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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१४६

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अघोष — अङ्क

जिस तरह माला या अन्यान्य विशेष परिच्छद रखते हैं, अघोरियोंके पास उस तरह कुछ भी नहीं होता । धर्मकथा सुननेको इच्छा करनेसे यह कुछ भी नहीं कहते । बड़ोदा राज्य में अघोरेश्वर नामक इनका एक मठ था । अघोरखामी उसी स्थानमें वास करते थे । आजकल यह सम्पदाय क्रमशः निर्मूल होते चला जाता है । कहीं पर कभी-कभी अघोरपन्थी योगी इत- स्ततः घूमते-घामते देख पड़ते हैं ।

अघोरपन्थिकोंका मत नूतन नहीं । इसका प्रमाण भी मिलता है, कि अति प्राचीनकाल में यह सम्प्रदाय विद्यमान था । मार्कोपलो, प्लिनी, आरिष्टटल प्रभृति विदेशीय पण्डितोंने इसके विषयको कुछ-कुछ उल्लेख किया है। ईरान देशमें भी बहुत पुराने समय इसी प्रकार एक सम्प्रदाय के साधक वास करते थे । इसलिये अनुमान होता है, कि अघोरी शैव देश- विदेशमें विस्तीर्ण हो गये थे । कभी-कभी हिन्दुस्थान में स्थान-स्थान पर अघोरिनें दलबद्ध हो कर जाती हैं । इनके शिरपर जटा रहतौ, गलेमें नानाविध प्रस्तर और स्फटिककी माला झूमती, कमर पर घांघरा लटकता और किसी के हाथमें त्रिशूल दिखाई देता है । यह जनपद में महा उपद्रव मचाती हैं ।

अघोष (सं० पु०) नास्ति घोषोऽत्र । वर्णोच्चारणार्थ प्रयत्न- विशेष । तुल्यास्यप्रयत्र' सवर्णम् । पा १।१।९। ताल्वादिके समान स्थान और समान आभ्यन्तर प्रयत्नसे जो सकल वर्ण उच्चारित होंगे, उनको सवर्ण संज्ञा दी जायेगी। इसके बाद (प्रथवो द्विधाः) प्रयत्न दो प्रकार है, आभ्यन्तर और वाह्य । फिर आभ्यन्तर प्रयत्न पांच प्रकारका है- १ स्पष्ट, २ ईषत्स्पृष्ट, ३ ईषद्दिवृत, ४ विवृत, और ५ संवृत । वाह्यप्रयत्न ग्यारह प्रकारका होता है : जैसे ; १ विवार, २ संवार, ३ श्वास, ४ नाद, ५ घोष, ६ अघोष, ७ अल्पप्राण ८ महाप्राण, उदात्त, १० अनुदात्त और ११ स्वरित ।

“खयां यमाः खयः+क पौ विसर्गः शर एव च । एते श्वासानुप्रदाना श्रघोषा विवखते ।

तव वर्गाणां प्रथमद्दितीयाः खयस्तथा तेषामेव यमाः जिह्वामूलीयोपध्मानीयौ, "विसर्गः शषसायेत्यषां विवारश्वासोऽघोषश्च ।”

वर्गके प्रथम और द्वितीय वर्ण खय् ( कख, चछ, टठ, तथ, पफ) कहांते हैं । जिह्वामूलीय, उपमानीय, विसर्ग और शषस, यह सब यम हैं । यही समस्त वर्ण विवार, श्वास और अघोष बोले जाते हैं । जिह्वामूलीय और उपध्मानीय अ विसर्ग हैं। यह सकल उच्चारण किसीके मुखसे न सुनने पर ठीक बोधगम्य नहीं हो सकता ।

अघोघ(सं० पु० ) पापों का ढ़ेर, पापसमूह ।
अघौघमर्षण (सं० त्रि०) सम्पूर्ण पापनाशक, सब पाप दूर करनेवाला ।
अघ्नत् (सं० त्रि०) न मारनेवाला, चोट न पहुंचाने- वाला ।
अग्घा (सं० पु० ) हन्- यक् । अन्नप्रादयश्च । यगन्ता निपात्यन्ते । हन्तेर्थक् अडागम: उपधालोपश्च । उण ४।१११। १ प्रजापति, ब्रह्मा। २ वृषभ, बैल । (स्त्री०) ३ गो, गाय । ४ बादल, घटा। (त्रि०) ५ वधके अयोग्य, न मारने के काबिल ।
अघ्रान (सं० आघ्राण) अत्राण देखो।
अघानना (हिं० क्रि०) सूंघना, खुशबू लेना ।
अधेय (सं० त्रि०) न घ्रातुं अर्हः । दुर्गन्धिद्रव्य ।
सूंघनेके अयोग्य, बदबूदार । (क्लो०) मदिरा, शराब ।}}
अङ्क (सं० पु०) अङ्क-अच् । १ चिन्ह ; जैसे—पदाङ्क । मृगाङ्क । २ नाटकका एक परिच्छेद जिसमें यवनिका गिरादौ जाती है । ३ गोद । ४ समीप ;जैसे— “अङ्गका-

गत सत्ववृत्तिः । रघु २३८ । 'अङ्गः समीप उत्सङ्ग चित्रे स्थानापराधयोः

इति केशवः ।
५ स्थान । ६ अपराध । ७ पर्वत । ८ युद्धभूषण । ८ देह । १० एकसे नौ तक संख्या- १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ११ पाप । १२ दुःख । १३ वार । अङ्क शब्दका ही अपभ्रंश अंक है ।

यह आश्चर्यका विषय है, कि सभी सभ्य जातियों- मूल रूढ़ संख्या एकसे नौ तक ली है । शून्य (०) एक अलग अङ्क है ; वह कोई संख्या नहीं। एक-एक शून्यको सहायतासे सभी एक, दो अङ्गोंको दशगुण संख्या बढ़ाते हैं। इसका ठीक-ठीक कारण समझमें नहीं आता, कि यह प्रथा सब देशों में क्यों प्रचलित हुई । पाश्चात्य पण्डित अनुमान करते हैं, कि मनुष्य असभ्य