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पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३२८

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अदास - अदिति

अदास (सं० पु० ) खतन्त्र पुरुष, जो आदमी गुलाम न हो।

अदाह (हिं० स्त्री) अदा, हावभाव ।

अदाहक(सं० त्रि०) जो न जलाये, जिसमें जलानेकी शक्ति न हो ।

अदाह्य (सं० त्रि० ) न दग्धुमर्हम्, दह ण्यत् अर्हे ; नञ्-तत् । जो मृत व्यक्ति अन्त्येष्टिक्रियाके अयोग्य हो, जिसे कोई न जलाये, न फूंका जानेवाला । शास्त्रकारोंने नीचे लिखे कई एक व्यक्तियोंकी मृत देहको दाह करनेसे निषेध किया है।

सींग, दांत या नखवाले पशु द्वारा यदि कोई मारा (जैसे गेंडा, सिंह, व्याघ्र और भल्लूक ) और सर्पविष, अग्नि, स्त्रीलोक और जल- इनके साथ क्रौड़ा करते हुए किसी की मृत्यु हो जाये, तो उसके मृत देहको दाह न करना चाहिये । यदि कोई मारनेके लिये सर्पको खिमाने, या बिजली गिरनेसे मरे, तो शास्त्रानुसार उसकी अन्त्यष्टिक्रिया करना मना है। चोरी और व्यभिचार करनेके कारण जिसको मृत्यु हुई हो, उसको भी अन्त्येष्टिक्रिया नहीं हो सकती । चण्डालादिके साथ कलहकर मरनेसे उत्कृष्ट वर्णवाले किसी व्यक्तिको जलाना शास्त्रसम्मत नहीं । विषयुक्त औषध खिलाने, आग लगाने और विष देकर मार डालनेवाले पाखण्डी व्यक्तिका मृतदेह अदाह्य है । जो नराधम क्रोधवश विष खाये, आगमें जले, अस्त्राघात लगाये, फांसी चढ़े, निर्भर, पर्वत या वृक्ष से गिरे, उसको अन्त्यष्टिक्रिया नहीं होती। जूता बनाने आदि कुशिल्प द्वारा जो जीविका चलाये, जो वध्यभूमिका अधिकारी हो (जैसे जल्लाद प्रभृति ), जिसके मुखमें भगाङ्ग जैसा चिह्न रहे, जो नपुंसक किंवा क्लीवप्राय हो, जो ब्राह्मणको दण्ड देनेके लिये राजा द्वारा नियुक्त किया जाये और जो महापातकी और पतित हो, उसके मरनेसे शास्त्र अन्त्येष्टिक्रियाको व्यवस्था नहीं देता; ऐसे व्यक्तिका आत्मीयस्वजन आंख आंसू भी न गिराये। यदि कोई भूलसे ऐसे व्यक्तिको

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अन्त्येष्टिक्रिया किंवा श्राद्धादि करे, तो उसे दो तप्तकृच्छ्र प्रायश्चित्त करके शुद्ध होना चाहिये । अदित - आदित्य देखो ।

अदिति (सं० स्त्री० ) दो श्रवखण्डने-क्तिच्, न दीयते खण्डाते बृहत्त्वात् ; विरोधार्थे नञ्-तत् ।१ दिति दैत्योंकी माता, अदिति, - जो दैत्योंकी माता नहीं । रामायण, महाभारत और पुराणादिमें लिखा है, कि अदिति दक्षको कन्या थीं; महर्षि कश्यपके साथ इनका विवाह हुआ । निरुक्तमें अदितिको देवमाता और स्त्रियों में “प्रथमागामिनी” बताया है । निरुक्त ४ । ३२ और ११।२२ देखो।ऋग्वेदमें देवताओंके जन्म-विवरण- पर अदिति विषयका इस प्रकार वर्णन किया गया है,—

"देवानां नु वयं जाना प्र वोचाम विपन्यया ।
उक्थेषु शस्यमानेषु यः पश्यादुत्तरे युगे ॥ १ ब्रह्मणस्पतिरेता सं कर्मार इवाधमत् ।
देवानां पूव्र्व्यं युगेऽसतः सदजायत ॥ २
देवानां युगे प्रथमें ऽसतः सदजायत ।
तदाशा अन्वजायंत तदुत्तानपदस्परि ॥ ३
भूर्जज्ञ उत्तानपदो भूव भाशा अजायन्त ।
अदितेर्दो अजायत दचाइदिति परि ॥ ४
अदिति जनिष्ट दच या दुहिता तव ।
तां देवा अन्वजायंत भद्रा अमृतबन्धवः ॥ ५
यह वा अदः सलिले सुसंरब्धा अतिष्ठत ।
अवा वो नृत्यतामिव तीव्री रेणुरपायत ॥ ६
यह वा यतयो यथा भुवनान्यपिन्वत ।
अता समुद्र भा गूहलमा सूर्यमजभर्तन ॥
७ अष्टौ पुवासी अदितेय जातास्तन्वस्परि ।
देवाँ उप प्रैत्सप्तभिः परा मार्ता डमास्यत् ॥ ८
सप्तभिः पुर्व रदितिरूप पैत्पूर्व्यं युगम् ।
प्रजायै मृत्यवे त्वत्पूनर्मार्तडमाभरत् ॥” (ऋग्वेद १० ७२ १-८1)

'हम संकीर्त्तनकर देवताओंका जन्म - वृत्तान्त कहते हैं। हमारे इन उक्थगायकोंमें कोई भी क्यों न हो, उत्तर युगमें उन्हें देख सकेगा । ब्रह्मणस्पतिने कर्मकारके सदृश इस समस्तं जगत्‌को फूंककर निर्माण किया। देवताओंके पूर्व युगमें असत्से ( . जो न था ।) सत् ( जिसका अस्तित्व है ) उत्पन्न हुआ था। तत्पश्चात् उत्तानपदसे समस्त दिशाओंने