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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/१७४

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अङ्गारपाचित—अङ्गिरस्

गन्धर्वका प्राण बचा दिया। इसी दिनसे चित्ररथके साथ पाण्डवोंकी मित्रता हो गई। गन्धर्वराजने अर्जुनको दिव्य घोटक और चाक्षुसी विद्या प्रदान की। (महाभारत, आदिपर्व, १७० अध्याय।)

अङ्गारपाचित—अङ्गारपरिपाचित देखो।
अङ्गारपाची (सं॰ स्त्री॰) अङ्गारस्य पात्री, ६-तत्। अङ्गार रखनेका आधार। अंगीठी, बरोसी, आतिशदान।
अङ्गारपुष्प (सं॰ पु॰) अङ्गारमिव रक्तवर्ण पुष्पं यस्य बहुव्री॰। इङ्गदीवृक्ष, हिंगोटका पेड़। काल-दुपहरी।
अङ्गारमञ्जी (सं॰ स्त्री॰) अङ्गारा रक्तवर्णा मञ्जी यस्याः, बहुव्री॰। करोंदा।
अङ्गारमञ्जरी (सं॰ स्त्री॰) अङ्गारा रक्तवर्णा मञ्जरी यस्याः, बहुव्री॰। करोंदा।
अङ्गारमणि—अङ्गारकमणि देखो।
अङ्गारमती (सं॰ स्त्री॰) राजा कर्णकी पत्नी।
अङ्गारवल्लरी (सं॰ स्त्री॰) एक प्रकारका करोंदा। गुञ्जा, घंघची। चिरमटी।
अङ्गारवल्लिका (सं॰ स्त्री॰) अङ्गारा रक्तवर्णा वल्ली, स्वार्थे कन्। कर्म्मधा॰। १ गुञ्जलता, घुंघची। २ करोंदा।
अङ्गारवेणु (सं॰ पु॰) अङ्गारवर्णः वेणुः। अनुशतिका-दीनाञ्च। पा ७।३।२०। रक्तवर्ण बांस।
अङ्गारशकटी (सं॰ स्त्री॰) शकटी अल्पार्थे ङीप्। १ शकटिका, छोटी गाड़ी। (पु॰-क्ली॰) अङ्गारस्य शकटी, ६-तत्। २ अङ्गारशकट, आगकी गाड़ी। ३ अङ्गार रखनेका क्षुद्र आधार, आग जलाने की छोटी अंगीठी।
अङ्गारावक्षेपण (सं॰ क्ली॰) अङ्गार-अब-क्षिप-ल्युट् करणे। अङ्गारमवक्षिप्यते अनेनेति। १ यद्वारा अङ्गारको अवक्षेपण किया जाये, जिससे अंगार फेंका जाये। निक्षेप करनेका पात्र। अङ्गारस्य अवक्षे-पणम्, ६-तत् ; भावे ल्युट्। २ अङ्गारक्षेपण, अंगारका फेंकना।
अङ्गारि (सं॰ स्त्री॰) अङ्गार-ठन् मत्वर्थे। पृषोदरादित्वात्

कलोपः। अङ्गार रखनेका आधार, आग जलानेका बरतन। बरोसी, अंगोठी, आतिशदान।
अङ्गारिका (सं॰ स्त्री॰) अङ्गार-ठन्, स्त्रीत्वात् टाप्। १ बरोसी। २ इक्षुकाण्ड।
अङ्गारिणी (सं॰ स्त्री॰) अङ्गार-इन्, स्त्रीत्वात् ङीप्। आग रखनेकी बरोसी।
अङ्गारित (सं॰ क्ली॰) अङ्गार-इतच्। तदस्व सञ्जातं तारकादिभ्य इतच्। पा ५।२।३६। अङ्गारमिव रक्तवर्णं सञ्जातमस्य। १ पलाशकलिका, टेसूकी कली। (त्रि॰) २ दग्ध- प्राय काष्ठ, जली-भुनी लकड़ी।
अङ्गारिन्—अङ्गारि देखो।
अङ्गारोय (सं॰ त्रि॰) अङ्गार प्रकृतिरूपार्थे छ। अङ्गारभ्य एतानि। दग्ध काष्ठ, जली हुई लकड़ी।
अङ्गिका (सं॰ स्त्री॰) अङ्ग-इन्-कन् स्वार्थे, स्त्रीत्वात् टाप्। अङ्गमावृणोति। १ कञ्चुक, चोली। २ अंगिया, कुरतौ।
अङ्गिन् (सं॰ त्रि॰) अङ्ग-इन् अस्त्यर्थें। शरीरी, अङ्गविशिष्ट, अङ्गवाला, जिसके अज़ा हों।
अङ्गिरस् (सं॰ पु॰) अगि-गतौ अस्-इरुट्। अङ्गिराः। उण्। ४।२३५। ब्रह्माके द्वितीय पुत्र। ब्रह्माके दूसरे लड़के। इनकी भार्याका नाम शुभा था। वृहस्पति अङ्गिराके पुत्र थे। भानुमती प्रथम, राका द्वितीय, सिनिवाली तृतीय, अर्चिष्मती चतुर्थ, हविष्मती पञ्चम और पुण्य-जनिका इनकी षष्ठ कन्या थीं।

महाभारतमें लिखा है, कि महर्षि अङ्गिराने एकबार कठोर तपस्याको आरम्भ किया था। तपोबलके कारण उनके शरीरकी प्रभासे जगत् ढंक गया। उसी समय अग्नि भी तपस्या करते थे। उन्होंने सोचा,—'तपस्यामें रहनेसे हमारा तेज नष्ट हो गया है। मालूम होता है, कि इसी कारण ब्रह्माने अन्य अग्निकी सृष्टि की होगी।' इसके बाद अग्निने देखा, कि अङ्गिरा हुताशन-सदृश बन जगत्को ताप दे रहे थे। तब अङ्गिराने अग्निको देखकर कहा,—'आप शीघ्र अग्नि बन अपने अधिकारको ग्रहण कीजिये। मैं आपका पुत्र हूंगा।' इसी प्रार्थनानुसार अग्निने अपना