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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/११८

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अग्निध्—अग्निपुराण

अग्निध् (सं॰ पु॰) अग्नि-धा-क्विप्। यथाविधानेन अग्निं दधाति। ६ तत्। अग्न्याधानकर्त्ता।

अग्निधान (सं॰ क्ली॰) अग्नि-धा-ल्युट्, बहुव्री॰। अग्नि-होत्रगृह।

अग्निनक्षत्र (सं॰ क्ली॰) अग्ने: नक्षत्रम्, ६-तत्। कृत्तिका नक्षत्र।

अग्निनयन (सं॰ पु॰) अग्नि-नी-ल्युट् भावे, ६-तत्। १ अग्निसंस्कार। बहुव्री॰। २ देवता। ३ रक्तनेत्र, लाल आंखें। (क्ली॰) ६-तत्। अग्निके नेत्र, आगकी आंखें।

अग्निनिर्यास (सं॰ पु॰) अग्ने र्दीपको निर्यासोऽस्य। निर्-यस्-घञ्, निर्यास। अग्निजार वृक्ष।

अग्निनिर्वापण (सं॰ क्ली॰) अग्नि-निर्-वप्-णिच्-ल्युट। आग बुझा देना। आगका लगना रोकना।

अग्निनेत्र (सं॰ पु॰) अग्निर्नेत्राहुतहवि: प्रापयिता यस्य, अच् समासे बहुव्री॰। देवता। (क्ली॰) अग्ने र्नयनम्, ६-तत्। अग्निके चक्षु।

अग्निपद (सं॰ क्ली॰) अग्नेः पदं, ६-तत्। १ अग्न्याधानका स्थान। २ अग्निबोधक शब्द।

अग्निपरिक्रिया (सं॰ स्त्री॰) अग्नि-परि कृ-श भावे, कृ-ञः श च। ६-तत्। अग्निपरिचर्या। होमादिक्रिया।

अग्निपर्वत (सं॰ पु॰) अग्निसाधकः पर्वतः। भृमृदृशिषजि- पर्विपच्यमितमिनमिहाभ्योऽतच्। उण् ३।११०। पर्वि-अतच्—पर्वतः। आग्न यगिरि।

अग्निपरीक्षा (सं॰ स्त्री॰) अग्नौ परीक्षा, ७-तत्। १ अग्निमें स्त्रियोंके दोषादोषकी परीक्षा। २ अग्निमें स्वर्णादि धातुकी विशुद्धाविशुद्ध परीक्षा। खरा सोना मट्ठीकी आगमें रखनेसे विवर्ण नहीं होता। किन्तु मिलावटी सोनेका रङ्ग बदल जाता है। यही स्वर्ण, रौप्यादिकी अग्निमें परीक्षा है। पहिले यह परीक्षा भी अग्निमें होती थी, कि स्त्रियां सती हैं या व्यभिचारिणी, आज भी कोई-कोई इतर जातियोंमें यह प्रथा प्रचलित है। वेदिया और बाजीगर देखो। सीताने ज्वलन्त अग्निकुण्डके भीतर बैठ रामको अपनी पतिपरायणताकी परीक्षा दी थी। अब आगमें बैठ परीक्षा देनेका दिन नहीं रहा। आजकल केवल इतर जातियोंके बीच अग्निपरीक्षा रह गई है ; किन्तु वह है दूसरी

भांतिकी। स्त्रीके प्रति सन्देह होने पर घरका मालिक हलके लोहेका फार आगमें ख़ूब गर्मकर उसे जीभसे चाटनेको कहता है। साध्वी स्त्री होनेसे उसका मुंह नहीं जलता। किन्तु असती स्त्रीके चाटनेकी चेष्टा करते ही उसका मुंह जल जाता है। गृहस्वामी फिर

उसे ग्रहण नहीं करता, सुतरां उस अभागिनी नारीको यावज्जीवन कलङ्गका टीका माथेमें लगा बिताना पड़ता है। पहले भारतवर्ष और युरोपमें भी तस्करोंका दोषादोष अग्नि द्वारा परीक्षित होता था। राजसभामें चोरके पकड़ आनसे राजा इस बातकी परीक्षा अग्निमें लेते थे, कि वह यथार्थ अपराधी था या नहीं। अगरेजोंके इस देशमें आनेसे पहिले हिन्दू-नृपति इस विचारके पक्षपाती थे। उसी समय तक यह रीति दाक्षिणात्यमें प्रचलित रही, अब रहित हो गई है।

अग्निपुच्छ (सं॰ पु॰) अग्नेः अग्न्याधानस्थानस्य पुच्छः इव। ६-तत्। यज्ञस्थलमें आहिताग्निस्थानका पश्चा ड्भाग।

अग्निपुराण (सं॰ क्ली॰) अग्निना प्रोक्तं पुराणम्। अष्टादश पुराणोंके अन्तर्गत अष्टम पुराण। अग्निका कहा हुआ पुराण। अग्निने वशिष्ठके निकट ईशानकल्पके जिस वृत्तान्तको वर्णन किया था, उसीके विवरणपर अग्निपुराण बना। इसकी श्लोक-संख्या १०००० है। इसमें विष्णुका अवतार दिखाया गया है। जगत्सृष्टि, विष्णुपूजा, अग्निपूजा, मुद्रादिका विवरण, दीक्षा, अभिषेक, मण्डप-लक्षण, कुशमार्जन, पवित्रारोपण, देवालयप्रतिष्ठा, शालग्राम-पूजा, नाना प्रकारकी मूर्तिका लक्षण, विनायकपूजा, दीक्षाकी विधि, देव- प्रतिष्ठा, ब्रह्माण्ड-निरूपण, गङ्गा प्रभृति तीर्थका वृत्तान्त, षट्कर्म, मन्त्र यन्त्र, और औषधिका विवरण, कुञ्जीकाकी पूजा, षोढ़ान्यास, होम, मन्वन्तर, ब्रह्मचर्य्य, श्राद्ध, ग्रहयज्ञ, वैदिक और स्मार्तकर्म, प्रायश्चित्त, तिथिव्रत, वार, नक्षत्र और मासका व्रत, दीपदान, नवव्यूहार्चन, विवरण, दानधर्म्म, नाड़ीचक्र, सन्ध्यापद्धति, गायत्रीका अर्थ, लिङ्गस्तोत्र, राज्याभिषेकमन्त्र, राजधर्म, स्वप्न, शकुन, युद्धदीक्षा, नीतिशास्त्र, रत्ननिरूपण, धनुर्विद्या, व्यवहारविधि, देवासुरका युद्ध, आयुर्वेद,