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अत्यन्तसंयोग (सं० पु० ) अत्यन्तेन साकल्येन संयोगः सम्बन्धः। अन्तमवसानमतिक्रान्तः संयोगो वा (वाचम्) । कालाध्वनीरत्यन्तसंयोगे । पा २।२५। १ निरवच्छिन्न सम्बन्ध। २ व्याप्ति ; मौजूदगी। अत्यन्तसम्पर्क (सं० पु०) अतिशय सहवास, ज्यादा एकसाथका रहना। अत्यन्तसुकुमार (सं० पु०) १ वृक्षविशेष, अकरा।(त्रि०) २ अतिशय कोमल, निहायत नाजुक । अत्यन्ताभाव (स' पु०) अतिक्रान्तः अन्तं नाशं सीमानं वा अत्यन्तः, स चासौ अभावश्चेति ; अतिक्रा० तत्, गर्भ-कर्मधा। पूर्ण नास्तित्व, बिलकुल नामौ जूदगी । “नित्यत्वे सति तादात्मासम्बन्धानवच्छिन्न-प्रतियोगिताकाभावत्वं अत्यन्ताभवत्वम्” ।
(१) उत्तरकालानवस्थायिनि प्रागभावे पूर्वकालानवस्थायिनि ध्वंसे च अतिव्याप्तिवारणाय 'नित्यत्वे सति' इति । नित्यत्वञ्चाव सर्वकाशस्थायित्वम् । (२) अन्धोन्धाभावे अतिव्याप्तिवारणाय तादात्मासम्बन्धानवच्छिन्नप्रति योगिताकत्वमिति विशेषणम् । (३) घटादिरूपप्रतियोगिसत्त्वकाले तदनधिकरणदेशे च 'अव घटो नास्ति' इत्यादि व्यवहारोपपत्तये अत्यन्ताभाव आवश्यकः । (४) तस्य ध्वंसप्रागभावी तु प्रतियोगिसत्त्वकाले प्रतियोग्यनधिकरणदेशे च न वर्तते। किन्तु प्रतियोगिनः पूर्वकाले प्रागभावः उत्तरकाले तु ध्वसस्तिष्ठति । (५) अन्योन्याभावेन तु तादृशव्यवहार उपपादयितु' न शक्यते । यस्मात् घटसत्त्वकाले घटादिभेदवति घटाद्यधिकरणे अव घटो नास्तीति व्यवहार पापद्येत। अन्योन्याभावस्तु घटाद्यधिकरणदेशे वर्तते। अत्यन्ताभाव उस अभावको कहते हैं, जिसमें नित्यकालस्थायौ और तादात्मा-सम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिता न हो, किन्तु अन्यसम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगिता विद्यमान रहे। यह बात आगे लिखी जाती है, कि प्रतियोगिता और अवच्छिन्नत्व किसको कहते हैं,- नैयायिकोंके मतमें कितने हौ अभाव होते हैं।उन्होंने पहले संसर्गाभाव और अन्योन्याभाव-यह दो प्रकारके भेद दिखाके, पीछे संसर्गाभावको तीन रूपमें विभक्त किया है। यथा,-१ प्रागभाव, २.ध्वंसाभाव, ३ अत्यन्ताभाव। किसी वस्तु के उत्पन्न
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होनेसे पूर्व जो अभाव रहता है, उसे प्रागभाव कहते हैं। वस्तुका नाश होनेसे जो अभाव उत्पन्न हो, वह ध्वंसाभाव कहाता है। किसी वस्तुमें उसी वस्तुका जो अपना सम्बन्ध है, वही तादात्मासम्बन्ध समझना चाहिये ; जैसे पशु में पशु और मनुष्यमें मनुष्य तादात्मा-सम्बन्धसे रहता है। जिस वस्तुका अभाव होता है,उसी वस्तुको प्रतियोगी कहते हैं। जैसे, जिस स्थलमें घट हो उस अभावका प्रतियोगी है। प्रतियोगी होनेका धर्म प्रतियोगिता है। वस्तु न रखनेवाले सम्बन्धके साथ प्रतियोगितारूप जो धर्म होता, वह अवच्छिन्नत्वरूप सम्बन्ध माना जाता है। अभाव में प्रतियोगिता निरूपकत्व सम्बन्धसे रहती है। नैयायिकों के मतमें 'अत्यन्त-अभाव' शब्दका प्रकृत तात्पर्य अवाध रूपसे समझाने के लिये इसमें 'नित्य,' 'तादात्मा-सम्बन्धरहित' और 'प्रतियोगी-यह कई एक विशेषण लगाया करते हैं। अर्थात् जो अत्यन्त अभाव कहाता,वह कैसा है ?-वह अभाव नित्य है। फिर वह कैसा है?-उस अभाव में तादात्मासम्बन्धावच्छिन कोई प्रतियोगिता नहीं। यह कई एक विशेषण न रहनेसे कितना हो गड़बड़ पड़ जाता है। जैसे, अत्यन्त अभावको नित्य न कहनेसे इसके लक्षणमें प्रागभाव और ध्वंसाभाववाले लक्षणके साथ गड़बड़ पड़ता है। तादात्मासम्बन्धावच्छिन्न प्रतियोगितारूपसम्बन्ध रहित न कहनेसे अन्योन्याभावके साथ विरोध होता है। इस समय यह आपत्ति दिखाई जा सकती कि अत्यन्ताभाव न माननेसे क्या क्षति है? नैयायिक कहते हैं, इस स्थानमें घट नहीं-इसप्रकार वाक्य स्थिर रखनेके लिये अत्यन्ताभाव आवश्यक है एक स्थानमें एक घट रहनेसे जिस स्थानमें वह नहीं होता,वहां उसो घटका प्रागभाव किंवा ध्वंस भो नहीं। इसीसे वहां अत्यन्ताभावको स्वीकार करना पड़ता है। अत्यन्तिक (सं० त्रि.)अत्यन्तं अतिशयं गच्छ-तौति, अत्यन्त ठन्।१ अतिशयभ्रमणकारी, बहुत १घूमनेवाला। २ निकटस्थ, पासका। अतिक्रान्त- |
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अत्यन्तसंयोग -अत्यन्तिक