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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१४२

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अग्रसन्ध्या— अग्रहार
अग्रसन्ध्या (सं० स्त्री०) सन्ध्यायाः अयं अथवा अग्रा सन्ध्या । १ सन्ध्याका पूर्वकाल । २ प्रातः सन्ध्या, सवेरा, तड़का ।
अग्रमर (सं० त्रि०) अग्र-सृ-ट, अग्रं अग्रेण अग्रे वा सरतीति । अग्रगामी, आगे चलने वाला । अग्रतःसर देखो ।
अग्रसानु (सुं० पु०) उभरी हुई भूमिका सम्मुखस्थ भाग ।
अग्रसारा (सं० स्त्री०) अग्रं शीर्षभागमात्रं सारोऽस्याः । १ फलशून्य शिखा, बिना मेवेकी चोटी । २ मंजरी, बाल ।
अग्रसेन (सं० पु०) जन्म जयके एक पुत्र ।
अग्रह (सं० पु० ) न-ग्रहः दारपरिग्रहः, नञ्-तत् । १ जिसने विवाह न किया हो । २ सन्यासी । ३ वानप्रस्थ ।
अग्रहर (सं० त्रि०) अग्रह अच् । अग्रदेय वस्तु, आगे दिये जाने काबिल चीज । अग्रभागहारी ।
अग्रहस्त (सं० पु० ) अग्रश्वासौ हस्तश्चति, कधा । गुणगुणिनोरभेदात् । १ हस्तका अग्रभाग, हथका अगला हिस्सा । २ हाथीको सूंड़वाली नोक ।

{{Outdent| अग्रहायण (सं० पु० ) हायनस्य वत्सरस्य अंग्र प्रथम मासः, अग्र-हा-ल्युट् हायन ।हश्वत्रौहिकालयोः । पा ३ । १।१४८ ।मार्गशीर्ष मास, मगसर, अगहन । पहले अग्रहायण माससे वत्सर आरम्भ और कार्तिक मास में समाप्त होता था । इसीलिये मार्गशीर्ष मासका नाम अग्रहायण पड़ा, अमरादि प्राचीन कोषमें यह बात स्पष्ट रूपसे निर्दिष्ट है। इसका कारण वर्तमान है, कि पहिले अग्रहायण माससे क्यों वत्सर - गणना की जाती यौ । मालूम होता है, कि वह कारण अमूलक नहीं । साधारण लोग चन्द्र, सूर्यको गति देख वत्सर-गणना कर न सकते थे। चन्द्रसूर्यको गति देख वत्सर- गणना करना एक कठिन कार्य है । इसलिये वह स्वभावका सामान्य लक्षण देख साधारण रौतिसे वत्सरको निर्णय करते रहे । 'अग्रहायण' – अर्थात् जिस समयमें श्रेष्ठ व्रीहि (अग्रः श्रेष्ठः हायनः व्रीहिः अस्मिन् काले) हो। इससे स्पष्ट समझा जाता है, कि सामान्य लोग व्रीहिको उत्पत्ति देख वत्सर गिनते थे । आजकलको तरह उस समय भी लोग

महाजनोंसे अन्न उधार लेकर खाते और पीछे अपने घरमें अन्न होनेसे उसे व्याजके साथ चुका देते रहे । महौना, सन् या तारीख बतानेसे अज्ञ लोग इसका कुछ भौ मतलब समझ न सकते, कि किस समय महाजन ऋण देते थे और किस समय वह ऋण परिशोध करना होता था । इसलिये स्वभावका एक-एक लक्षण दिखा महाजन उन्हें सब बातें बता देते थे । पाणिनिके कई एक सूत्रोंमें इस बातका प्रमाण मिलता है । जैसे – “देयमृणे” ४।३।४७ | "कलाम्यश्वत्ययवबुसादवुन् ।” ४ | ३ | ४८ ।

“ग्रीमावरसमाद्रुवुञ् ।” ४।३।४।

'यस्मिन् काले मयूराः कलापिनो भवन्ति स उपचारात् कलापी, तत्रः देयमृणं कलापकम्। यस्मिन्कालेऽश्वत्थाः फलन्ति तव देयमृणमश्वत्थकम् । यस्मिन् यववसमुत्पद्यते तत्र देयं यववसकम् । ग्रीष्मं देयमृणं ग्रे मकम् ।'

(भट्टोजि)

जिस समय मयूर पर फैलाकर नाचते हैं, उसी समय दिये जानेवाले ऋणका नाम कलापक है । अश्वत्थ वृक्ष फलनेके समय चुकाया जानेवाला ऋण अश्वत्थक होता है । जिस समय यवका शोष निकलता, उस समयके देय ऋणको यववसक कहते हैं। जो ऋण ग्रीष्मकालमें दिया जाता, वह ग्रेमक कहाता है। वर्षा से पहले दिया जानेवाला ऋण आवरसमक नामसे अभिहित है । स्वभाववाले एक-एक सहज लक्षण के साथ देय ऋणके इतने सम्पर्क रहनेका क्या प्रयोजन था ? यदि उधार लेनेवालोंको महीने, सन् और तारीख़से उस समय के निश्चित करने की क्षमता होती, कि वह किस समय ऋण लेते और कितने दिन पीछे उस ऋणको परिशोध करना होता, तो इतना मोटा हिसाब कभी न चलता ।

अग्रहायणेष्टि (सं० स्त्री०) अग्रहायणे विहिता इष्टि: । नवशस्यका यागविशेष, वह खास यज्ञ जो नये अनाज से किया जाता है ।
अग्रहार (सं० पु० ) अग्र- हृ-घञ् कर्मणि, अग्र-हृ-अण्- । १ ब्राह्मणको देनेके लिये क्षेत्रोत्पन्न शस्यादिका अग्र भाग, खेतमें पैदा हुए अनाजका वह पहला हिस्सा जो ब्राह्मणको देनेके लिये रखा जाये । स्नातकको देय