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गोली बहुत समय से बनती चली आती है। नहीं जानते, कि यह अनुमान कहां तक सत्य है । किन्तु इसका प्रमाण अवश्य मिलता है, कि प्राचीन आर्य तीर-फलकमें अग्नि और आजकल के डिनामाइट जैसे किसी भयानक दाह्य पदार्थको व्यवहार करते थे । “नं कूटैरायुधैर्हन्यात् युध्यमानो रणे रिपून् । राजा कभी कूटास्त्र द्वारा युद्ध न करे, कर्ण्य स्त्रको प्रहार कर भी युद्ध न करे, या जिस वाणका फला विषाक्त हो या जिसमें अग्नि प्रज्वलित रहे, उससे भौ "शत्रुको न मारे । मनुके इस वचनसे स्पष्ट हो मालूम होता है, कि अग्न्यस्त्र केवल कवियोंकी कल्पना ही नहीं । कल्पना होनेसे मनु कभी उसके लिये कोई निषेध-विधि न बताते । अग्नास्त्र सबके ऊपर निक्षेप करनेको नहीं है । राक्षस प्रभृति प्रबल शत्रुओंको ही आर्य अग्निवाणसे मारते थे। फिर भी, महाभारत इसका प्रमाणस्थल है, कि बलवान् आर्य अपने क्रोधको संवरण कर न सकनेसे किसी-किसी वीर मनुष्य पर भी अग्निवाण छोड़ देते थे । प्रथम- प्रथम मनुष्य अग्नि द्वारा अपनी रक्षा करते भी शत्रु के नष्ट करनेको चेष्टामें लग जाता था। किसी ग्राम या दुर्ग पर आक्रमण करनेसे शत्रुओके सिर पर पत्थर या आग फेंक दी जाती थी । सन् १३८८ ई० में तैमूरशाहने दिल्लीपर चड़ाई की। उन्होंने भारतवर्षीय गजयूथको भय दिखानेके लिये ऊटकी पीठ पर तृण- राशि जला उसे शत्रुओंको ओर खदेर दिया। वही आग देख सब हाथो भाग खड़े हुए। आर्य पहिलेसे तीरके फलामें राल, तेल, घी, पटुआ, रूई प्रभृति द्रव्य लगा रखते थे। शत्रु को वाण मारते समय उसे जलाकर निक्षेप करते । क्रम-क्रमसे बुद्धि और विज्ञानको उन्नति होते रहो, उन्होंने और भी उत्कट-उत्कट ब्रह्मास्त्रोंको आविष्कार किया। आराकॉन्, ब्रह्मदेश, चीन, सिन्धु नदिके निकटवर्ती स्थान और ईरान में मट्टीके भीतर नाना प्रकार दाह्य-पदार्थ (Naptha and other bitumenous substances) |
मिलते हैं। इन्हीं पदार्थोंसे आजकल केरोसीन तेल प्रस्तुत होता है। आर्य इन नेप्था प्रभृति द्रव्योंके साथ राल, गन्धक, शोरा और अन्यान्य दाह्य पदार्थ मिला किसी प्रकार अस्त्र बनाते रहे होंगे । यही अनुमान होता है, कि उनका तेज आजकलके डिनामाइटको अपेक्षा किसो अंशमें न्यन नहीं । मूर्खके हाथमें पड़नेसे इस अस्त्र द्वारा एक ही दिनके बीच त्रिजगत् उलटाया जा सकता है, इससे विज्ञ लोग ऐसे-वैसे व्यक्तिको अग्न्यस्त्रका गूढ़ सन्धान बताते न थे । नितान्त हो प्रिय शिष्य होनेसे गुरु उसे दो-एक वाण देते थे। आर्योंके इतना सावधान रहते भी प्राचीन यूनानियोंने कैसे अग्नास्त्रका कौशल सीख लिया ? यूनानमें ऐसा प्रवाद है, कि कालेनेकस् नामक जनैक व्यक्तिने इन अस्त्रोंको आविष्कार किया था । मालूम होता है, कि वह भारतवर्ष के 'कल्याणाक्ष' नामक कोई ब्राह्मण होंगे। सन् ६७३ ई० में कुस्तुन्तुनिया (Constantinople) नगर अवरुद्ध होने पर नगर- वासियोंको केवल इसी अव्यर्थ अग्नास्त्र के प्रभावसे हो शत्रुओंके हाथ निस्तार मिला था । इतिवृत्त-लेखक गिबन साहबने इस महास्त्रको यूनानियोंको अग्नि बताया है । पहिले मुसलमान अग्नास्त्रका विषय जानते न थे; उन्होंने रूमियोंसे उसका निर्माण-कौशल सीख लिया । जेरूसलमके लिये ईसाइयों और मुसलमानोंमें जो तुमुल समर (Crusades) हुआ, उसमें अग्निवाणसे विस्तर लोग मारे गये थे । सर दे जैन्भिल (Sir de Joinville) नामक जनैक फांसोसोने अपनी आँखों यह युद्ध देख अग्निवाणके सम्बन्धमें ऐसा लिखा है,— "La manière du feu grégois estoit tele que il venoit bien devant aussi gros comme un tonnel de verjus, et la queue du feu qui partoit de li, estoit bien aussi grant comme un grant glaive. Il faisoit tele noise au venir, il sembloit que ce feust la foudre du ciel; il sembloit un dragon qui volast par Pair. Tant getoit grant clarté que l'on véoit parmi l'ost comme se il feust jour, pour la |
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अग्न्यस्त्र