सामग्री पर जाएँ

पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२९४

विकिस्रोत से
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
२८०
अत्यन्तीन-अत्यष्टि

मन्तिकं येन, बहुव्री०। ३ दूरवर्ती, दूर। (क्ली०)।अतिशयितं अन्तिकं निकटं, प्रादि-स०। ४ अत्यन्त निकट,बहुत कमदूरी। अतिक्रान्तं अन्तिकं निकटं। ५ अतिक्रान्त सामीप्य, दूर।

अत्यन्तीन (सं० त्रि.) अत्यन्तस्यात्ययः अत्यन्तं अत्यये अव्ययी।

अवारपारात्यन्तानुकामं गामी। पा ५।२।११॥

अत्यन्तगामी, अज़हद चलनेवाला।

अत्यमर्षिन् (सं० त्रि०) अत्यन्त क्रुद्ध, निहायत गुस्सावर।

अत्यम्बुपान (सं० क्लो०) मात्रातिरिक्त जल पान,अजहद आबनोशी, अपरिमित रूपसे पानीका पौना। जलपानके विषयमें लिखा है,-

"अत्यम्बुपानान्न विपच्यतेऽन्नं अनम्बू पानाञ्च स एव दोषः । तस्मान्नरी बङ्गिविवईनार्थं मुहम हुर्वारि पिबेदभूरि ॥" राजनिघ०।

बहुत पानी पीनेसे भोजन नहीं पचता और यही पानी न पीनेसे भी होता है। इसलिये मनुष्यको भूख बढ़ानेके लिये थोड़ा-थोड़ा पानी बार-बार पीना चाहिये अर्थात् एकबारगी अधिक जल न पीये।

अत्यम्ल (सं० पु०-क्लो०) अत्यन्तमतिशयितोऽम्बरसो यस्य फलादौ, बहुव्रो। १ इमलीका वृक्ष । (त्रि०)२ अत्यन्त अम्बरसविशिष्ट, निहायत खट्ठा ।

अत्यम्लपर्णी (सं० स्त्री०) अत्यम्लानि पर्णानि पत्राणि यस्याः, बहुव्री०। १ वल्लिशूरण लताविशेष । २ अम्ल-लोनी, खट्टी चौपतिया। इस बेलमें गोल-गोल खट्टेरसके चार चार पत्ते एक-एक जगहमें लगे रहते हैं। इसके गुण यह हैं,-

"अत्यम्लपर्णी तीक्ष्णाम्ला लौहशूलविनाशिनी । वातह्रद्यीपनी रुच्या गुल्मश्र्ले ष्मामयापहा ॥" राजनिघ०।

अत्यम्ला (सं० स्त्री०) बिजौरा नीबू ।

अत्यय (सं० पु०) अति-इण्-अच् ।

एरच् । पा ३। ३।५६।

१ अतिक्रम, ज़ियादती। २ अभाव, नामौजूदगी। ३ विनाश, मटियामेट । ४ दोष, ऐब । ५ कच्छ, दुःख ; तकलीफ, मुसीबत।६ दण्ड, सजा।७ अतिक्रमकारी गमन, लांघनेवाली चाल ।८ कार्यका अवश्य भावाभाव, कामकी ज़रूरी मौजूदगी या नामौजूदगी।

अत्ययिक, आत्ययिक (सं० त्रि.) क्षणकालस्थायी,अवसरसम्बन्धीय ; गैरमुदामी, मौकेका।

अत्ययिन् (सं० त्रि०)१ गमन करते हुए, जाते हुए। २ सबकृत ले जानेवाला, जो आगे निकल जाये।

अत्यराति (सं० पु०) जनन्तपके एक पुत्रका नाम। ऐतरेय ब्राह्मणके २३ वें अध्याय में लिखा है, कि यद्यपि अत्यराति राजा न थे, तथापि वाशिष्ठ सत्यहव्यने इन्हें राजसूयको शिक्षा दी थी, जिससे इन्होंने पृथिवीको विजय किया। किन्तु जब वाशिष्ठने इन्हें कृतज-तब इन्होंने कहा, कि इनका विचार उत्तर कुरु जीतने-का था, जिसके बाद वाशिष्ठ राजा और यह उनके सेनापति बनते। वाशिष्ठने उत्तर दिया, कि किसी मर्त्य के उत्तरकुरुको न जीत सकनेसे उन्हें उनके पुरस्कार-सम्बन्धमें धोका दिया गया था। इसलिये उन्होंने अमित्रतपन सुसमिण सैव्यके हाथों इन्हें हरा,मरवा डाला।

अत्यर्क (सं० पु०) शुक्लार्क वृक्ष, सफेद आक या अकोड़ा।

अत्यर्थ (सं० क्ली०) अतिक्रान्तमर्थं अनुरूपस्वरूपम्,अतिक्रा-तत्। १ अतिशय, ज़ियादती, बहुतायत।

अत्यल्प (सं० त्रि०) अतिशयितमल्पम्, प्रादि-तत्० ।१ यत्किञ्चित्, अतिसूक्ष्म, नितान्त अल्प ; बहुत थोड़ा, निहायत कम।

अत्यशन (स. क्लो०) अतिशयितमशनं भोजनम्,प्रादि-तत्। अधिक भोजन, अतिभोजन, ज्यादा गिजा। अत्यवि (वै० पु.) १ साफी या छन्ने के भीतर से निकास । २ सोमरस।

अत्यष्टि (स. स्त्री०) अतिक्रान्ता अष्टिं षोडशाक्षर-पादिकां वृत्तिम्, अतिक्रा०-तत्। सत्रह अक्षरविशिष्ट छन्दोविशेष, सत्रह हर्फ का छन्द । अष्टिवृत्तिमें सोलह अक्षर होते हैं, अत्यष्टिवृत्तिमें उसकी अपेक्षा एक अक्षर अधिक रहता है।निम्नलिखित कई एक छन्द इसीके अन्तर्गत हैं,-मन्दाक्रान्ता, भाराक्रान्ता,