|
अवस्था में गिनना नहीं जानता ; इस लिये वह हाथकी उंगलियों पर द्रव्यादिको संख्या निर्दिष्टकर रखता था। दोनो हाथमें दश उंगलियां हैं । एकसे गिनना आरम्भ करने पर बाकौ नौ बचती हैं। यह नौ उंगलियां पूर्वकालवाले लोगोंके संख्या गिननेका उपाय थीं, जिससे रूढ़ अङ्गको संख्या केवल नौ रखी गई । पाश्चात्य लोग कहते हैं, कि इसी कारणसे नौ रूढ़ अङ्गका नाम “डिजिट” अर्थात् उंगली पड़ा है। हाथ की उंगलियों से गिनने पर पैरको उंगलियोंसे सहारा क्यों न लिया जाता था ? यदि उंगलियां ही पूर्वकालवाले मनुष्योंके संख्यानिर्द्धारण करनेका प्रधान सहारा होतीं, तो वह अधिक संख्या ठीक करते समय पैर की उंगलियों से अवश्य काम लेते । इस तरह अङ्कको संख्या भी नौसे कहीं अधिक हो जाती । इस लिये मालूम होता, कि रूढ़ अङ्क एकसे नौ तक होनेका कोई अन्य कारण है । अमेरिकाकी असभ्य जाति पांचसे अधिक नहीं गिन सकती । अधिक संख्या यदि किसीको बताना पड़ती, तो वह वृक्ष के पत्ते दिखा देता है। अशिक्षित हबशियोंकी भी यही दशा है । वह भी अधिक स ंख्या बतानेके लिये मरुभूमिको एक मुठ्ठी बालू उठा कर दिखा देते हैं । भारतवर्ष के अज्ञ पुरुष डोरी- में गांठ दे, किवाड़ या खम्भेमें चूनेका टीका लगा और बांसके डण्ड में निशान बना संख्या ठीक करते हैं । सन्थाल जिस समय दूध-घी बेचनेके लिये निकलते, उस समय थोड़ी रस्सी और एक चोंगा रखते और उस चोंगेसे घी नापते और रस्मीमें गांठ देते जाते हैं । यही रस्मो उनके हिसाबका खाता - पत्र है । इसके अतिरिक्त दूसरे लोग जो हिसाब करना नहीं जानते और गृहस्थोंके घरमें द्रव्य-सामग्री पहुँचाते, वह किवाड़ तथा खम्भे पर चूनेको टोप लगा देते हैं । इससे उनका पूरा-पूरा हिसाब हो जाता है । वङ्गदेशके अशिक्षित पुरुष जब किसी दुकानदार से कुछ उधार लेने जाते, तो बांसकी एक पतली शाखा ले लेते हैं। दुकानदार उन्हें उधार दे और ३६ |
उस बांसको दो भाग कर आधा अपने पास रखता और आधा खरीदारको दे देता, जिसपर उधारका हिसाब आंकसे लिख दिया जाता है। मालूम होता, कि इस तरह आंक अर्थात् चिह्न बनानेकी प्रथा बहुत कालसे भारतवर्ष में प्रचलित है । अब ध्यान देनेकी बात है, कि पहले गणित- शास्त्रकी उत्पत्ति किस देशमें हुई और रूढ़ अङ्गको संख्या नौ तक हो क्यों निर्द्धारित रहो । “आबू जाफ़र मुहम्मद वेन् मूसा अल खारिमि" नामक गणितको पुस्तक भारतवर्षीय गणित शास्त्रका अनुवाद है । अरबनिवासी स्पष्ट ही स्वीकार करते हैं, कि इस मूल पुस्तकके लेखक ब्राह्मण थे । सन् ई० के ७ वें शताब्द में यह अनुवाद पहले बगदाद नगर में प्रकाशित हुआ था। कुछ दिन बाद लैटिन भाषामें भी इसका अनुवाद किया गया । युइपिक्ने अनुमान किया है, कि दो प्रशस्त उपाय द्वारा गणित शास्त्र भारतवर्ष से अरब आदि देश में पहुंचा होगा । सन ई० के ३ रे शताब्दी में मिश्र देशके बणिक् व्यापारको सुविधाके लिये भारतवर्षसे अङ्गविद्या अलेक्जेंड्रिया नगरौको ले गये थे। इसके अतिरिक्त प्लाटिनस्, ब्यू मारिनो आदि विद्दानों- ने उज्जैनके व्यापारियोंसे अङ्कशास्त्र सौखा था । अन्तमें मिश्रवासियोंके पास यहूदियों और रोमके अधिवासि योंने गणित विद्या सोखी। इससे समझा जा सकता है, कि गणित शास्त्रको सृष्टि पहले भारतवर्ष में हो हुई थी। पूर्वकालके ब्राह्मण अङ्गविद्याके गुरु थे । अरबी, मिश्री, यहूदी और रूमी उन्हीं गुरुके शिष्य हैं । हमें विश्वास है, कि इस देश में १, २, ३ इत्यादि साङ्केतिक चिह्न द्वारा अङ्गपात न किया जाता था । उस समय वर्णमालाके क, ख आदि किसी विशेष - विशेष वर्ण से संख्या लिखी जाती थी । यह निश्चित कर सकनेसे कि, यह अनुमान सत्य है या नहीं, यह भी निश्चित किया जा सकेगा, कि रूढ़ अङ्ग नौ ही क्यों हुए । यहूदी और रूमी, ब्राह्मणोंके शिष्य हैं । उन्होंने आर्य जातिसे गणित शास्त्र पढ़ा था। शिष्यका काम देख कर यह बात भी समझी जा सकती, कि गुरुने उन्हें |
पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१४७
दिखावट
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१४१
अङ्गका