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अंशुमर्द्दन—अँसुवाना
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अंशुमर्द्दन (सं॰ पु॰) ज्योतिषोक्त ग्रहयुद्धभेद, इस ग्रह-युद्धमें राजाओंसे युद्ध, रोग और दुर्भिक्षादि होते हैं।
ग्रह युद्ध देखो। अंशुमान् (सं॰ पु॰) १ सूर्य्य। २ सूर्य्यवंशीय एक राजा, सागरके नाती और असमञ्जसके पुत्र।
सागर और गङ्गा देखो। अंशुमाला (सं॰ स्त्री॰) अंशीः माला ६-तत्। किरण-राजि।
अंशुमाली (सं॰ पु॰) अंशु-माला-इन् अस्त्यर्थे। १ सूर्य्य। २ बारहकी संख्या।
अंशुल (सं॰ पु॰) अंशु-ला-क। अंशुं लातीति। १ चाणक्य पण्डित। २ बुद्धिमान् मनुष्य। ३ मुनि।
अंशुहस्त (सं॰ पु॰) अंशुर्हस्त इव यस्य। बहुव्री। सूर्य्य। किरण रूप हाथ द्वारा रसको खींचते है, इसीके लिये सूर्य्यका नाम अंशुहस्त हुआ।
अंश्वादि—अंशु, जन, राजन्, उष्ट्र, रोटक, अजिर, आर्द्रा, श्रवणा, कृत्तिका, अर्द्ध, पुर, यही सब अंशादि हैं।*। प्रतरंशादयस्तत्पुरुषे। पा ६।२।१९३। यह शब्द तत्पुरुष समासमें अन्तोदात्त होता है।
अंस (अन्स अदन्त चु॰ प॰)। कर्म्मणि यत् अंस्यः। अंस स्कन्धे भवः यत् अस्य। अंश देखो।
अंस (सं॰ पु॰) अंसी स्कन्धी, तौ स्नायुमर्म्मणी अर्धाङ्गली वैकल्यकरौ। तत्र वाहुस्तम्भः। स्कन्ध। कांधा। जिसमें चोट लगनेसे बाहुस्तम्भ हो जाता है।
अंसकूट (सं॰ पु॰) अंसः कूट इव उन्नतः। सांड़के कंधोंके बीचका ऊपर उठा हुआ भाग। कूबड़। कुब। जिस तरह बकरेका आख्ता करनेसे, सींग नहीं बढ़ता और शरीरमें गन्ध नहीं आती, उसी तरह सांड़का कोष काट लेनेपर उसका भी कूबड़ नहीं बढ़ता।
अंसत्र (सं॰ क्ली॓॰) अंस-त्रै-क। अंसं स्कन्धं त्रायते। स्कंध रक्षाका कवचविशेष।*। आदेच उपदेशेऽशिति। पा ६।१।४५। एजन्तो यो धातुरुपदेशे, तस्याकारादेशो भवति, शिति तु प्रत्यये न भवति। उपदेश अर्थमें जो धातु अजन्त हैं, उनके परे आकार-आदेश होता है। परन्तु यदि प्रत्ययका शकार इत् हो, तो नहीं होता। यहाँ त्रै धातुके ऐकार स्थानमें आकार होनेसे त्रा
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हुआ, इसके बाद।*। आतोऽनुपसर्गें कः। पा ३।२।३। आतो लोपः। उपसर्गहीन कर्म्मके उपपदके बाद आकारान्त धातुके उत्तर क प्रत्यय होता और आकारका लोप हो जाता है।
अंसत्रकोश (सं॰ त्रि॰) धनु और कवच कोशस्थानी रूप जहाँ हों। "अमत्रकोशं मिजता नपार्ण" (सक् १०।१०१।७) 'अंसत्रकोशं अंसवाणि धनंषि कवचानि न काशम्यानीयानि वस्मिन् तं'
साथण अंसफलक (सं॰ क्ली॰) अंसयोः फलके ६ तत्। स्कन्धास्थि, काँधेका हाड़। अस-फलके पृष्ठोपरि पृष्ठवंशस्योभयतः स्कन्ध सम्बन्धे। अस्थिर्म्मणी अर्धाङ्गन्ने वैकल्यकरे, तत्र वाहोः शून्यता शोषश्च। पीठके ऊपर मेरुदण्डकी दोनों ओर कांधके जोड़की जगह जो हड्डीवाला स्थान होता है, उसे अंसफलक कहते हैं। उसपर चोट लगनेसे वाहुस्तम्भ हो जाता है।
अंसभार (सं॰ पु॰) अंसे धृतः भारः। शाक-तत्। अंसे भार अलुक् समास। कांधेका बोझ।*। शाक पार्थिवादीनां मिइये उत्तरपदलोपस्योपसंख्यानम्। (कात्यायन) शाकपार्थिवादि समासमें उत्तरपदका लोप होता है। शाकप्रिय पार्थिव, यहाँ प्रिय शब्दका लोप करके शाकपार्थिव रूपमिहि हुई
इसलिये पहिले जो बहुव्रीहि समास हुआ है, उसीका यह उत्तरपद मालूम होता है।*। अलुगुत्तर पदे। पा ६।३।१। कभी-कभी समास होनेसे उत्तर पदके परे विभक्तिका लोप नहीं होता। अंसभारिक, अंसेभारिक (सं॰ त्रि॰) अंसभारेण हरति। अंसभार-ष्ठन्।*। भस्त्रादिभ्यः ष्ठन्। पा ४।४।१६। जो कांधेपर भार ले जाये। (स्त्री॰) अंमभारिको।*। षिट्गौरादिभ्यश्च। पाः ४।१।४१। पकार इत् होनेवाले प्रत्ययके निष्पन्न शब्दके स्त्री-लिङ्गमें और गोरादि शब्दके उत्तर ङीष् प्रत्यय होता है।
अंसल (सं॰ क्ली॰) अंस-लच् अस्त्यर्थे।*। वत्सांसाभ्यां काम। पा ५।२।९८। बलवान्
अँसुआ, अँसुवा (हि॰ पु॰) आँसू।
अँसुवाना (हि॰ क्रि॰) अश्रुपूर्ण होना। डबडबा आना। आँसूसे भर जाना।
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