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अतिशक्र(सं॰ त्रि॰) इन्द्रसे बड़ा।
अतिशङ्का (सं॰ स्त्री॰) अत्यन्त भय, अज़हद, खौफ़।
अतिशय (सं॰ पु॰) अति-शीङ्-अच्। १ आधिक्य, अतिरेक, बहुतायत, ज़ियादती। वेगातिशय जैसे रूपोंमें अतिशय शब्द विशेष्य और अतिशयसाधु जैसे स्थलोंमें विशेषण होता है। २ काव्यालङ्कार-विशेष, जिसमें किसी वस्तुका होना या न होना लगातार दिखाया जाता है। (त्रि॰) ३ बहुत ज्य़ादा, अधिकसे अधिक। अतिक्रान्तः शयं हस्तम्। ४ हस्ताति-क्रमकारक। अतिक्रम्य शक्तिं (अव्य॰)। ५ शक्त्यतिक्रम। भर, अतिवेल, भृश, अत्यर्थ, अतिमात्र, उद्गाढ़, निर्भर, तीव्र, एकान्त, नितान्त, गाढ़, वाढ़, दृढ़, अतिमर्याद, उत्कर्ष, बलवत्, सुष्ठु, किमुत, सु, अतीव, अति, द्वार, व्यापार, समधिक, अतिरिक्त—यह पर्याय हैं।
अतिशयन (सं॰ क्ली॰) अति शीङ्-भावे ल्युट्। १ बहुत सोना। २ अतिरेक, अतिशय, कसरत। (त्रि॰) ३ अतिशययुक्त, ज़ियादतीका।
अतिशयोक्ति (सं॰ स्त्री॰) अतिशयेन उक्तिः निर्द्दशोऽस्मिन् वर्णने। १ जो बात बहुत बढ़ाकर कही जाय। २ काव्यालङ्कार-विशेष, एक प्रकारका अलङ्कार।
साहित्य-दर्पण-प्रणेताने अतिशयोक्ति अलङ्कारका इसतरह लक्षण बताया है— "सिद्धत्वे ऽध्यवसायस्वातिशयोक्तिर्निगद्यते।" प्रकृत विषयका अप्राधान्य दिखाके उसके उद्देश्यमें अप्रकृत विषयको निश्चल भावसे स्थापन करनेपर अतिशयोक्ति होती है। यथा, मुखं द्वितीयश्चन्द्रः। मुख तो दूसरा चन्द्र है। इस स्थानमें प्रकृत विषय मुख है, किन्तु मुखको चन्द्र बताके उल्लेख किया गया है। इसीसे ऐसे स्थलमें एकका प्राधान्य और दूसरेका अप्राधान्य प्रतिपन्न होता है। अधःकरण यानी अप्राधान्य और निगरणके सम्बन्धमें अलङ्कारिकोंने एक कारिका लिखी है। यथा— "विषयस्यानुपादानेऽप्युपादानेऽपि सूरयः। |
प्रकृत विषय निर्द्देश किया या न किया जाय, अधःकरण अर्थात् अप्राधान्य समझ पड़नेसे ही उस विषयका निगरण करना होता है।
अतिशयोक्ति अलङ्कार पांच प्रकारका है—१ दो विषयों में भेद रहते भी अभेदकल्पना। २ अभेदविषयों में भेदकल्पना। ३ सम्बन्ध होते भी असम्बन्ध कल्पना। ४ असम्बन्धमें सम्बन्धकल्पना। ५ कार्य और हेतुके पौर्व्वापर्यका अभाव अर्थात् विपर्यय। "भेदेऽप्यभेदः सम्बन्धेऽसम्बन्धस्तद्विपर्य्ययौ। १। भेदमें अभेद— "कथमुपरि कलापिनः कलापी विलसति तस्व तलेऽष्टमीन्दुखण्डम्। मोर पूंछ ऊपर लसत नीचे आठें चन्द। क्या ही आश्चर्य्य है! ऊपर मोरकी पूंछ (केश) शोभा पा रही है; उसके नीचे अष्टमीका चन्द्र (ललाट) उदय हुआ है; उसके बाद दो चञ्चल कमल (चक्षु) फूले हैं; उनके नीचे तिलकी कली (नासिका) खिली हुई है; उसके नीचे प्रवाल (ओष्ठ) मनको हरे लेते हैं। इस जगह केशादिके साथ मोरकी पूंछ प्रभृतिका पूरा भेद रहते भी अभेद रूपसे वर्णना की गई है। २। अभेदमें भेद— "अन्धदेवाङ्गलावण्यमन्याः सौरभसम्पद। उस पद्मपलाशाक्षी कामिनीकी देहमें जैसा लावण्य है, वैसा और कहीं नहीं, वह सौन्दर्य और माधुर्य सभी अलौकिक है। जगत्में जो रूपलावण्यादि देखा जाता, इस जगह उससे कोई विभिन्नता न रहते भी भिन्न रूपसे कल्पना की गई है। राधामें जो रूप है, वैसी कहुंन दिखात। ३। सम्बन्धमें असम्बन्ध— |
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अतिशक्र—अतिशयोक्ति