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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१४०

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अग्रद्वीप-अग्रनासिका



प्रकृत बात यह है, कि घोष महाशय ग्वाले नहीं, जातिके उत्तराढ़ीय कायस्थ और चैतन्यके जनेक पार्षद थे। एक दिन आहारान्त में चैतन्यने मुखशुद्धिको करना चाहा था। घोष महाशय भीख मांग एक हर्र ले आये। उन्होंने आधी तो प्रभुको उस दिन दी और बाक़ी आधी दूसरे दिनके लिये रख छोड़ी। चैतन्यने देखा, कि घोष महाशयकी उस समय तक स्पृहा गई न थी। इसलिये उन्होंने विरक्त हो उनसे घर वापस जाने को कहा। घोष महाशयने रोते-रोते कहा,—'मैं आपका पुत्रसे अधिक प्यारा था। घरमें आपको न देख मैं कैसे रह सकूंगा?' चैतन्यने कहा—'तुम कृष्णमूर्तिको स्थापन कर उसके प्रति वात्सल्यभाव दिखाना, इससे तुम्हारा मनस्ताप दूर हो जायेगा।' इसी उपदेशानुसारसे अग्रद्वीपमें यह गोपीनाथ प्रतिष्ठित हुए हैं। घोष महाशयका प्रकृत नाम वासुदेव और निवास अग्रद्वीप के निकट कुलिया ग्राम था।

गोपीनाथकी प्रतिमूर्ति कोई डेढ़ हाथ ऊंची होगी। इसकी बनावट बहुत ही अच्छी है। नवद्वीपके राजाओंने इस विग्रहकी सेवाके लिये विस्तर भूमिको दान किया है और दोलोपलक्ष में वह बड़ी धूमधाम करते हैं। कहते हैं, कि राजा नवकृष्ण गोपीनाथको एक बार कलकत्ते ले आये थे, जहां उन्होंने गोपीनाथ ही जैसी एक दूसरी मूर्तिको निर्माण कराया। उधर कृष्णचन्द्र राजाने ठाकुरके शोकसे अत्यन्त कातर हो अन्नजलको बिलकुल त्याग किया। इसके बाद गोपीनाथने स्वप्नयोग से यह प्रत्यादेश दिया, 'तुम कलकत्ते आओ, मैं राजा नवकृष्णके घरमें बैठा हूं।' कृष्णचन्द्र राजाने ठाकुर वापस देनेके लिये नवकृष्ण बहादुरसे अनेक साध्यसाधना की। राजा नवकृष्णने कहा,–'अच्छा, तो हमारे देवालय में आप आइये और अपने गोपीनाथको पहचानके जाइये। इसमें हमें कोई आपत्ति नहीं है।' राजा कृष्णचन्द्रने देवालयमें जाकर देखा—गोपीनाथ तो हैं, किन्तु दो मूर्ति। दोनों मूर्ति एक ही जैसी थीं, वेशभूषा और आकार-प्रकारमें कोई भेद देख न पड़ता था। वह

विषम समस्यामें पड़ गये। उन्होंने अनेक चेष्टायें कीं, किन्तु यह पहचान न सके, कि उनके गोपीनाथ कौन थे। दूसरी रातको गोपीनाथने उन्हें यह स्वप्न दिया,—'महाराज! तुम घबराना नहीं। जिस मूर्तिके माथे पर तुम पसीना देखना, उसीको अपना विग्रह समझना।' प्रातःकालमें कृष्णचन्द्र राजाने नवकृष्ण बहादुर से कहा,—'चलिये, आज मैं अपने गोपीनाथको पहचान लूंगा।' यह कह कृष्णचन्द्र राजाने देवालयमें जाकर देखा, कि एक प्रतिमाके कपालमें बूंद-बूंद पसीना मानो अलकावलीसे सजाकर रखा गया था। यह देख प्रेमभर के कारण कृष्णचन्द्रकी आँखोंसे आँसू फूट-फूट बहने लगे। उन्होंने यह कह जल्द-जल्द विग्रहको गोदमें उठा लिया, कि हां, वही उनके गोपीनाथ थे।

कोई-कोई कहते हैं, कि राजा कृष्णचन्द्रने गोपीनाथके लिये गवरनर-जनरल के पास नालिश की थी। उन्होंने ठाकुर वापस देनेके लिये राजा नवकृष्ण बहादुर से अनुरोध किया। पहले अग्रद्वीप पाटुलीके ज़मीन्दारों की सम्पत्ति था। पीछेको एक बार पांच-छ: यात्री वहांके मेले में मर गये। मुर्शिदाबाद के नवाबने इससे क्रुद्ध हो वहांके जमीन्दारों को शास्ति देनेका सङ्कल्प किया। इसी भयसे सब ज़मीन्दारोंके मुख़तारोंने कहा, कि अग्रद्वीप उनके प्रभुका न था। कृष्णनगर के मुख़तार सुयोग देख बोल उठे,—'धर्म्मावतार! यह सम्पत्ति हमारे प्रभुकी है। मेलेमें जैसा लोगोंका समागम होता, उससे और भी अनिष्ट होनेकी बात है। किन्तु हमारे प्रभुकी विशेष सतर्कतासे वैसा होने नहीं पाता।' नवाबने यह बात सुन दोषको क्षमा कर दिया और अग्रद्वीप अबाध-रूप से कृष्णनगरकी सम्पत्ति हो गया।

अग्रधान्य (सं॰ क्ली॰) १ धान्यविशेष, वह अन्न जो पहले उत‍्पन्न हो। २ बाजरा।
अग्रनख (सं॰ पु॰) अग्रो नखः, कर्मधा॰। नखाग्र, नाखूनका अगुआ।
अग्रनासिका (सं॰ स्त्री॰) अग्रा नासिका, कर्मधा॰। नासिकाका अग्रभाग, नाकका अगला हिस्सा।