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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२१७

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अज्ञातशोल-अनंच्ल

अज्ञातशील ( सं० त्रि० ) जिसको चाल मालूम न हो, बेजाने चालचलनवाला ।

अज्यू (वै० त्रि० ) १ खेतका । २ मैदानवाला । अज्विन् (सं० त्रि० ) तेज़, चालाक ।

अज्ञात (सं० पु० ) असम्बन्धीय पुरुष, बेरिश्ता अमर (हिं० वि०) न भरनेवाला, और नाता ।}}

पतनशून्य, न बरसनेवाला । १ विना अभोरो (हिं० स्त्री० ) थैली, अधारी । अञ्चक(सं० क्क़ी ० ) नेत्र, आंख ।


अज्ञान ( सं० त्रि०) नास्ति ज्ञानं यस्य । ज्ञानका, बेवकूफ । ( क्लो० ) न ज्ञानम् । २ ज्ञाना- भाव, बेवकूफी । ३ विरुद्ध ज्ञान, उलटी समझ । श्रीमद्भागवतके मतसे सृष्टिकाल में ब्रह्माने पांच प्रकारके अज्ञानोंको कल्पना की थी । यथा - तमः, मोह, महामोह, तामिश्र और अन्धतामिश्र । वेदान्त- मतसे सत् और असत् समझने के लिये जो त्रिगुणा- भावरूप ज्ञान है, उसके विरोधीको अज्ञान त्मक कहते हैं । अज्ञानकृत (सं० त्रि०) बेजाने किया गया । अज्ञानतस्, अज्ञानात् (सं० अव्य० ) बेजाने-समझे, विना विचारे । अज्ञानता (सं० स्त्री०) बेवक फो, मूर्खता; लाइल्मी, हिमाकत, बेसमझी। अज्ञानपन ( हिं० पु० ) बेवकूफौ, मूर्खता । अज्ञानवन्धन (स ं० क्लो० ) मूर्खताका हिमाकतको जकड़ । बंधाव, `अज्ञानिन्, अज्ञानी ( सं० त्रि० ) मूर्ख, बेवकूफ । ) असम्बन्धीय पुरुष, जो रिश्तेदार अज्ञास् (वै० पु० न हो । अज्ञेय (सं० त्रि. ) ज्ञानके अयोग्य, अक्ल से बाहर । अज्म (वै० पु० ) जङ्ग, युद्ध | 'अज्मन् (सं० स्त्री० ) अजति गच्छति स्वर्ग दानेन अनया, अज्-मनिन् करणे । जिसे दानकर लोग स्वर्ग जाते हैं ; गो, गाय । अज्यानि (वै० स्त्री० ) नष्ट न होनेवाली प्रकृति । अज्येष्ठ ( स ं० त्रि० ) बड़ा या बुजुर्ग नहीं । ज्येष्ठवृत्ति (सं० त्रि०) जिसका स्वभाव बड़ोंकासा न हो । 'अज्यों-जौं' देखो। अज्र (वै० पु० ) १ खेत । २ मैदान । (त्रि०) ३ तेज, चालाक ।


अञ्चति (सं० पु० -क्ली०) अनच्-अति । अच को वा । उय् ४।६१
अञ्चल (सं० पु० ) अञ्च- अलच् । आंचल, प्रान्तभाग, दामन । कपड़ेकौ जिस ओर बेल-बूटे और किनारीका अधिक सौन्दर्य रहता, उसे आंचल या अंचला कहते हैं। इस देशको स्त्रियोंके वस्त्रों में ही आंचल होता है। पुरुषोंके वस्त्रोंका भी प्रान्तभाग है, परन्तु उसे चल नहीं कहते । est गृहिणी स्त्रियोंके चल लथेरते-लघेरते चलनेको बड़ा कुलक्षण समझती हैं । स्त्रियोंको ऐसा विश्वास है, कि भूतप्रेतादि कपड़े का आंचल पकड़ शरीरमें प्रवेश करते हैं ।

अञ्चलका अपभ्रंश आंचल या अंचला है। प्रतिमाको सज्जित करते समय जो डङ्गका गहना देवीको छातीपर लटका दिया जाता, उसे भी प्रांचल कहते हैं । नया कपड़ा जब कितनी हो उड़िया, बङ्गाली और विहारी स्त्रियां पहनतीं, तब अचलका एक कोना हलदोसे रंग लेतीं और आंचलका कुछ सूत खोल और टुकड़े-टुकड़े कर कांटे, खोंचे, चोर और अग्नि प्रभृतिको समर्पण करती हैं । इसका तात्पर्य यह है, कि कांटा प्रभृति समस्त शत्रुओंका अंश दिया गया, इस- लिये आगे कोई अनिष्ट न करेगा। जब भाग दे दिया गया, तब कांटा उसे क्यों छेदेगा या अग्नि ही उसे क्यों जलायेगी ? कोई बात मनमें बनाई रखनेके लिये स्त्रियां आंचल के एक कोने में गांठ लगा देती हैं । बालकोंके माथे में कपड़े का आंचल लगने- से अकल्याण होता है । इसलिये हठात् किसी शिशुके माथेमें आंचल छू जानेसे एकबार उसे मट्टोमें लथेरना पड़ता, जिससे सब दोष दूर हो जाता है । विवाहमें कन्याका आंचल और वरका दुपट्टा गांठ देकर जोड़ दिया जाता है ।