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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२०७

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अजस्र-अजाघ्रात २८१
अजस्र (सं० क्लो०) न जसु मोक्षणे-र, तच्छोल्यादौ कर्तरि ।

नमिकम्पिस्म्यजसकमहि'सदीपो रः । पा ३।२।१६७ ।

सन्तत,चिरकालस्थायी, निरवच्छिन्न। (क्रि० वि०) सदा,हमेशा।

अजहत्स्वार्था (सं० स्त्री०) न-ओहाक् त्यागे-शतृ अजहत्। न जहाति स्वार्थों याम्।१ जिसको निजका अर्थ परित्याग न करे। २् अलंकारशास्त्र के लक्षणा नामक शब्द की वृत्ति या शक्ति विशेष। इसका दूसरा नाम उपादानलक्षणा है-मम्मटभट्टने इसका यह लक्षण बताया है-

"स्वसिद्धये परापेक्ष परार्थे स्वसमर्थनम् । उपादानं लक्षणञ्चेत्यु क्ता शुद्धेवसा द्विधा॥"

अन्वयसिद्धिके लिये अन्यका आश्रय ले जो शब्द दूसरेके अर्थ में अपने अर्थको समर्थन करे, वही उपादानलक्षणा है। उपादानलक्षणा दो प्रकारको होती है-रूढ़िमूल और प्रयोजनमूल। जैसे-श्र्वेती धावति। यानी श्वेत वर्ण दौड़ता है। श्वेतवर्ण कभी दौड़ नहीं सकता।सुतरां इस जगह श्वेतवर्ण का प्रकृत अर्थ नहीं लगता,इसीसे क्रियाके साथ भी ठीक अन्वय नहीं होता।यहां श्वेतवर्ण में जो लक्षण है, उससे श्वेत पश्वादि समझना पड़ेगा (रूढ़िमूल )।

'कुन्ताः प्रविशन्ति'

का अर्थ है, कि अस्त्र प्रवेश करते हैं। इस बातके कहनेका प्रयोजन यह है, कि अष्टाङ्ग अस्त्रशस्त्रभूषित पुरुष प्रवेश करते हैं (प्रयोजन-मूल)।

अज़हद (फा० वि०) अपरिमित रूपसे, अत्यन्त अधिक । बहुत ज्यादा।

अजहल्लिङ्ग (सं०.पु०) हा-(ओहाक् त्यागे) शतृ,न जहत् लिङ्गं यम् ; बहुव्री। जो शब्द, भिन्न लिङ्ग विशेष्यके विशेषण रूपसे प्रयुक्त होते भी अपने लिङ्गको परित्याग न करे। यथा-

वेदः श्रुतिर्वा प्रमाणम्

यानी वेद किंवा श्रुति ही प्रमाण है। इस जगह वेद पुंलिङ्ग, श्रुति स्त्रीलिङ्ग और प्रमाण क्लीव लिङ्ग शब्द है। किन्तु वेद और श्रुति शब्दके विशेषण रूपसे प्रयुक्त होते भी प्रमाण शब्द अपने क्लीव लिङ्गको परित्याग नहीं करता। अर्थात् वेद शब्दका विशेषण स्वरूप होनेसे यह पुंलिङ्ग और श्रुति

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शब्दका विशेषण होनेके कारण स्त्रीलिङ्ग नहीं होता।

अजहा (सं० स्त्री० ) हा-क, न जहाति शूकान्,नञ्-तत्। कोंच, कीचको फली।

अजा (सं० स्त्री०) सांख्यमतसिद्ध प्रधान पर्यायस्थ समान अवस्था-विशिष्ट और सत्वरजस्तमोरूप गुणत्रय ।

"अजामको लोहितवष्णवीं बता प्रजाः सृजमानां सरूपाम् ।" (श्वेताश्व० उ०)

अर्थात्-लोहित, शुक्ल और कृष्णवर्णवालो समान अर्थ परित्याग न करे। २ अलङ्कारशास्त्रके लक्षणा

नामक शब्दको वृत्ति या शक्ति विशेष । इसका दूसरा रूपकी बहुतसी प्रजा जिस प्रकृतिने उत्पन्न की,अन्य पुरुष अर्थात् जीव उसे परित्याग करता है।इसी प्रकृतिको सत्वादि गुणानुसारसे खेतादि रूप-युक्त बहु प्रजा उत्पन्न करनेके कारण सांख्यवादियोंने नाना वर्ण होनका उल्लेख किया है।

अजाक्वपणीय (वै० त्रि०) बकरी और कञ्ची जैसा ।

अजाक्षीर (सं० क्लो०) बकरीका दूध ।

अजागर (सं० पु०) जागृ-अच् इति जागरः ,न जागरःयस्मात् बहुव्री।१ भृङ्गराज, भीमराज, धमिरा।भृङ्गराजको सेवन करनेसे निद्रा नहीं आती। २ अजगर। (त्रि०) ३ न जागनेवाला।

अजागल (सं० पु०) १ बकरेकी गर्दन।

अजागलस्तन (सं० पु०) १ बकरेके गर्दनका नाकाम स्तन।२ किसी व्यर्थ वस्तुको उपमा।

अजाघ्रात (सं० क्लो०) अजेन छागेन आघ्रातम्,३-तत् । बकरीसे शरीर सुंघाना, "प्रायश्चित्तविशेष ।काश्यपने व्यवस्था बताई है, कि यदि रजस्वला स्त्रौ चाण्डाल और श्वपाकको स्पर्श करे, तो ऋतुके तीन दिन बिता त्रिरात्र उपवासमें रहे और पञ्चगव्यसे शुद्ध हो, इसके बाद छागलसे अपना शरीर सुंघावे-

"चाण्डालेन श्वपाके न संस्पृष्टा चेद्रजस्वला।

तान्यहानि व्यतिक्रम्य प्रायश्चित्तं समाचरेत् ॥ विरावमुपवासःस्वात् पञ्चगव्येन शुध्यति । तां निशान्तु व्यतिक्रम्य अजानातन्तु कारयेत्॥

स्पर्श विषयमें वृहस्पतिने एक अतिरिक्त विधि लिखी है। यथा-

"तीर्थे विवाहे यात्रायां संग्रामे देशविप्लवे । नगरग्रामदाहे च स्पृष्टास्पृष्टि न दुष्यति ॥”