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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२०१

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अजमायु — अजमेर

अजमायु (सं० पु० ) बकरे किसी भिंभिहाहट, बकरे का सा शब्द।



अजमार, अजमारक (सं० पु० ) अज-मृ- णिच्-अण्, अजान् मारयति ; उप-तत् । कुर्वादिभ्यो ण्यः । पा । ११५१ । कसाई, जो बकरे को मार उसका मांस बेचे; मांस- विक्रयी, गोश्त बेचनेवाला ।
अजमीढ़ (सं० पु० ) अजमीढ़ो यज्ञे सिक्तो यत्र । १ देशविशेष, अजमेर । २ राजा युधिष्ठिर । ३ सुहोत्र- के एक पुत्र । अजमेर देखो ।

अजमुख (सं० पु० ) अजस्य छागलस्य मुखमिव मुखं यस्य । दक्ष प्रजापति, सतोके पिता, शिवके श्वशुर ।

दक्षने नारदको बातमें पड़कर शिवको कन्यादान दिया था, किन्तु कुटुम्बिता भली भांति बराबर में न हुई । दक्ष महाराज चक्रवर्ती थे; इनका कितना विभव और कितना सुखैश्वर्य रहा । किन्तु इनके दामाद श्मशान-वासी भङ्गड़ भोलानाथ थे, जो शिरमें भस्म लगाते और भाँग खाते रहे। देवताओंको सभा लगनेपर दामादको ज्वालासे दक्षराजको अपने शिरपर हाथ रखकर बैठना पड़ता था । अन्तमें इन्होंने चिन्ताकर शिवका अपमान करनेके लिये एक यज्ञको आरम्भ किया । त्रिभुवनको निमन्त्रणका पत्र भेजा गया । केवल प्राणको नन्दिनी सती बाक़ी रह गई; फिर सती के सम्पर्कसे जिनके साथ में सम्पर्क था, वह शिव भी निमन्त्रणका पत्र पानेसे छूट गये । किन्तु जब बापके घरमें धूमधाम होती, तब स्वीका मन निमन्त्रण न पानेपर भी चुलबुलाया करता है । सती विना आह्वान हो पित्रालयमें यज्ञ देखनेको जा पहुंचीं । दक्षने सतीको देख जो मनमें आया, 'वह कहकर सभा के मध्य शिवको निन्दा की । शिव- प्रेमभिखारिणी सतीके हृदयमें वह कटुवाक्य वाण जैसे चुभ गये। उन्होंने यह कहकर प्राणत्याग किया, – “ आप पिता हैं, मैं कन्या होकर अधिक क्या कहेगी । किन्तु जिस मुखसे आपने शिवको निन्दा की है, वह मुख आप देखेंगे, कि बकरेकासा हो जायेगा ।" बोलते-बोलते सतीमें फिर सती न रहीं, उन्होंने सबके सम्मुख यज्ञस्थलमें प्राण छोड़ दिया ।

यह संवाद कैलास में पहुंचा। फिर क्या था, त्रिशूलीके कोपसे त्रैलोक्य कम्पित होने लगा । पातालमें नाग भयभीत हुए, शून्यमें यक्षरक्ष घबराये और सारा जगत् उथल-पथल हो गया । शिव विरूपाक्ष प्रभृति महावीरोंको लेकर दक्षालय गये ; पागलने जिस पापमुखसे उनको निन्दा की थी, उसको उन्होंने काटकर दूर फेंक दिया। अवशेषमें दक्षको पत्नीने आकर दामाद से अनेक स्तवस्तुति की। इससे दक्षको पुनर्वार प्राण वापस मिला, किन्तु जन्मको तरह इन्हें छागलका मुण्ड पहनकर रहना पड़ा ।

कितने ही लोग अनुमान करते हैं, कि हरि- द्वारके निकटमें कनखल और हरिको - पैढ़ी इन्हीं सब स्थानोंको लेकर दक्षराजकी राजधानी सुशोभित थी ।


अज़मूदा, आज़मूदा ( फा० वि० ) परीक्षित, जांचा हुआ ।

अजमेर, अजमेरु – राजपूताने के अन्तर्गत अजमेर- मेवाड़का एक प्रधान नगर। कोई कोई कहते हैं, कि सूर्यवंशीय अजमीढ़ राजाने पहले इस नगरको निर्माण कराया था। किसीके मतसे महाभारत के वनपर्वमें उक्त विदुर राजाका यह राज्य है, कालक्रम- से ध्वंस हो गया है। पीछे चौहान राजाने इसे पुनर्वार निर्माण कराया ।

अजमेर पहले चौहानवंशीय राजपूतोंके अधीन रहा । इस वंशके अजय राजाने पहले नाग- पर्वतमें एक दुर्गको निर्माण करानेके लिये चेष्टा की थी, किन्तु उनका यत्न निष्फल हो गया। इसके बाद उन्होंने तारागढ़ पहाड़ में गढ़-बितलो नामके एक दुर्गको निर्माण कराया । सन् ११०० ई० में इन्द्रकोट नामक उपत्यकापर अजमेर नगर स्थापित किया गया। गुजरात के सोमनाथवाले मन्दिरको लूटने जाते समय महमूद अजमेरके भीतरसे निकल गये थे । राह में यहांके अनेक देवालय और देवमूर्तियां उन्होंने विनष्ट कर डालीं । अजय के पुत्रका नाम अना या अर्णोराज था, जिन्होंने अनासागर निर्माण कराया ।