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अग्निसारा (सं० स्त्री०) फलशून्य शाखा, बिना फलको डाल । मञ्जरी ।
अग्निसावर्णि (सं० पु० ) एक पुराकालके मनु, पहिले
समयके एक मनुका नाम । मनु देखो ।
अग्निसिंह (सं० पु० ) सातवें कृष्ण वासुदेवके पिताका नाम । (जैनशास्त्र)
अग्निसिंहनन्दन (सं० पु० ) अग्निसिंहके लड़के ।
अग्निसुन्दररस (सं० पु० ) अजीर्णाधिकारका रस, वह रस जो अजीर्ण पर प्रयोग किया जाये ।
“टङ्गणं भागमेकञ्च मरिचञ्च विभागिकम् । १ भाग सुहागा और २ भाग मिर्च अदरकके रसमें भावना देनेसे यह महौषध तैयार होता है । इसके खानेसे अजीर्ण मिटता और भूख लगती है । अग्निसूत्र (सं० पु० ) १ अग्निका सूत्र, आगका धागा ।
२ पवित्र तृणका वह सूत्र जो युवा ब्राह्मणको यज्ञके समय अधिकार देनेके लिये पहनाया जाता है। अग्निसेवन (सं० क्लो०) अग्निसेवा, तापना ।
अग्निस्तम्भ (सं० पु०) ६ - तत् । १ अग्निको दाहिकाशक्ति- निवारक मन्त्रविशेष, वह मन्त्र जिसके पढ़ने से आग- को जलानेवाली ताकत रुक जाये । २ अग्निको दाहिकाशक्तिनिवारक औषध विशेष ।
यथा-
बेलके चूर्ण और जोंकको एक साथ बांटकर लगा लेनेसे हाथ धीमी आगमें नहीं जलता । वच, मिर्च, कुटकी, मुण्डोर और नागरमोथा चबा आग खानेसे हमें भी आंच नहीं लगती । पहिले कपूर या अकर करहा चबाकर मुंहमें रखे । इसके बाद हलकी लकड़ी- को आग मुंह में डालनेसे जीभ और गलफरे नहीं जलते हैं । आध छटांक पारा, पाव छटांक कपूर और एक छटांक आर्सेनिक वेलको एक होमें अच्छी तरह पीस डाले । पीछे इस द्रव्यको हाथमें मल गले हुए शौकी घरियामें डालनेसे उंगली नहीं जलती । एक सूत पहिले नमकसे अच्छी तरह साफ करना पड़ता है । इसके बाद सूतको सुखा । पीछे उसके एक छोरमें कोई हलकी चीज बांध आग लगानेसे सूत तो जल
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जाता, किन्तु उसकी भस्म के सहारे वह हलकी चीज़ लटका करती है। कोई-कोई योगी हाथ के ऊपर पीपल के पत्ते रख होम करते हैं । ज्वलन्त अङ्गार भक भक जला करते हैं, चौकी आहुति देने में आग झपसे लपक उठती है, किन्तु हाथ पर आंच नहीं पहुंचती । यह ठीक-ठीक प्रकाशित नहीं, कि इस प्रक्रियाका गूढ़ कौशल क्या है । अग्निस्तम्भके जो कई एक कौशल प्रकाशित हैं, उनमें प्रखर अग्निको आंच सह्य नहीं होती । अफीम, फिटकरी, सांभर नमक, कतोरेका गोंद, मुर्गी के अण्डे का छिलका और पारा, सिर्केके साथ एक घोंट हाथ पर मले । फिर उस पर पीपल के पत्ते रख होम करनेसे हाथ नहीं जलता । कोई-कोई कहते हैं, कि बड़े मेंड़कका भेजा भी हाथ पर लगा होम करनेसे आगकी आंच नहीं लगती । घरमें आग लगनेसे,उसे बुझानेकी तीन प्रकारकी कलें प्रचलित हैं । १ - वह दमकल जो हाथसे चलाई जाती है; २ – बाष्पयन्त्र संयुक्त यानी अञ्जनदार दमकल ; ३– रासायनिक यन्त्र । पहली और दूसरो कलका विवरण दमकल और बाष्पयन्त्र में देखो । तीसरी कल सहज और सुलभ है। जिन बाज़ारों में सर्वदा आग लगती, वहां इस कलके रहने से बड़ा उपकार होता है। रासायनिक कल दो तरह की होती है— छोटी और बड़ी । छोटी कल एक आदमी उठाकर ले जा सकता है; बड़ी कल गाड़ी पर रहती, जिसे घोड़ा, बैल या आदमी खींचा करते हैं। इसका कौशल भी वैसा ही है, जैसा सोडा वाटर बनानेको प्रणालीका । धातुके बने घड़े जैसे एक बरतन में सोडा (Bicarbonate of Soda) मिला पानौ और उसमें एक बोतल सल्- फुरिक् एसिड (Sulphuric acid) रहता है। बोतलका मुंह अच्छी तरह बन्द कर देते हैं । आग बुझानेके समय बोतलका काग खोल देने पर सल्- फुरिक एसिड और सोडेके संयोग से कार्बनिक एसिड ग्यास निकलतो, जिससे पानी उछल पड़ता है । उछला हुआ पानी, निकलनेको दूसरौ राह न पा घड़े के |