, त्रि-अयच् ; ६-तत्। गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि। ऐसा कहते हैं, कि चन्द्रवंशीय पुरूरवा राजाने ऊर्वशीके साथ अविच्छिन्न प्रणय पानेके लिये अग्निको तीन भागकर यज्ञ किया था। उसी समयसे अग्नित्रयकी सृष्टि हुई।
अग्निद (सं॰ त्रि॰) अग्नि-दा-क। अग्निं ददाति। गृहदग्ध करनेके लिये जो आग लगाता है। शत्रु। आग लगानेवाला।
अग्निदग्ध (सं॰ त्रि॰) अग्निना दग्धः, दह-क्त ; ३-तत्।शास्त्रविधान द्वारा संस्कृत अग्निसे दग्ध। अग्नि द्वारा जलाई हुई वस्तु। आगसे जला। अग्निदग्धव्रण देखो।
अग्निदग्धव्रण—अग्निमें जलनेसे जो क्षत उत्पन्न हो। अग्नि, उत्तप्त जल, दुग्ध या अन्य तरल पदार्थसे देहका कोई स्थान जल जानेसे अधिकांश स्थलोंमें प्राणवियोग होता है। हस्तपदकी अपेक्षा देहका मध्यस्थल और मस्तक दग्ध होनेसे समधिक विपद् होती है। किसी स्थानमें जलनेसे पहले वहां फफोला पड़ता, अल्प सन्ताप लगनेसे केवल ऊपरका चर्म रक्तवर्ण हो जाता है। बहुत जल जानेसे फफोला तत्क्षणात् फूटता है। इसके बाद उत्कटस्थलमें दुर्बलता, आभ्यन्तरिक यन्त्रमें रक्ताधिक्य और प्रदाह होता है ; मस्तिष्क, फेफड़ा और अन्त्र सब विकृत हो जाते हैं। इस अवस्थामें प्रायः प्रथम दिनसे पञ्चम दिवस पर्य्यन्त मृत्यु की आशङ्का रहती है। यदि इस अभिनव विकारावस्थामें मृत्य न हुई, तो गलित क्षत होनेसे उत्तरकालमें दुर्बलताके कारण मृत्यु हो जानेकी सम्भावना है।

होमियोपेथी चिकित्सा।—ज्वालाको निवारण करने के लिये दग्धस्थानमें कभी कांजी, शीतल जल, पूतिकाका रस इत्यादिका प्रयोग न करे। उससे

और भी उत्कट उपसर्ग हो जाता है। दग्धस्थानको सर्वतोभावसे आवृत रखना ही जीवन रक्षाका प्रधान उपाय है। प्रथमतः दग्धस्थानके ऊपर एक लिण्ट, फलालेन या अन्य कोई कोमल वस्त्र लपेट दे। यह वस्त्र सात-आठ दिन एकादिक्रमसे उसी अवस्थामें रखे, एक बार भी खोले नहीं। वस्त्रके ऊपर मध्य-मध्य-में निम्न लिखित तेलका प्रयोग करे,—

आध छटांक कार्बलिक एसिड, डेढ़ पाव बादामया नारियलका तेल एकमें मिश्रित कर ले। अथवा आध छटांक चूनेका परिष्कार जल, डेढ़ पाव बादाम या नारियलका तेल, एकमें मिला डाले। भीतरी वस्त्र इस तेलसे आर्द्र कर उसके ऊपर कोमल रूई लपेट दे। कोई-कोई अर्टिका इरेन्स, क्यान्थे राइडिस्, क्रियासोट्को जलके साथ क्षतस्थानमें प्रयोग करते हैं। मोटी बात यही है, कि आग ही ऐसे उपायको अवलम्बन करना पड़ेगा, जिससे क्षतस्थानमें वायु न लगे।

सेवन करनेके लिये ज्वर रहते और प्रदाहावस्थामें एकोनाइट् देना चाहिये। दग्ध स्थानमें क्षतके पक जाने-पर आर्सेनिक् और कार्वोभेजिटेबेलिम्के सेवनसे उपकार होता है।

एलोपेथी—वाह्य प्रयोगके लिये ऊपर जो ओषध लिखे गये हैं, उन्हींका प्रयोग करें। सेवनके लिये, नाड़ी क्षीण और अत्यन्त वेगवती होनेपर युवाव्यक्तिको आध ड्रामसे दो ड्राम तक बारण्डी जलके साथ देनेकी व्यवस्था करना चाहिये। निद्राभाव आर अत्यन्त अस्थिरता उपस्थित होने पर चौथाई ग्रेन मात्रामें मरफियाको व्यवस्था करनेसे कितनी ही यन्त्रणा लाघव हो जाती है। किन्तु यह औषध अधिक मात्रामें खिलाना न चाहिये। क्षत पक जाने पर क्षतस्थानमें बोरासिक् मरहम, कार्बलिक आयल, थाइमल् इत्यादि लगाये। सेवनके लिये १ ग्रेन कुनेन, १० बिन्दु डां॰ नाइट्रिक् एसिड्, १ औन्स सिम्कोनेका क्वाथ, एक होमें मिला कर एक मात्रा बनाये। औषधकी ऐसी ही तीन मात्रा प्रत्यह सेवन कराना चाहिये। मध्य-मध्यमें २ ड्रामसे ४ ड्राम तक पोर्ट जलके साथ मिला कर पिलाये। रोगीके बलकी रक्षा सर्वतोभावसे कर्तव्य है। ऐसी