|
इससे उपकार न होनेपर वेदना स्थानमें पुनः पुनः जल डाले और घी मिला अलसीका पुलटिस बांधे । पूय सञ्चित न होनेसे भी अङ्गुलिका सिरा अधिक सूज जानेपर वेदना स्थलमें नश्तर लगाना कर्तव्य है । नश्तर लगाते समय विशेष सतर्क रहे । अङ्गलिके दोनो पार्श्व में नाड़ी हैं, अतएव यह सकल नाड़ी बचा पर्व के मध्यस्थलमें चोर और कदाच पर्व के जोड़पर अस्त्राघात न करे। नश्तर लग जानेसे प्रत्यह दो-तीन बार अलसीका पुलटिस बांधे और सेवनके लिये सिलिकाको व्यवस्था चलाये । एलोपेथी - अङ्गुलिमें प्रयोग करनेको ऊपर जिस प्रकार व्यवस्था लिखो गई, तदनुरूप कार्य करना चाहिये । अङ्गुलिमें सड़ा घाव हो जानेपर भीतरसे सड़ी हड्डौ निकाल डाले । पोछे प्रतिदिन १ भाग कार्बोलिक एसिड और १६ भाग पानी एकत्र मिश्रित कर क्षतस्थान धोये और बोरासिक मरहम लगाये। लौह (५ विन्दु टिङ्कचर ष्टोल, आध छटाक पानी ), काडलिवर आयल, कुनैन, बार्क और एमो - निया - इन सकल द्रव्यको सेवन करना चाहिये । सांसारिक कार्य करनेमें अङ्गुलि हो प्रधान इन्द्रिय है। इसीसे सचराचर अङ्गुलि कट जाती; चाकू, हंसिया, गडांस, कुल्हाड़ी और कलसे अङ्गुलिमें कई तरह चोट पहुंचती है। कटी अङ्गुलिसे अत्यन्त रक्त गिरनेपर तत्क्षणात् भोजा कपड़ा उसपर कसकर बांध दे और हाथ ऊपरको उठाये रहे। चतस्थान में आप हो फाइब्रिन (fibrin) जमकर रक्त बन्द कर देता है । अतएव पहले कटे हुए स्थानमें पानी न डाले ; पानी डालनेसे रक्त नहीं जमने पाता। पनियाले, और अकोड़ेका भी पत्ता रक्त बन्द करनेको उत्कृष्ट औषध है । कालकासुन्दे या पनियालेका पत्ता हुक्क के पानी में बांटकर कटे हुए स्थानपर लगाने से तत्क्षणात् रक्त बन्द हो जाता है । फिटकरी, लोहेका अर्क, बरफ प्रभृति द्रव्य कटे हुए स्थानमें लगा कसकर बांध देनेसे भी रक्त बन्द होता है। दूर्वा घासको प्रयोग करनेसे यही फल उत्पन्न हो सकता । अङ्गुलिको मोटी नाड़ी कट जानेपर |
कभी-कभी इन सकल उपायोंसे रक्त बन्द नहीं हों सकता। ऐसे स्थलमें लोहेका कोई द्रव्य आगमें कुछ गर्म कर, कटे हुए स्थानको दाग देना चाहिये। इससे अविलम्ब ही रक्त बन्द हो जाता है । किसी प्रकार अङ्गुलि कट जानेपर सुचिकित्सक द्वारा चिकित्सा कराना उचित है। कारण, भीतरी हड्डी चूर हो जानेसे अङ्ग ुलिका कियदंश काटकर फेंक देना पड़ता है । ऐसा न करनेसे क्रमशः वह स्थान सड़ा करता उत्पन्न हो जाता है। और अवशेषमें प्राण-संशय अङ्गुलिका अग्रभाग स्नायु-मण्डलसे जड़ा, इसलिये आघात पहुंचने से कभी-कभी धनुष्टङ्कार रोग आ उपस्थित होता है। अङ्ग ुलिमें अधिक आघात न लगने से ऐसे भयका कोई विषय नहीं । शीतल जलमें कपड़ा भिजाकर अङ्ग ुलि बांध दे । नहीं तो, ३० रत्ती सोस् सर्करा ( Plumbic acid ), एक ड्राम अफीमका अरिष्ट और आधसेर शीतल जल एकत्र मिश्रित कर क्षतस्थानपर प्रयोग करे । गेंदा फूलको पखुरोके रस किंवा होमिओपेथी मतके केलिण्डिउलाको जलके साथ आहत स्थानमें प्रयोग करने से कितना ही उपकार होता है । अङ्गुलिग (सं० त्रि०) अङ्गुलिभिः गच्छतीति । अङ्गुलिपर भर देकर चलनेवाला, जो उंगलीपर बोझ डालकर चले । अङ्गुलितोरण (सं० क्लो०) अङ्गुलेः तोरणमिव कृतम् । ललाटपर अर्द्धचन्द्राक्कृति चन्दनका तिलक । चन्दनको खौर जो माथेपर अर्द्धचन्द्राकार लगाई जाती है । अङ्गुलित्र (सं० क्लो० ) अङ्गुलि-त्र-क, ६- तत् । अङ्गुलिका आवरण, उगलोकी हिफाज़त करनेवाली चीज़ । १ लोहे या चमड़ेकौ टोपी जिसे दरज़ी कपड़ा सीते समय पहनते हैं। दरज़ी लोहे या चमड़ेको टोपी अनामिका के ऊपर पहन वस्त्रादि सोते हैं। यह टोपो न रहनेपर बार-बार सूई से अङ्गुलि छिद जाती है । २ दस्ताना । अङ्ग लित्राण (सं० क्लो०) अङ्गुलि-त्र-क्त । संयोगादेरातो धातो- ६खतः । पा ८।२।४३। उंगली बचानेको टोपी, जिसे |