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चीज़ ढांकनेसे काजल पड़ता, जो सभी कार्बोन है। लकड़ीका कोयला जलमें डालनेसे तैरता है। यह देखनेसे सहसा मालूम होता, कि लकड़ीका कोयला जलसे हलका है ; परन्तु वह वास्तविक हलका नहीं होता। कोयलेमें छोटे-छोटे छिद्र होते, जिनमें हवा पहुंचा करती है। जलसे हवा हलकी है। हलके पदार्थका स्वाभाविक गुण यही है, कि वह जलपर तैरा करता, और भारी पदार्थ उसमें डूब जाता है। पूरी सांस चढ़ाकर जलमें गोता मारनेसे शरीर जलके ऊपर उठकर तैरने लगता है। एक छोटा छिद्र रहनेसे सूई जलपर तैरती है। परन्तु यदि कोयलेको चूरकर जलमें डाल दिया जाये, तो सब छिद्र नष्ट हो जानेके कारण वह जलमें डूब जायेगा। छोटे-छोटे छिद्र रहनेके कारण कोयला मनुष्यके बहुत काम आता है। भेंड़ और बैलकी हडडीके कोयलेसे चीनी और नमक आदि कितनी ही चीजें साफ़ की जाती हैं। कोयलेका टुकड़ा जितना बड़ा होता, उसमें ठीक उससे ९० गुण आयतनका ऐमोनिया बाष्प और ९ गुण आयतनका अक्षिजेन सोखता है ; इसलिये रोगी मनुष्यके घर अथवा दुर्गन्ध स्थानमें रखनेसे वायुका दोष नष्ट हो जाता है। लकड़ी जलानेसे पत्थरका कोयला नहीं बनता। इसकी उत्पत्ति अन्य प्रकार है। बड़े-बड़े जङ्गलोंपर मट्टी पड़े कितने ही युग बीत गये। धीरे-धीरे भीज, तापसे सिद्ध हो वही सब वृक्ष आज पत्थरका कोयला बन गये हैं। कोयलेका गुण यही है, कि यथेष्ट अक्षिजेन पानसे जलनेके समय वह अपने आकारके ठीक दूने अक्षिजनमें मिल जाता है। अर्थात् अङ्गारका एक परमाणु अक्षिजेनके दो परमाणुओंमें मिलता है। अधिक अक्षिजेन पानेसे उसके साथ कभी नहीं मिलता। अङ्गार और अक्षिजेनके एकत्र मिलनेसे दो प्रकारके यौगिक पदार्थ उत्पन्न होते हैं। इनमें एकका नाम अङ्गारक बाष्प (Carbon monoxide or Carbonic oxide gas)
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और दूसरेका नाम अङ्गाराम्ल (Carbon dioxide or Carbonic acid) है। अङ्गार जलनेके समय अक्षिजेनके न्यूनाधिक्यसे यही दोनो यौगिक पदार्थ उत्पन्न होते हैं। अङ्गारसे इसके ठीक परिमाणके अनुसार अक्षिजेन मिलने पर अङ्गारक बाष्प निकलती है। फिर यदि ठीक इससे दूना अक्षिजेन मिल गया, तो अङ्गाराम्ब उत्पन्न होता है। इस लिये अङ्गारक-बाष्पका साङ्केतिक चिन्ह—१ समान कार्बोन+१ समान अक्षिज़ेन या "काअ" (CO); एवं अङ्गाराम्लका साङ्केतिक चिन्ह—१ एक भाग कार्बोन+२ दो भाग अक्षिजेन या "काअ" (CO²) है।
लोहेके चूल्हेमें पत्थरका कोयला जलाने पर नीचेसे हवा प्रवेश करती है। हवामें प्रचुर अक्षिजेन है; सुतरां अङ्गारके साथ यथेष्ट अक्षिजेन मिल जाता है। इसीसे अङ्गाराम्ल-बाष्प उत्पन्न होती है। इसके बाद, यह भाफ़ आगके भीतरसे ऊपरकी ओर उठती है। आगके भीतर हवा अच्छी तरह नहीं रह सकती, इसीसे वहां यथेष्ट-अक्षिजेन भी नहीं होता है। नीचेकी अङ्गारक भाफ़ ऊपर उठनेसे आगके भीतरके अङ्गार उसी बाष्पका अल्प-अल्प अक्षिजेन खींचा करते हैं। इसीसे अङ्गारक-बाष्प उत्पन्न होती है। आगके भीतर जो नीली शिखा देख पड़ती, वही अङ्गारक-बाष्पकी शिखा है। अन्तमे अङ्गारक-बाष्य आगके ऊपर आनेसे चारो ओर हवा लगती है; इसलिये फिर वहां अक्षिजेनका अभाव नहीं रहता। वही अङ्गारक बाष्प फिर अङ्गाराम्ल होकर उड़ जाती है। रासायनिक पण्डित किसी विषयकी परीक्षाके लिये अक्षालिक् अम्ल (Oxalic acid) और गन्धक-द्रावकसे अङ्गारक बाष्प तय्यार करते हैं। परन्तु जगत्में अङ्गाराम्ल बाष्पका अभाव नहीं। वायुके २५०० ढाई हज़ार भागका एक भाग अङ्गाराम्ल है। पण्डितोंने निश्चित किया है, कि पृव्थीके समुदय वायुमें ८१,००,००,००,००,००,०० मन अङ्गाराम्ल है। केवल लकड़ीका कोयला आदि जलनेसे ही अङ्गाराम्ब नहीं उत्पन्न होता, सब जन्तुओंके |
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