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अङ्गलोड्य (स ं० पु० ) अङ्क - लोड- ण्यत् । एक प्रकारका लता । चिचोड़। अङ्क्लोप (सं० पु० ) अङ्गस्य लोपः ६-तत् । अङ्गका वियोग-साधन, बाक़ी निकालना, घटाना । अङ्गस् (सं० क्लो०) अञ्चि-असुन् । अञ्चाञ्जियुजिवजिभ्यः कुश्च । उण ४।२१५ । १ चिह्न, निशान । २ शरीर, जिस्म । अङ्गस (सं० क्लो०) अङ्गस्-अच् अस्त्यर्थे । चिह्नयुक्त, निशानवाला । वह पदार्थ जिसमें चिह्न लगा हो । अङ्कविद्या (सं० स्त्री०) अङ्गका हिसाब, इल्म हिन्दसा । अङ्काङ्क (सं० क्लो०) 'अङ्के' मध्ये अङ्काः शतपवादिचिज्ञानि यस्य । आपो वै अङ्काङ्गाः छन्दः।' (वाजसं महीधरः १५।५ ।)जल, पानी, आब । अङ्गावतार (सं० पु० ) नाटकका कोई अङ्क शेष हो जाने पर आगामी अभिनयका पात्रों द्वारा आभास । अङ्गिका (सं० स्त्री०) १ चिह्न लगानेवाली । २ हिसाब करनेवाली । ३ गिननेवाली । अङ्कित (सं० त्रि०) अङ्क-क्त । १ चिह्नित, निशान लगा । २ लिखित । ३ वर्णित । अङ्किन् (सं० त्रि०) अङ्ग इनि, असे क्रोड़े विद्यते वाद्यकाले । मृदङ्ग आदि जिन बाजोंको गोदमें रखकर बजाना पड़ता है । गोदमें रखकर बजाये जानेवाले । (ऋक् ३।४५।४) अङ्गिनी (सं० स्त्री०) अङ्ग - इनि स्त्रियां ङीप्, अङ्गानां चिह्नानां समूहः । खलादिभ्यः इनिवक्तव्यः । काव्या० वा० । १ अङ्गसमूह। अङ्क-इनि अस्त्यर्थं ङीप् । २ अङ्कविशिष्टा । अङ्किल (हि० पु०) वह बछड़ा जिसे वृषोत्सर्गमें दाग कर छोड़ देते हैं । दागा हुआ बछड़ा या साँड़ । अङ्कुर, अङ्कर (सं० पु०) अङ्क-उरच् । मन्दिवाशिमथिचतिचाङ्घिभ्य उर। उण ११३८ । १ वोजसे उत्पन्न नया पौधा, अंखुआ, कनखा । २ नोक । ३ रक्त, खून । ४ जल । ५ लोम, रूयां । स्त्रियां जिस समय प्रथम गर्भवती होती हैं, उस समय गर्भके भीतर सन्तानकी कोई अवयव - आकृति नहीं रहती, केवल रक्त और शुक्र मिला हुआ कुछ लारसा पदार्थ गर्भ-स्थान में एकत्र होता है। धीरे-धीरे परिपक्क होने पर उसी शोणित- ३७
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शुक्र से फिर हाथ, पैर, आंख, मुंह, नाक, कान सब उत्पन्न होते हैं। अङ्कर भी ठीक ऐसा ही है। जब तक अङ्कुर वीजके भीतर रहता, तब तक उसमें वृक्षका कोई अवयव स्पष्ट दिखाई नहीं देता ; तथापि जड़, तना, शाखा, पल्लव सब कुछ होता है। महीमें वीज गाड़ने से पौधा फूटता और पत्ते` भरने पर धीरे- धौरे पेड़ बन जाता है। पक्षियोंके अण्डोंकी भी यही दशा है । अण्डे के भीतरका पीला पदार्थ ही बच्चा है । ताव देते-देते अण्डा पुष्ट हो जाने पर उसी पीले पदार्थसे बच्चा उत्पन्न होता है । परन्तु यदि पक्षीके अण्डा होते ही वह जल्द-जल्द तोड़ डाला जाये तो केवल लार जैसा पदार्थ निकल पड़ता है। उसमें बाजू, चोंच, पैर आदि पक्षी जैसा कुछ दिखाई नहीं देता । अतएव मनुष्य के गर्भका शोणित- शुक्रमय भ्वण, अण्डेका पोला पदार्थ और वीजका अङ्कुर - यह तीनो एक ही प्रकारके पदार्थ हैं । भीजे हुए चनेके ऊपरका छिलका निकाल डालने से दाल निकल पड़ती है। आधी-आधी दो टुकड़ोंमें वह दाल एक नहीं होती, एक साथ मिली रहती है। नख द्वारा सावधान से चीरने पर एक ओरका जोड़ खुल जाता, परन्तु दूसरी ओर पतले सूतको तरह एक डण्ठलमें दो दाल चिपकी रहती हैं, जो बिना खींचे नहीं छूटतीं । वृादिका जीवन इसी डण्ठल में होता है। उद्भिद् शास्त्रके पण्डित इसी पदार्थको अङ्कुर कहते हैं । वीजके ऊपरी भाग में जो छिपाने वाली झिल्ली होती है, उसे छाल कहते हैं । अंगरेजीमें उसका नाम इण्टे गूमेण्ट (Integument) है। अङ्कुरके दोनो भागोंको अंखुआ ( Cotyledons) कहते हैं । मट्टी फोड़ कर पेड़ कुछ बड़ा होनेसे अंखुआ गिर पड़ता है । सब वृक्षोंके अंखुत्रोंको संख्या समान नहीं होती। किसी-किसी वृक्ष के अङ्कुर में एक हो पत्ता रहता है, जिसे एकपर्णिक (Monocotyledon) कहते हैं । जैसे, नारियल, ताल इत्यादि । कितने ही पौधोंके अङ्कुरमें दो पत्ते रहते, उन्हें द्दिपर्णिक (Dicotyledon) कहते हैं । जैसे, कुम्हड़ा, कह इत्यादि । फिर किसी-किसी पेड़के वीजमें चार-पांचसे |
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अङ्कलोड्य- अङ्कुर