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अक—अकड़म
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इसके उपरान्त एक-एक खानेको फिर चार-चार भागोंमें विभक्त किया जाता है। इससे १६ खानोंका यह चक्र बन जाता है। इससे विचार करनेकी प्रणाली यह है—मान लीजिये, शिष्यका नाम आनन्दचन्द्र और वीजमन्त्र ह्रीं है। अब आनन्दचन्द्रके आदि अक्षर आ-से दाहिनी ओर ह्रीं मन्त्रके आदि अक्षर ह तक गिनना होगा। पहिले आकारवाले खानेमें—सिद्ध। दूसरेमें साध्य। तीसरेमें—सुसिद्ध और चौथेमें—अरि। यही हकारके खानेमें अरि पड़ा, इससे मन्त्रोद्धार न हुआ।
यदि मन्त्रके खानेमें अरि न पड़े, तो फिर छोटे-छोटे खानोंको गिनना पड़ेगा; जैसे—अकारका छोटा खाना पहिला सिद्ध सिद्ध, दूसरा सिद्ध साध्य, तीसरा सिद्ध सुसिद्ध, चौथा सिद्ध अरि। इसके नम्बर नीचे बड़े कोठेके चारखानेमें भी इसी तरह गिनने होंगे। फिर और एक बड़े कोठेके खानोंको गिनकर क्रमसे हकार-वाले खानेतक गिनना पड़ेगा। इस चक्रका नियम तन्त्रराजमें लिखा है। अकड़मचक्र और मन्त्र शब्द देखो। अकथ्य (सं॰ त्रि॰) न कहने योग्य। दुर्वाक्य। निष्फल।
अक़द (फा॰ पु॰) इक़रार। प्रतिज्ञा। वायदा।
अकदन (क्रि॰ वि॰) क़दन देखो।
अक़दबन्दी (फा॰ स्त्री॰) इक़रारनामा। प्रतिज्ञापत्र।
अकधक (पु॰) आशङ्का। आगा-पीछा। सोच-विचार।
भय। डर।
अकनना (हि॰ क्रि॰) कान लगाकर सुनना। चुपचाप सुनना। आहट लेना। सुनना। कर्णगोचर करना।
अकबक (हि॰ पु॰) निरर्थक वाक्य। अण्डबण्ड। अनाप-शनाप। असंबद्ध प्रलाप। घबड़ाहट। धड़क। चिन्ता। खटका। अक्की-बक्की, छक्का पंजा। होश-हवास। चतुराई। सुध। (वि॰) भौचक्का। निस्तब्ध। अवाक्। चकित्।
अकबकाना (हि॰ क्रि॰) चकित होना। भौचका होना। घबड़ाना।
अकबर। (अबुल फतह जलाल्उद्दीन् मुहम्मद पादशा-य-गाजी।) हमलोग इन्हें सदासे अकबर बादशाहही कहते हैं। ये हुमायूँ के लड़के थे। इनकी माताका नाम सुल्ताना हमीदा बानो बेगम था। सन् १५४२ ईस्वी-
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की १५वीं अक्टूबर (मुसलमानी रजब महीना ९४० फ़सली) रविवारको अकबरका जन्म हुआ था। १५५६ ईस्वीमें अकबरने १३ वर्ष ९ महीनेकी अवस्थामें दिल्लीके राज्यशासनकी बाग डोर अपने हाथमें ली और ५१ वर्ष राज्य करके १६०८ ईस्वीमें कमसे कम ६५ वर्षको अवस्थामें इस लोकको त्याग दिया।
अकबरका नाम हिन्दू-मुसलमान किसीसे छिपा नहीं है। इस समय कितनेही गृहस्थोंके घरोंमें अकबरी मोहरें निकलेंगीं। हिन्दू भी उस मोहरकी भक्ति करते हैं। आज चार युगोंसे यह बात देखी जाती है कि जब किसी महान् पुरुषका जन्म होनेवाला होता है, तो माता-पिताको कष्ट झेलना पड़ता है। इधर हमीदाके गर्भमें जिस समय अकबर आये, उसके कुछही दिन उपरान्त शेरखांने दिल्लीके सिंहासन पर अधिकार कर लिया। जब बुरे दिन आते हैं, उस समय मनुष्यका कोई सहायक नहीं रहता। दरिद्रोंका तो कहनाही क्या है; जो राजाधिराज सम्राट् हैं, उनको भी सहायकका घाटा हो जाता है। हुमायूं जब राज्यभ्रष्ट हो गया, तो उसके बन्धु-बान्धवोंने उसका साथ छोड़ दिया और प्रधान-प्रधान सर्दार विरोधी हो उठे। परन्तु सामान्य और अनधिकारी मनुष्योंने उनको न छोड़ा। हुमायूं अपने उन्हीं विश्वासी अनुचरोंको साथ ले सिन्धु नदी पारकर अमरकोटको भाग गया। राहमें हुमायूंको बड़ा कष्ट उठाना पड़ा, चारों ओर मरुभूमि, कहीं जलका ठिकाना नहीं, किसी वृक्षका पता नहीं, पीछे शत्रुकी सेना, जल-आश्रयसे हीन होनेके कारण हुमायूंके साथियोंमेंसे कितनोंहीने उसी मरुभूमिमें अपने प्राण गँवाये और जो बचे, वह भी अमरकोट पहुँचते २ मृतवत् हो गये। हुमायूं देखो। सुल्ताना हमीदाका गर्भ बड़ाही कठोर था। कितने-ही सिद्ध पुरुषोंने कहा था, कि इस गर्भसे एक अवतार उत्पन्न होगा। ख्वाज़ा मसूदने भी एक बार अबुल-फज़लसे कहा था कि, अकबर ईश्वरके अवतार हैं, योगियोंने उनके पितासे यह बात कही है। १५४२ ईस्वीको, १५वीं अक्टूबर रविवारको अक-
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