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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१४८

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अङ्क



किस प्रकार पाठ पढ़ाया है । प्राचीन यहूदी - वर्णमाला - के पहले नौ अक्षर अर्थात् अलिफ, बेत्, गिमेल, दा- लेख्, हे, वाउ, जैन्, चेत् और टेत् द्वारा एकसे नौ संख्या तक लिखते थे । उनके परवर्ती दूसरे नौ वर्ण द्वारा दशसे नव्वे तक लिख लेते रहे । वर्णमाला के अन्तिम चार वर्णसे यथाक्रममें एक सौसे ले चार सौ तक लिखा जाता था । यूनानी भी यहूदियोंकी तरह अलिफ, वे प्रभृति वर्णमालाके वर्ण द्वारा १, २ इत्यादि अङ्क लिखते थे । यूनानी भाषाका दश (D) अर्थात् डेका या दशके आद्यतरसे लिखा जाता था । रूमौ एक लिखनेको एक खड़ी लकीर (I) और दो लिखनेको दो खड़ी लकीरें (II) इत्यादि बना देते थे । दश लिखनेके लिये (X) अंगरेजो एक्सके समान वह एक चिह्न बनाते थे । इसी तरह दो एक्ससे बोस और तोनसे तीस इत्यादि अङ्क लिखते थे । (C) चिह्नसे १०० लिखा जाता था । (M) चिह्न सहस्र संख्याका बोधक था ।

ऊपर लिखे हुए प्रमाणसे समझा गया, कि प्राचीन यहदी, यूनानी और रूमी १, २, ३, इत्यादि साङ्केतिक चिह्न द्वारा अपात न करते और संख्या लिखनेके अक्षर केवल नौ ही न थे 1 वह बड़ी-बड़ी राशि लिखनेके लिये वर्णमाला के कई वर्णका प्रयोग करते थे ।

भारतवर्ष के ब्राह्मण इन सब जातियोंको अङ्ग विद्या- के गुरु हैं, फिर भी उस समय के ब्राह्मण क्या करते ? इस देशमें अच्छा इतिहास नहीं, इसीसे कठिन विषयकी मीमांसा दुर्घट हो जाती है। किन्तु इस समय भी पुराना आचार-व्यवहार जो कुछ विद्यमान है— उसीसे हमारा यह उद्देश्य सिद्ध हो जायेगा। बोध होता है, कि पहले ब्राह्मण भी वर्णमालाके वर्णविशेषसे १, २ इत्यादि अङ्ग लिखते थे। क्योंकि, पञ्जाबके उत्तर टाकरी भाषा में अब भी एक, दो तोन, इत्यादि संख्याबोधक शब्द के आद्यक्षर द्वारा (ए, दि, त्रि इत्यादि ) १, २, ३, प्रभृति अङ्क लिखे जाते हैं। अनुमान यही है, कि वहां रहनेवालोंने आज तक अपनी प्राचीन पद्धति नहीं

छोड़ी। इस समय वह जिस प्रथासे अङ्क लिखते हैं, इसमें सन्देह नहीं, कि वह, आर्य जातिकी पुरानी प्रथा है ।

संस्कृत भाषाकी संख्याको विवेचना कर देखनेसे जाना जा सकता है, कि आर्योंके गणित - विद्या भली भांति सोख लेने पर दशमिक अङ्गपात पद्धतिको सृष्टि हुई थी। नौ तक रूढ़ संख्याको लेकर पीछे केवल एक-एक शून्यके सहारे उत्तरोत्तर दशगुणके हिसाब से संख्या बढ़ाना मूढ़ मनुष्योंको बुद्धिमें नहीं आ सकता ; क्योंकि, अङ्कपातमें सङ्कलन, व्यवकलन और गुणका नियम है । पञ्चदश कहनेसे दश और पांच (१० + ५) समझा जाता है । इसलिये इसमें सङ्कलन द्वारा यह राशि लिखी गई । एकोनविंशति कहने से (२० - १) बोस से एक कम होता है। इसलिये इसमें व्यवकलन हुआ । त्रिंशत् कहनेसे ( १०×३ ) तौन गुणित दश मानते हैं; अतः यहां गुणनका नियम काममें लाया गया । ऋग्वेद संसारके सभी ग्रन्थोंसे प्राचीन है । उसी ऋग्वदमें लिखा है, -

“त्वमेताञ्जनराज्ञो हिर्दशा बन्धुना सुश्रवसोपजग्मुषः ।
सृष्टि सहस्रा नवतिं नवश्रु तो नि चक्रेण रथ्या दुष्यदाहणक् ।"

१।५३।९।

हे इन्द्र ! आपने लोकविश्रुत, सहायरहित होकर राजा सुश्रवासे आक्रान्त बीस संख्यक (विदेश) जनपदके अधिपतियों और उनके साठ हजार निन्यानवे (६००००+९0+९) अनुचरोंको अपने शत्रुनाशक अस्त्र द्वारा विनष्ट किया था। यहां दिर्दशमें (२ × १०) गुणक्रिया और साठ हज़ार + नव्वे + नौ — इसमें सङ्क- लनका नियम चला। इसीसे यह मानना पड़ा, कि आर्य दशमिक पद्धतिको सृष्टि करनेसे पहले जोड़, बाक़ी और पूरण करना जानते थे ।

यह प्रतिपन्न कर दिया गया, कि यहदौ, रूमी, यूनानी तथा आर्य वर्णमालाके वर्ण द्वारा एक, दो, आदि अङ्ग लिखते थे । किन्तु इस नियम में कितनी अड़चन है, किसो बड़ी संख्याको लिखनेके लिये एक साथ कितने ही वर्ण लिखना पड़ते हैं । मालूम होता है—इसीसे आर्योंने विचारा, कि जैसे वर्णकी