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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१२५

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अग्निशिखा



अग्निशिखा तापसे अनेक पदार्थके साथ अक्षिजेन सहज में नहीं मिल सकता, – जैसे लोहा । लोहेमें मुरचा लगने से यह बात कही जा सकती है, कि वह सड़ता या गलता है । कारण, लोहे के साथ अक्षिजेन मिलने से "लौहजरा” (Oxide of Iron) निकलता है, जिसे हम मुरचा लगना कहते हैं । जलती हुई आगको भट्ठीमें एक लोहेका टुकड़ा 'डाल देनेसे वह गर्म और लाल हो और फिर बाहर निकालनेसे ठण्डा और काला पड़ जाता है, उसका वज़न नहीं घटता । ऐसे स्थल में लोहा आग जैसा होता, किन्तु जल नहीं जाता। लोहेको लकड़ोको तरह जलाने के लिये अधिक ताप आवश्यक है । कारण, लोहे के साथ अक्षिजेन सहजमें नहीं मिल सकता । किन्तु अनेक द्रव्योंके साथ अवषिजेन सहज में मिल जाता है । जैसे, कार्वन् और हाइड्रोजेन् (Carbon and Hydrogen)। लकड़ा, पत्थरके कोयले, तेल, चर्बी, घो प्रभृति द्रव्यों में कान् अथवा हाइड्रोजेन् अधिक रहता है। इससे आगका प्रयोजन पड़नेसे यह सकल द्रव्य हम अधिक बरतते हैं। कलकत्ता शहरमें जिस गेसकी रोशनी होती, वह पत्थर के कोयलेसे बनाई जातो है । कार्वन् और अक्षिजेनसे मिलो वस्तुको ही हम गेस कहते हैं । इस गेसके बीच अलिफाण्ट (Olefient gas) नामको एक प्रकार बाष्प रहती, जिसकी रोशनी बहुत तेज़ होती है। हाइड्रोजेन के जलते समय अग्निशिखा के ऊपर एक पात्र ढांक देनेसे उसमें पसीनेको तरह बूंद-बूंद पानी इकठ्ठा हो जाता है । लकड़ी और पत्थरके कोयलेमें कार्वन्का भाग अधिक होता है - लकड़ीमें सैकड़े पीछे ४५से ५२ और पत्थरके कोयले में 98 से ८४ अंश । लकड़ी- का जला कोयला और पत्थरका कोयला प्राय एक ही पदार्थ है । लकड़ीके कुछ जल जाने बाद उस पर मही • डाल देनेसे जिस तरह कोयला तय्यार होता, पत्थर- के कोयलेकी भी उत्पत्ति प्राय उसी तरह है । कितने युग-युगान्तर हुए, कि बड़े बड़े जङ्गल महीसे ढके पड़े हैं, जिससे वह अक्षिजेनके प्रभाव द्वारा धीरे-धीरे ११६ पत्थर जैसा कोयला बन गये हैं । पत्थरका कोयला देखो। लकड़ी का कोयला और पत्थरका कोयला विशुद्ध अङ्गार (Carbon) नहीं है। काष्ठादि जलनेसे जो राख निकलती, वह चार प्रभृति पार्थिव पदार्थ है । गर्मी पहुंचने से लकड़ीके विशुद्ध अङ्गारका भाग अक्षिजेन-संयोगस अङ्गारक बाष्प (Carbon dioxide or Carbonic Acid gas) बन उड़ जाता है । अतएव देख पड़ता है, कि जल जलकर जलीय बाष्प (Steam) और अङ्गार जलकर अङ्गारक-बाष्पको उत्पत्ति होती । जलीय बाष्प ठंढा होकर मेघ और जल बन जाती है । अङ्गारक बाष्पको वृक्षादि निश्वासके साथ खींचकर कार्वन् रख लेते और अतिजेन् छोड़ देते हैं । इस अङ्गारसे वृक्षादि पुष्ट बने रहते हैं। पोछे अन्यान्य पदार्थके साथ मिल वह काष्ठ और पत्र में परिणत होते हैं । फिर इस काठ और पत्रके पुनर्वार सड़ने या जलनेसे वृक्ष में अङ्गारक-बाष्प उपजती है। उसी अङ्गारक- बाष्प से पुनर्वार लकड़ी बनती है । जगत्का यह बड़ा ही आश्चर्य कौशल है। सूर्यकौ रोशन पानेसे वृक्षादि वायुका अङ्गार निकाल- कर अक्षिजेन्का भाग छोड़ सकते हैं। अङ्गारक बाष्प लेते समय वृक्ष सूर्य किरण के कियदंश उत्ताप और आलोकको सञ्चय कर रखते है । उनके शरीर में यह परिपाक नहीं होता । काल पाकर जब फिर उसी लकड़ीमें अक्षिजेन्के मिलनेका अवसर आता, तब यह सूर्यकिरण कुछ बाहर निकाल देनी पड़ती है । इसी कारण आग जलानेसे गर्मी और रोशनो होती है। कितने ही युग-युगान्तरको सूर्यकिरण राणीगञ्जको मट्टीके नीचे दबी पड़ी है, जिसे आज हम बाहर निकाल अन्नादि रांधते हैं | अङ्गारादि जलते समय नई विमिश्र बाष्प निकल जब ऊपरका उठतो, तभी इस उत्तापसे उत्तप्त हो बाष्प ज्योतिर्मय मूर्ति धारण करती है । यही अग्निशिखा है। शिखाका भीतरी भाग अग्निमय नहीं होता । ऐसा होनेसे अधिक उत्ताप होता, किन्तु प्रचुर रोशनी न होती । हाइड्रोजेन् और अक्षिजेन् सम्मिलित जलने से जो शिखा (Oxyhydrogen flame ) उठती, उसका ताप इतना उग्र होता, कि वह लकड़ीकी तरह लोहे को |style="vertical-align: top; text-align:left; padding-right:10px; padding-left:10px; border-right:none; border-left:none;"|