- तान हाशिम, उस्ताद मोहम्मद आमीन, और उस्ताद मोहम्मद हुसेन तानपूरा बजाते थे। ग्वालियरके वीरमण्डलखां स्वरमण्डल बजाते थे। शहाब खां और पुर्ब्बीन खां बीन, शेख़ दाबानी करनाई, उस्ताद दोस्त सहनाई, मीर सैयद अली और बहरामकुली घिचक, तास बेग कुञ्ज, कासिम रबाब और उस्ताद शाह महम्मद सुर्ना आदि भांति-भांतिके बाजे बजाते थे। अबुलफ़ज़लने भाई फैज़ी सम्राट् अकबरकी सभामें एक प्रधान कवि थे। फैज़ीने ब्राह्मण-वेशसे काशीमें संस्कृत पढ़ी थी और अच्छा पाण्डित्य लाभ किया था।
- अकबरने साहित्यके प्रचारमें भौ अच्छा उद्योग किया था। उन्होंने अपने राज्यभरमें पाठशालायें स्थापित करादी थीं। उनमें धार्मिक शिक्षाका कुछ विशेष प्रभाव नहीं था)
- अकबर धार्म्मिक भी थे। जिस समय सूर्य्य मेष राशिमें आते, तो उन्नीस दिनोंतक सौराग्नि आहरण करते थे। उसकी प्रणाली यह है:—दोपहरके समय अकबरके नौकर धूपमें सूर्य्यकान्तमणि रखकर आग जला लेते थे। सालभरतक उस आगकी रक्षा करनेके लिये विश्वासी मनुष्य नियत किये गये थे। सम्राट्के लिये रसोई उसी अग्निपर होती थी। पौर्णमासीके दिन चन्द्रकान्तमणि द्वारा वे चन्द्रमासे अमृत हरण कराते थे। वह अमृतकणा साफ ओसके समान रहती थी।
- रातके समय अकबरके घरमें ३६ दीपक जलते थे। उनमें १२ सफ़ेद, बारह चांदीके शमादान और बारह सोनेके शमादान रहते थे। एक-एक शमादान वज़नमें दस मनसे कम न था। उनमें छः २ बड़ी लम्बी मोमबत्ती लगाई जाती थीं। शुक्लपक्षकी प्रतिपदा, द्वितीया और तृतीयातक एक, दूसरी पीतलसोज़में आठ बत्तियां जलती थीं, चतुर्थीको सात और पञ्चमीको छः बत्तियां रहती थीं। इसी तरह नित्य एक बत्ती कम करके दशमीको केवल एक बत्ती रह जाती थी। इसके बाद पूर्णिमातक एक बत्ती ही जला करती थी। फिर कृष्णपक्षकी प्रतिपदाको एक, द्वितीयाको दो,
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- तृतीयाको तीन, और चतुर्थीको चार और पञ्चमीको भी चार ही बत्तियां जलती थीं। षष्ठीको पांच, सप्तमीको छः; इसी तरह एक दिन नागा करके दो दिनोंतक संख्या बढ़ाई जाती थी। एक सेर रूईकी एक एक बत्ती बनती थी और एक बत्तीमें एक सेर तेल लगता था।
- अकबरने अपने राज्यमें सब तरहका प्रबन्ध किया था। वे सती होनेकी प्रथाके विरोधी थे। वे स्वयम् बहुत थोड़ी शराब पीते थे और अपने सभासदोंको भी बहुत थोड़ी पीने देते थे।
- अकबर रूपमें बहुत ही सुन्दर थे। छाछठ वर्षको अवस्था हो जानेपर भी वे बूढ़े से नहीं मालूम होते थे। उनके पक्के केश मात्र उनकी वृद्धावस्थाके चिन्ह थे। गोएसे कई पाहड़ी उनकी सभामें आये थे। पादरियोंकी इच्छा थी कि, सम्राट् कृस्तान हो जायँ, पर उनको इच्छा पूर्ण न हो सकी।
- १६०६ ईस्वीमें सुलतान दानियालका विवाह बड़े समारोहसे हुआ; परन्तु कुछ दिन बाद ही दानियाल शराब पोनेके कारण मर गया। दानियाल की मृत्युसे अकबर बहुत ही शोकान्वित हुए। वे दिन-दिन क्षीण
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