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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२८

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अकबर
यह ऊपर लिखी पढ़ाई अरबी-फ़ारसी पढ़ने वालोंकी थी। संस्कृत पढ़नेवालोंको निम्नलिखित विद्याएँ पढ़नी पड़ती थी।
  1. व्याकरण
  2. न्याय
  3. वेदान्त
  4. पातञ्जल
अकबरको विद्यानुरागभी कम न था। अपने पुस्तकालयकी पुस्तकें भिन्न-भिन्न श्रेणीयोंमें भाग करके उन्होंने रखवाई थीं। गद्यकी और पद्यकी और अरबी, फ़ारसी, हिन्दी, ग्रीक, कश्मीरी आदि भाषाओंकी पुस्तकें छाँट-छाँट कर रखी गई थीं। जिस भाषाको जो जानता था, उसके मुँहसे ही उसी भाषाकी पुस्तक वह सुनते थे। जब ग्रन्थ समाप्त हो जाता और उसका विषय सम्राट् अकबरकी समझमें आ जाता, तो वह, पढ़ने वालोंको अच्छा पारितोषिक भी देते थे। हिन्दुओंके लिखे हुए ग्रन्थोंको भी वह बड़ी चाहसे पढ़ते थे। कृष्ण ज्योतिष, गङ्गाधर, महेश महानन्द, महाभारत, रामायण आदि संस्कृत ग्रन्थोंका उन्होंने फ़ारसी भाषामें अनुवाद कराया था।
अकबरके समयमें चित्र-विद्याकी भी बड़ी उन्नति हुई थी। सम्राट् को स्वयम् चित्र बनानेका शौक़ था; इसीसे वह चित्रकारोंको सदा उत्साह दिलाया करते थे। उन्होंने सप्ताहमें एक दिन तस्वीर दिखानेके लिये नियत कर दिया था। वे अच्छी तस्वीरोंको छाँट उनके बनानेवालोंको उत्साह दिलाते थे। जो कोई उनके दरबारसे वेतन पाता था, उसका वेतन बढ़ानेको आज्ञा देते थे। इसका फल यह हुआ कि, उनके राज्यमें ऐसे चित्रकार दिखाई देने लगे, जिनके आगे विलायती चित्रकार कोई पदार्थ नहीं हैं। अबुलफज़लने लिखा है कि, इनमें हिन्दुस्थानी ही विशेष थे। हिन्दुओंकी चित्र-विद्यामें निपुणता उस समय बहुत ही बढ़ी-चढ़ी

थी। केशी, लाल, मुकुन्द, क्षेमङ्कर, मधु, योगेन्द्र, महेश, राम, हरिवंश, तारा; हिन्दू चित्रकारोंमें ये बहुतही विख्यात हैं। साम्रट्की आज्ञासे बहुतसी फ़ारसीकी किताबोंमें तस्वीरें लगाई गई थीं। इनके अलावा कालीयदमन, नलदमयन्ती और महाभारत तथा रामायणमें भी सुन्दर-सुन्दर तस्वीरें लगवाई गई थीं। वस्त्रोंपर काम, सोने-चांदीपर नक्क़ाशीका काम, ज़रीपर ज़र्दोज़ीका काम, पत्थर और काठपर खुदाईका काम इत्यादि शिल्प-सम्बन्धी कामोंपर भी अकबरकी विशेष दृष्टि थी और धन व्यय करके उन्होंने इन शिल्पके कामोंको उत्साह दिया था।
सम्राट् अकबर सभी विषयोंमें एक अच्छे शिल्पी थे। उन्होंने एक गाड़ी बनवाई थी, जो एक विचित्र ही ढङ्गसे बनाई गई थी। उस गाड़ीमें एक जोता रखा गया था गाड़ी चलात ही जोता घूमने और आटा पिसने लगता था। अकबरने एक ऐन्ट्रजालिक आईना बनवाया था। दूर अथवा पाससे भी उस आईनेको देखनेपर उसमें भांति भांतिकी मूर्त्तियाँ दिखाई देती थीं। कुएँसे जल निकालनेकी एक कल अकबरने बनवाई थी। उस कलमें एक चक्का लगा हुआ था; उसको घुमाते ही दूरमें या गहरे कुएँ मेंसे जल ऊपर आ जाता था। साथही उसमें एक कारीगरी यह की गई थी कि, इधर जल खींचनेवाला चक्का घूमता था और दूसरी ओर उसीके बलपर एक आटा पीसनेका जांता घूमता था; इससे आटा बहुत जल्द तय्यार होता था। बन्दूक़ें और तोपें साफ़ करनेके लिए भी एक कल अकबरने बनवाई थी; उसमें एक साथही बारह बन्दूक़ें साफ़ होती थीं।
संगीत-शास्त्रकी ओर भी अकबरका पूरा ध्यान था। हिन्दू, ईरानी, मुसलमान, कश्मीरी आदि सब जातियोंके गानविद्या-विशारद स्त्री-पुरुष उनके साथ विद्यमान थे। तानसेनका नाम अभी जगत् में प्रख्यात हो रहा है। मालाबारके बाजबहादुर भी उस समयके एक अच्छे गायक थे। इनके अतिरिक्त और भी कितने ही गायक तथा गायिकायें अकबरकी सभाको गान-विद्यासे मोहित करती थीं। उस्ताद यूसुफ, सुल-