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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१३४

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अग्निहोत्रहवनो अग्नीषोम



शतपथ ब्राह्मण में अग्निहोत्रादि यज्ञोंका इस रूपसे फल कहा गया है- लोकान्तर में अग्निहोत्र याज्ञिक प्रत्यह सवेरे और सन्ध्याको, दर्शपूर्णमासयाजी पक्षान्त, चातुर्मास्ययाजी चार मासान्तर, पशुवइयाजी छ: मासके अन्तर, सोमयाजी सम्बत्सर, और अग्नि- चितुवाले शतवर्षान्तर अपने इच्छामत भोजन करते हैं। यह सकल याज्ञिक एक प्रकार अमरत्वको प्राप्त होते हैं।

अग्निहोत्रहवनी (सं० स्त्री०) ६ तत्। अग्निहोत्रहविः हयतेऽनया, करणे ल्युट्। अग्निहोत्रके हव्यग्रहणका ऋक् - मन्त्र विशेष ।
अग्निहोत्रहुत् (सं० पु० ) अग्निहोत्र-हु- क्विप् भूते।

६-तत्। कृताग्निहोत्र, अग्निहोत्र करनेवाला पुरुष। अग्निहोत्राहुति (सं० स्त्री०) अग्निहोत्रमें दी जानेवाली आहुति।}}

अग्निहोत्रिन्, अग्निहोत्री (सं० पु०) अग्निहोत्र-इन्। साग्निक ब्राह्मण।

आजकल प्रकृत अग्निहोत्री कोई नहीं। उत्तर-पश्चिमाञ्चल, दाक्षिणात्य और मिथिलादि स्थानोंसे

कोई-कोई ब्राह्मणके बीच किसी-किसी सम्प्रदाय में अग्निहोant कुछ-कुछ आभास मिलता है । वह यज्ञाग्निकी रक्षा नहीं करते, किन्तु जिस अग्नि मृतव्यक्तिको अन्त्येष्टि सम्पन्न होती है, वह दस दिन तक वही चितानल रक्षित रखते हैं, दशम दिवस श्मसानमें जा और विधिपूर्वक चिता पर कुश और पिण्ड रखकर अग्नि शान्त कर देते हैं । बम्बई के पास अग्निको पूजा करते हैं । उनमें अनेकोंका यही विचार है, कि वह पुराने आर्य वंशको शाखा प्रशाखा हैं ।

पासो देखो ।

अग्निहोत्रोच्छिष्ट (सं० क्लो०) वह पदार्थ जो अग्नि- होत्रमें बच जाये ।}}

अग्नीध् (सं० पु०) अग्नि-इन्ध-क्विप् भावे, ६-तत् । १ अग्निका उद्दीपन । २ अग्न्याधानकर्त्ता ।
अग्नीध्र (सं० पु०) अग्नि-धृ-क, दीर्घः । अग्नि दधाति । १ ऋत्विक्- विशेष । यज्ञीय अग्निका रक्षा करनेवाला ब्राह्मण । २ प्रियव्रत राजाके पुत्र, जो अपने अंश में जम्ब होप पा कर वहांके राजा हुए थे ।विष्णुपुराण २।१।१२। भागवतमें उनका नाम आग्नीध्र लिखा गया है ।
अग्नीध्रा (सं० स्त्रो०) अग्निकार्य । घृताहुतिके बाद अग्निज्वालन ।
अग्नीध्रौ(सं० स्त्री०) सोमीय अग्निको रक्षा ।
अग्नोन्द्र(सं० पु० ) अग्निश्च इन्द्रश्च द्वन्द्वः । अग्नि और इन्द्र नामके दो देवता, जो एक हविःको पान करते हैं ।
अग्नीन्धन (सं० त्रि०) अग्नि-इन्ध-ल्युट्, अग्निः इध्यते- ऽनेन । ६-तत् । १ मन्त्र - विशेष । (क्लो०) २ अग्निकार्य । अग्नीपर्जन्य (सं० पु० ) अग्नि और पर्जन्य या मेघ ।
अग्नीय (सं० त्रि०) अग्नि छ । अग्निके समीपका, आगके पासवाला (स्थान) ।
अग्नीवरुण (सं० पु० द्वि०) अग्निश्च वरुणश्च, इन्द्रः ईदन :

सोमवरुणयोः । पा ६।३।२७ । अग्नि और वरुण देवता,

जो साथ-साथ एक हविः पान करते हैं ।
अग्नीषोम (सं० पु०) अग्निश्च सोमश्च द्वन्द्वः । अग्नि और सोमदेवता, जो साथ-साथ हविः पान करते हैं ।