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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/२९७

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अत्रक-अत्रि


आदमखोर | ५ भोजन, खुराक ।(त्रि०) ६ अरक्षित, वेपनाह ( हि० पु० )७ अस्त्र,हथियार |

अत्रक (सं० त्रि० )१ इस स्थानका, यहांवाला ।२ सांसारिक, दुनियावी ।

अत्रत्य ( स ० त्रि० ) इस स्थानका, इस जगह रहनेवाला ।

अत्रदघ्न(सं० त्रि०) १ इतने ऊपर पहुंचनेवाल |२ ऐसे या वैसे कदका ।

अत्रप (सं० त्रि० )न-त्रपूष-अङ्,नास्ति त्रपा लज्जा यस्य ।

षिङ्गिदादिभ्योऽङ ।पा ३

निर्लज्ज,लज्जारहित, जिसके लज्जा न हो ; बेशर्म, बेलिहाज,जिसको कोई शर्म नहीं ।


अत्रभवत् (सं० त्रि ० ) अयमित्यर्थे, अत्र प्रथमार्थे त्रल् । कर्म्मधाः।

इतराभ्योऽपि हृश्यन्ते । पा ५।३३ १४ ।

पूज्य,

श्लाघ्य, मान्य ; इज्जतदार, तौकीरपिज़ोर ।

अत्त्रयस् (सं० पु० )अत्रिके वंशज, अत्रिकी औलाद ।

अत्रवस् (वै० पु० )विगत बर्ष बीता हुआ बर्ष,परका साल |

अत्रस्त (सं० त्रि० )न त्रस्तम्, त्रस्-क्त । १ भयरहित, बेखौफ। २ व्यस्तताविहीन, न डरा हुआ ।

अत्रस्थ (सं० त्रि० ) इस स्थान में ठहरनेवाला, इस जगहका ।

अत्रास ( सं० पु० ) न त्रासः, अभावार्थे नञ् तत् ।१ भयका अभाव, निडरपन, बेखौफ। (त्रि० )नास्ति वासोयस्य, नञर्थे बहुव्री० । २ निर्भय, बेखौफ,जिसे कोई डर नहीं ।

अत्रि (सं० पु० ) अद् - त्रिप्, अत्ति अग्नेः सहायतया शत्रून् भक्षयति ।

अदेस्त्रिन् । उण ४ ६८ ।

१ अग्निको सहायतासे शत्रुओंको भक्षणकरनेवाला, भक्षक ।२ कितने ही वैदिक मन्त्र बनानेवाले एक बड़े ऋषि ।

अत्रि सप्तर्षियोंके मध्य एक ऋषि थे । सातो ऋषियोंके नाम यह हैं, – १ मरीचि, २ अत्रि, ३ अङ्गिरा, ४ पुलस्त्य, ५ पुलह, ६ ऋतु, ७ वशिष्ठ ।

'मरीचिमत्रात्ङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः । ब्रह्मणो मानसाः पुत्रा वशिष्ठाश्र्चेति सप्त ते ॥”

कहते हैं, कि अत्रि ब्रह्माके चक्षुसे उत्पन्न हुए थे ।इनकी भार्या कर्दम मुनिको कन्या अनुसूया थीं। इनके पुत्रोंका नाम दत्त, दुर्वासा और चन्द्र था ।इन्होंने कितने ही वेद-मन्त्रोंकी रचना की थी ।

मनुसंहिताके प्रथम अध्यायमें लिखा है, कि सृष्टिकर्त्ता ने अपनी देहके दो खण्ड कर एक अंशसे एकपुरुष और एकसे एक नारी बनाई थी। उसी विराट् पुरुषने बहुकाल तपस्याकर मनुको उत्पन्न किया । इसके बाद मनुसे दक्ष प्रजापति हुए । अत्रि इन्हीं में एक प्रजापति थे, -

"मरीचिमत्राङ्गिरसौ पुलस्ता' पुलहं क्रतुम् । प्रचेतसं वशिष्ठञ्च भृगु नारदमेव च ॥" (मनु १ । ३५ । )

किन्तु महाभारतके शान्तिपर्व्व और अन्यान्य स्थल में लिखा है, कि ब्रह्माने पहले सप्तर्षियोंको उत्पन्न किया था । अत्रि उन्हीं में एक ऋषि थे ।

अत्रिने ऋग्वेदके कितने ही मन्त्रोंकी रचना की थी।
( ऋग्वेद ३ अष्टक - ५७ से ११४ सूक्त ।)
ऋग्वेदके किसी-किसी स्थान में यह अग्नि, इन्द्र, अश्विनीकुमार-द्वय और विश्वदेवगण के नामान्तररूपसे बताये गये हैं ।ऋग्वेदके किसी-किसी वर्णनमें ऐसा भी देख पड़ता, कि इनको ऋषि या अग्नि समझना कठिन है।यथा, -
“याभिः शुच॑तिं धनसां सुषं सदं तप्तं धर्ममोग्यावंतमत्रये । याभि: पृश्विगुं पुरुकुत्समावतं ताभिरुषु ऊतिभिरश्विना गतं ॥ "ऋग्वेद १।११२७ ।

जिस साहाय्य द्वारा आपने शुचन्तिको धनवान् बनाया और सुन्दर वासस्थान दिया तथा सूर्यकिरण- सन्तप्त घर्म भी अत्रिके लिये सुखप्रद कर दिया, जिसके द्वारा पृश्निगु और पुरुकुत्सको उनके साथ अवस्थिति करनेके लिये रखा, हे अश्विनीयुगल ! आप इच्छापूर्वक उसी साहाय्यसे आगमन कीजिये।

इस जगह सायणाचार्यने अत्रिको एक स्वतन्त्र ही व्यक्ति माना है । किन्तु यास्क के मत से यहां अत्रिका अर्थ हविर्भुक् अग्नि है । यथा, -