|
जन्मग्रहण किया । उत्तानपद से पृथिवी और पृथिवीसे आशा अर्थात् दिक् उत्पन्न हुई । अदितिसे दक्ष और दक्षसे अदिति उत्पन्न हुई । इसलिये हे दक्ष ! जन्मग्रहण करनेवालो अदिति आपकी कन्या हैं। उनसे भद्र और अमृत-बन्धु देवता उत्पन्न हुए। जब इस सम्पर्ण जलके ऊपर आपने देवताओंको आन्दोलित किया था, तब नर्तकियोंकी तरह आपके निकटसे तीव्र धूलि उड़ी और जब देवता यतिको तरह भुवन परिपूर्ण कर रहे थे, तब आपने समुद्र के भीतरसे गुप्त सूर्यको निकाला । अदितिके जो आठ सन्तान उत्पन्न हुए थे, उनमें वह सात पुत्र लेकर देवताओंके समीप गई, किन्तु मार्तण्डको समुद्रमें डाल दिया । पूर्व युगमें अदिति सात ही पुत्र लेकर गई थीं, प्रजाकी सृष्टि और मृत्युके लिये उन्होंने फिर मार्त्तण्डको प्रसव किया । ऋग्वेदके अनेक स्थलोंमें लिखा है, कि अदिति पापनिवारिणा रूपसे पूजी जाती थीं । ( ऋक्संहिता ११६२२२, २२७ १४, ४१२४, ५।८२६, ७८७७, ७८३७, १०।१२।८।) यह पुत्रकन्या और गवादिको हितकारिणी हैं ।(ऋक् १।४३।२) अनेक स्थलोंमें देवोके नामसे सम्बो- धित हुई हैं । ( ऋकृ. ४।५५।३७, ५।५१/११, ६।५०११, ७|३८|४, ७७४०/२, ८।२५।१०, ८२७५८५६१०)यह कहीं अनर्वा अर्थात् अप्रतिकूला देवी(( २२४०६, ७१४०१४, १० ह२।१४ ),(कहीं चितिधारिणी- ज्योतिष्मती (११२६/२), कहीं राजपुत्रा(२१२७७७), कहीं सुपुत्रा (३|४|११ ),कहीं उग्रपुत्रा(५६/११), कहीं शूरपुत्रा अर्थात् वीरोंको माता (अथर्वस हिता ३८२, ११।१।१२); कहीं पञ्चजना - विश्वजन्या(ऋक् ७|१०|४);कहीं उरुव्यचाः अर्थात् बहुविस्तीर्णा(५/४६/६)और कहीं पस्त्या अर्थात् सर्वगन्तव्या ( ४।५५।३) बताई गई हैं। अनेकस्थलोंमें इन्हें' पृथिवी - अखण्डनीया भूमि अर्थसे लिखा गया है ।(ऋक् ११ २४|१, १२४३३२. १०६५२१, १०।१३२६; अथर्व १३१३८) ऋग्वेदके अनेक मन्त्र पढ़नेसे यह भी विदित होता है, कि अदिति पृथिवीसे भिन्न थीं,- |
“यौपितः पृथिवि मातरघुगन सातर्वसवो मुड़ता नः । विश्व आदित्या अदिते सजोषा भस्मभ्यं शर्म बहुलं वियंत ॥” (६।५१।५) 'है अधुलोकपित ! हे उपकारिणी पृथवी ! हे अग्नि और वसुगण ! हमारे प्रति कृपा कीजिये । हे आदित्यगण ! हे अदिति ! एकत्र होकर हमें बहुल आश्रय दीजिये । इसके सिवा ३३५४|१८-२०, ५४६ हारण५८, १०|३६|२ - ३, १०६३/१०, १०/२/११ देखो । यजुर्वेद और अथर्ववेदके भी स्थान-स्थान में अदिति पृथिवीसे भिन्न बताई गई हैं, "पृथिवी च मेऽदितिश्च मे दितिव मे द्यौथ मे * * यज्ञेन कल्पन्ताम् ।” ( वाजसनेयसंहिता १८१२२ ) "भूमिर्माता अदितिन जनित' भ्रातान्तरितमचिशस्ता नः ।" (अथर्व ६।१२०१२ ) चतुर्थ ऋक्में लिखा है, – “अदितिसे दक्ष और दक्षसे अदितिने जन्मग्रहण किया ।" यह घटना सर्वथा असम्भव जान पड़ती हैं। अतएव यास्कने निरुक्तमें लिखा है, - "आदित्यो दक्ष इत्याहुरादित्यमध्ये च स्तुतः । श्रदितिर्दाचायणी अदिते-चोऽजायत दचाददितिः परि इति च तत् कथमुपपद्येत । समानजन्मांनी स्वातामिति । अपि वा देवधर्मेण इतरेतरजन्मानौ स्वातामितरेतरप्रकृती ।" (११ । २३ ।) 'दक्ष आदित्य अर्थात् अदितिके पुत्र बताये गये हैं, आदित्योंके मध्यमें उनको स्तुति भी की जाती है । फिर इस ऋक् के अनुसार, कि 'अदिति दक्ष उत्पन्न हुए और दक्ष से अदितिने जन्मग्रहण किया', अदिति दाक्षायणौ अर्थात् दक्षको कन्या हैं। यह कैसे सम्भव हो सकता है, कि उनका समान जन्म हो । किंवा देवधर्मानुसार वह दोनो परस्पर उत्पन्न हुए होंगे और परस्परको प्रकृति प्राप्त की होगी । ऋग्वेद में अदिति और दिति शब्दका एक ही जगह प्रयोग देखा जाता है- “हिरण्यरूपमुषसो व्युष्टावयः स्थूणमुदिता सूर्यस्य । सायणाचार्यने इसको व्याख्यामें लिखा है, अदितिका अर्थ, अखण्डनीय रूप समस्त भूमि और दितिका खण्डरूप प्रजादि है । 'अदितिमखण्डनौयां भूमिम् । दितिं खण्डितां प्रज्ञादिकाम् । १८९१० । ऋक् के भाष्यमें उन्होंने |
पृष्ठ:हिन्दी विश्वकोष भाग 1.djvu/३२९
दिखावट
यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
३२२
अदिति