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भी अधिक पत्ते रहते हैं । डण्ठलकी पतली ओर जड़ लगती और मोटी ओर वृक्षका तना, लता और गुल्मादिका डण्ठल होता है ; वीजसे अङ्कुर निकलनेको अङ्कुर फूटना, अंखुत्रा निकलना, अंखुचना आदि कहते हैं । वीजमें किस तरह अङ्कुर निकलता और पेड़ोंमें जीवन कहांसे आता है - इसका पूरा विवरण जीवगर्भाधान (Fertilization) शब्द में देखो । वृक्षोंका जीवन अङ्कुरमें ही रहता है। उपयुक्त स्थानमें प्रयोजनके अनुसार ताप और जल, वायु तथा धूप पहुंचनेसे ही अङ्कुर धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। उसके बढ़ते हो किल्ला फूटता है । अङ्कुर फूटने के लिये ईश्वरने कैसे सामान कर रखे हैं! पहले मट्टीके रसमें भोजकर वीजका छिलका कोमल होता, इधर भीतरका सूतसा अंश भी कुछ फूल उठता ; उस समय सहजमें ही झिल्ली फट जाती और अंखुना निकल पड़ता है। पहले अङ्करसे जड़ निकलती और मट्टोको भेद नीचे जातो, इसके बाद डण्ठल और अंखु बाहर निकलता है । इसीको हम लोग `अङ्गुरोत्पत्ति कहते हैं । यहां नये अङ्कुरको एक प्रतिमूर्ति दी गई है। (₹) कृषकोंको यह सब बात समझ लेना चाहिये, कि वीजसे जब तक वृक्ष नहीं उत्पन्न होता, तब तक अङ्कुर- के जीवनको किस तरह रक्षा होतो, कितने दिनमें वीज पुराना होकर नष्ट हो जाता और उससे फिर वृक्ष क्यों नहीं होता। अण्डपर झिल्ली रहती है, इससे वह जल्द नष्ट नहीं होता। चौटी आदि कौड़े भी इच्छा करनेसे उसे खा नहीं सकते । वौजके ऊपर भी छिलका रहता है, इससे भीतरका पदार्थ सहसा नष्ट नहीं होता, उसे जल्द कोड़े भी काट नहीं सकते। किसी-किसी वीजमें छिलका नहीं रहता । उसको रक्षाका विधाताने दूसरा ही उपाय कर दिया है। बीज देखो। है। (बा) डण्ठल और तना जड़ मिट्टीके भीतर चली गई फैल उठा है। (य-ब)दীनী पत्ते अरमें लगे हैं। |
वीज सुखा कर रखनेसे उसके भीतर अङ्कुर नहीं जमता । इस अवस्थामें वृक्षका जीवन ठीक जड़ पदार्थ - के समान ( Dormant state) होता है 1 धान इत्यादि कितने ही शस्य एक वर्षमें ही पुराने हो जाते हैं, बोनेपर किल्ला भलो भांति नहीं फूटता। दो सौ पुराना गेह' खाया जा सकता है, परन्तु सात वर्ष से अधिक पुराना होने पर उस गेहंसे वृक्ष नहीं लगता । इमली सेम, मटर प्रभृति जिन वृक्षों में फलियां लगती हैं (Leguminous plants ), साठ वर्ष बाद बोनेपर भी उनके वौजसे अङ्कर उत्पन्न होता है । राई एक सौ चालीस वर्ष तक रखनेसे भो नष्ट नहीं होतो, खेतमें बोनेसे उसमें अच्छा अङ्कुर फूटता है । तोन सौ वर्षके पुरानो भुट्ट से अङ्कुर निकल सकता है । सृष्ट जन्मके तीन सौ वर्ष बाद कुस्तुन्तुनियामें जो सब समाधि दिये गये थे, उनमें कितने हो प्रकारके वीज मिले । कितने ही युग बीत जाने पर भो वह वीज नष्ट न हुए, बोये जाने पर उनसे अङ्कुर फूटा । इन सब बातों पर ध्यान देनेसे यह निश्चित हुआ, कि उद्भिट्का वोज कितने दिनमें नष्ट हो जाता और फिर उससे वृक्ष नहीं होता । कितनों ही को विश्वास है, कि पुराने वीजके पेड़में पत्ते कम होते, परन्तु उनमें फल लगते हैं । नये अङ्कुरके प्राणधारणका उपाय ठोक जन्तुओंके समान है। गर्भमें जिस समय सन्तान रहती है, उस समय वह जड़वत् मांसपिण्डके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं। सिवा इसके गर्भ में दूध से भरा स्तन नहीं, जिससे उदरपोषण हो सके। फिर उसे क्या खानेको मिलता है ? सब जानते हैं, कि सबके बाद फूल (Placenta) झरता है । इसके बाद लड़केका नारा चौरना पड़ता है। यह फूल और नारा ही लड़कोंको जीवनरक्षाका प्रधान उपाय है। जिस तरह नाली बनाकर एक तालावका जल दूसरी जगह पहुंचाया जाता है, फूल और नारेका काम भी ठीक उसी प्रकारका है। प्रसूतिके शरोरका सत्त्व नाड़ी द्वारा सन्तानके शरीर में आता है । उसीसे वह हृष्ट- - पुष्ट होती है। इससे प्रसवके बाद शिशुका शरीर |