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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१३९

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अग्रजात—अग्रद्दीप



 'अग्रजन्मा द्विजे ज्येष्ठभ्रातरि ब्रह्मणि स्मृतः । मेदिनी ।

अग्रजात (सं० पु०) अग्रे-जन-क्त, ७ तत् । १ ज्ये ष्ठभ्राता, बड़ा भाई । २ ब्राह्मण ।
अग्रजाति (सं० पु०) अग्र-जन-क्ति, कर्मधा० । प्रधान जाति, ब्राह्मण ।
अग्रजिह्वा (सं० स्त्री०) अगा जिह्वा, कर्मधा० । जिह्वा- का अग्रभाग, जीभका अगला हिस्सा ।
अग्रणी (सं० स्त्री०) अग्र-नो- क्विप्, अग् नीयते ।

सत्मूद्विषद्रुहदुहयुजविदभिददिजिनौराजामुपसर्गेऽपि क्विप् । पा ३२२२६१।

७-तत् । १ अग्रिम, अगुआ । २ श्रेष्ठ, बड़ा । ३ प्रभु, मालिक ।
अग्रतः, अग्रतस् (सं० अव्य०) अग्र-तस् पञ्चम्यर्थे । पहिले, आगे,पुरतः ।
अग्रतः सर (सं० त्रि०) अग्रतस् सृट ।
पुरोग्रतोर्ग्रषु सर्तेः । या ३।२।१८।
इति ट । अग्रगामी, आगे जानेवाला । अग्रदानिन्, अग्रदानो (सं० पु० ) अग्रदान-इन् ।
१ दानमें पतित ब्राह्मण, खराब दान लेनेवाला ब्राह्मण । २ महाब्राह्मण या महापात्र,जो प्रेत सम्प्रदानका षड़ङ्ग तिलादि दान ले ।

भारतमें अग्रदानी ब्राह्मणको एक स्वतन्त्र श्रेणी है। इनकी संख्या बहुत ही थोड़ी होती है । सब ग्रामोंमें इस सम्प्रदायके ब्राह्मण नहीं मिलते । विशुद्ध सम्भ्रान्त ब्राह्मण इनके साथ आहार-व्यवहार, मेल-जोल कुछ भी नहीं करते हैं ।

अग्रदानीय (सं० पु० ) अग्र-दान छ । अग्रदानी ब्राह्मण, वह ब्राह्मण जिसे प्रेत-कर्मका दान दिया जाय । महाब्राह्मण, महापात्र ।
अग्रद्वीप (सं० क्ली०) अग्रे प्रथमे उत्पन्नं दीपम् । द्वयोर्गता आपो यस्मिन्निति दौपम् ।
ह्यन्तरुपसर्गेभ्योऽप ईत् । पा ६।३।९७।
सबसे पहिले उत्पन्न हुआ द्दौप या टापू ।

गङ्गाके गर्भमें रेत पड़नेसे पहले जो दीप उत्पन्न हुआ, वही बङ्गालका अग्रहोप है । अग्रहोपसे प्रायः तीन कोस उत्तर-पश्चिमकोणमें जो दूसरा रेत पड़ा, वही रेत आजकल नवद्दीप नामसे प्रसिद्ध है । अग्रद्दीप में गोपीनाथ ठाकुरके उत्सवोपलक्ष प्रति वत्सर वारुणीसे पहिले कृष्णा एकादशीको एक बड़ा मेला

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लगता, जो सात दिन रहता है। इसके उपलक्षमें कोई २५००० लोगोंका समागम होता है। यात्रियों के बीच बाउल, दरवेश और अन्यान्य सम्प्रदायके वैष्णव ही अधिक देखे जाते हैं । इस मेले में प्रति वर्ष लाखों रुपयेका माल लिया-दिया जाता है । अग्रद्दीप नदीया ज़िलाके अन्तर्गत वर्तमान है ।

गोपीनाथका इतिहास बहुत ही अद्भुत है । सत्य के साथ कुछ-कुछ अद्भुत घटना मिली न रहनेसे देवताके प्रति सामान्य लोगोंको भक्ति उत्पन्न नहीं होती । कहते हैं, कि अग्रहोपमें किसी घोषके सन्तान होती न थी। इसलिये वह नियत देवताके निकट पुत्रका- मना किया करता । एक दिन वह पड़े सो रहा था । सोते-सोतें उसने स्वप्न देखा, कि मानो उसके उसीसे बैठे कोई कहता था,“कल तुम स्नान करने जाकर गङ्गाजलमें एक पत्थर देखोगे । उसमें यदि कृष्णमूर्ति को निर्माण कराकर तुम उसे स्थापन करो, तो मैं ही तुम्हारा पुत्र बन जाऊंगा ।" ग्वालेकी नींद टूट गई । उसने उठके देखा, कि रात नहीं, सवेरा था। प्रभातका स्वप्न प्रायः मिथ्या नहीं होता । विशेषतः, गोपजातिके प्रति श्रीकृष्णको उस दिन ही वह नई कृपा न थी । एक बार वह गोकुलमें नन्दघोषके पुत्र हुए, फिर यदि अग्रद्दीपके गोपको पिता कहनेकी उन्हें साध हुई होती, तब तो आशालतामें फूल खिले थे, हाथों-हाथ फल मिल ही जाता । यही विचार वह स्नान घाटको रवाना हुआ। वहां जाकर देखा गङ्गाजल में एक पत्थर बहते चला आता है । पत्थर उज्ज्वल नीलवर्ण था और उसमें दलित अञ्जन जैसा लगा, जिसे देख खानिका नीलम भी लज्जित होता था । उसी इन्द्रनील मणिको कृष्णमूर्ति बनवाई गई, जो आजकल गोपीनाथ कही जाती है। घोष महाशयने विग्रहमूर्ति प्रतिष्ठित कर लोकान्तरको गमन किया। उनकी मृत्युतिथि वारुणीसे पहिलेको कृष्णा एकादशी है । मृत्युतिथिके दिन पूजक मट्टीपर कुश बिछाकर विग्रहके हाथमें पिण्ड पकड़ा देते हैं । द्वारको रुद्ध कर किञ्चित् काल पीछे खोलनेसे यह अनेकोंने देखा, कि वही पिण्ड कुश पर जाकर गिर पड़ता है ।